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इतिहास के पन्नों से स्वर्णिम इतिहास हमारे क्रांतिकारी / महापुरुष

भारतीय स्वाधीनता का अमर नायक राजा दाहिर सेन, अध्याय – 8 ( ख ) राजा दाहिर सेन की चूक

राजा दाहिर सेन ने देवल जैसे प्रांत का सूबेदार ज्ञानबुद्ध को बना तो दिया पर यहाँ उनसे एक चूक भी हो गई कि उन्होंने सामरिक दृष्टिकोण से सबसे महत्वपूर्ण प्रान्त का सूबेदार एक ऐसे व्यक्ति को बना दिया था जो महात्मा बुद्ध की ‘अहिंसा’ में विश्वास रखता था। राजा दाहिर सेन को ज्ञान बुद्ध के […]

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भारत रत्न , आर्यसमाज के सिद्धांतों के प्रचारक, महान नेता एवं समाज सुधारक गोविंद बल्लभ पंत के जन्मदिवस पर सादर नमन

गोविंद बल्लभ पंत ( जन्म:10 सितम्बर 1887; मृत्यु: 7 मार्च, 1961) उत्तर प्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री एवं स्वतंत्रता सेनानी थे। इनका मुख्यमंत्री कार्यकाल 15 अगस्त, 1947 से 27 मई, 1954 तक रहा। बाद में ये भारत के गृहमंत्री भी (1955 -1961) बने। भारतीय संविधान में हिन्दी भाषा को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिलाने और जमींदारी प्रथा […]

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18वीं शताब्दी के भारत की आर्थिक समृद्धि का स्वरूप लेखिका: प्रो. कुसुमलता केडिया

गत 150 वर्षों में भारत क्यों इतना कम विकसित हो सका अथवा पहले से अधिक विपन्न क्यों हो गया, इंग्लैंड की तरह आगे क्यों नहीं बढ़ा, इसके उत्तर की जिन्हें तलाश है, उन्हें ब्रिटिश-पूर्व अखण्ड भारत की परिस्थिति की वास्तविकता को ठीक तरह से जानना होगा। के.एन. चौधुरी, रादरमुंड, धर्मपाल, तपन राय चौधुरी, एम.एन. पियर्सन, […]

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आज भी गूंजती है चित्तौड़गढ़ में हमारे गौरव की गाथाएं

डॉ. प्रभात कुमार सिंघल  पहाड़ की चोटी पर यह दुर्ग चारों ओर सुदृढ़ दीवारों से घिरा हुआ है और सुरक्षा के लिए मुख्य मार्ग पर सात द्वारा बने हुए हैं। प्रथम द्वार पाडलपोल के बाहर प्रतापगढ़ के रावत बाघसिंह का स्मारक बना हुआ है। थोड़ी दूर चलने पर उतार में भैरवपोल है जहाँ जयमल के […]

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एक खोजी नाविक नहीं, ईसाई समुद्री डाकू था वास्कोडिगामा ?

हमारे देश में पढ़ाई जाने वाली किसी भी इतिहास पुस्तक को उठाकर देखिये। वास्को दी गामा को भारत की खोज करने का श्रेय देते हुए इतिहासकार उसके गुणगान करते दिखेंगे। उस काल में जब यूरोप से भारत के मध्य व्यापार केवल अरब के माध्यम से होता था। उस पर अरबवासियों का प्रभुत्व था। भारतीय मसालों […]

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इतिहास की अमर गाथा आर्यसमाज के इतिहास में अनेक प्रेरणादायक संस्मरण हैं जो अमर गाथा के रूप में सदा सदा के लिए प्रेरणा देते रहेंगे। एक ऐसी ही गाथा रोपड़ के लाला सोमनाथ जी की हैं। आप रोपड़ आर्यसमाज के प्रधान थे। आपके मार्गदर्शन में रोपड़ आर्यसमाज ने रहतियों की शुद्धि की थी। यूँ तो रहतियों का सम्बन्ध सिख समाज से था मगर उनके साथ अछूतों सा व्यवहार किया जाता था। आपके शुद्धि करने पर रोपड़ के पौराणिक समाज ने आर्यसमाज के सभी परिवारों का बहिष्कार कर दिया एवं रोपड़ के सभी कुओं से आर्यसमाजियों को पानी भरने पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया। आखिर में नहर के गंदे पानी को पीने से अनेक आर्यों को पेट के रोग हो गए जिनमें से एक सोमनाथ जी की माता जी भी थी। उन्हें आन्त्रज्वर (Typhoid) हो गया था। वैद्य जी के अनुसार ऐसा गन्दा पानी पीने से हुआ था। सोमनाथ जी के समक्ष अब एक रास्ता तो क्षमा मांगकर समझोता करने का था और दूसरा रास्ता सब कुछ सहते हुए परिवार की बलि देने का था। आपको चिंताग्रस्त देखकर आपकी माताजी जी आपको समझाया की एक न एक दिन तो उनकी मृत्यु निश्चित हैं फिर उनके लिए अपने धर्म का परित्याग करना गलत होगा। इसलिए धर्म का पालन करने में ही भलाई हैं। सोमनाथ जी माता का आदेश पाकर चिंता से मुक्त हो गए एवं और अधिक उत्साह से कार्य करने लगे। उधर माता जी रोग से स्वर्ग सिधार गई तब भी विरोधियों के दिल नहीं पिघले। विरोध दिनों दिन बढ़ता ही गया। इस विरोध के पीछे गोपीनाथ पंडित का हाथ था। वह पीछे से पौराणिक हिन्दुओं को भड़का रहा था। सनातन धर्म गजट में गोपीनाथ ने अक्टूबर 1900 के अंक में आर्यों के खिलाफ ऐसा भड़काया की आर्यों के बच्चे तक प्यास से तड़पने लगे थे। सख्त से सख्त तकलीफें आर्यों को दी गई। लाला सोमनाथ को अपना परिवार रोपड़ लेकर से जालंधर लेकर जाना पड़ा। जब शांति की कोई आशा न दिखी दी तो महाशय इंदरमन आर्य लाल सिंह (जिन्हें शुद्ध किया गया था) और लाला सोमनाथ स्वामी श्रद्धानन्द (तब मुंशीराम जी) से मिले और सनातन गजट के विरुद्ध फौजदारी मुकदमा करने के विषय में उनसे राय मांगी। मुंशीराम जी उस काल तक अदालत में धार्मिक मामलों को लेकर जाने के विरुद्ध थे। कोई और उपाय न देख अंत में मुकदमा दायर हुआ जिस पर सनातन धर्म गजट ने 15 मार्च 1901 के अंक में आर्यसमाज के विरुद्ध लिखा “हम रोपड़ी आर्यसमाज का इस छेड़खानी के आगाज़ के लिए धन्यवाद अदा करते हैं की उन्होंने हमें विधिवत अदालत के द्वारा ऐलानिया जालंधर में हमें निमंत्रण दिया हैं। जिसको मंजूर करना हमारा कर्तव्य हैं। ” 3 सितम्बर 1901 को मुकदमा सोमनाथ बनाम सीताराम रोपड़ निवासी” का फैसला भी आ गया। सीताराम अपराधी ने बड़े जज से माफ़ी मांगी। उसने अदालत में माफीनामा पेश किया। “मुझ सीताराम ने लाला सोमनाथ प्रधान आर्यसमाज रोपड़ के खिलाफ छपवाई थी, मुझे ऐसा अफ़सोस से लिखना हैं की इसमें आर्यों की तोहीन के खिलाफ बातें दर्ज हो गई थी। जिससे उनको सख्त नुकसान पहुंचा। इस कारण मैं बड़े अदब (शिष्टाचार) से मांफी मांगता हूँ। मैं लाला साहब के सुशील हालत के लिहाज से ऐसी ही इज्जत करता हूँ जैसा की इस चिट्ठी के छपवाने से पूर्व करता था। मैं उन्हें बरादारी से ख़ारिज नहीं समझता, उनके अधिकार साधारण व्यक्तियों सहित वैसे ही समझता हूँ जोकि पहिले थे। मुझे आर्य लोगों से कोई झगड़ा नहीं हैं। साधारण लोगों को सूचना के वास्ते यह माफीनामा अख़बार सत्यधर्म प्रचारक और अख़बार पंजाब समाचार लाहौर में और जैन धर्म शरादक लाहौर में प्रकाशित कराता हूँ। ” इस प्रकार से अनेक संकट सहते हुए आर्यों ने दलितोद्धार एवं शुद्धि के कार्य को किया था। मौखिक उपदेश देने में और जमीनी स्तर पर पुरुषार्थ करने में कितना अंतर होता हैं इसका यह यथार्थ उदाहरण हैं। सोमनाथ जी की माता जी का नाम इतिहास के स्वर्णिम अक्षरों में अंकित हैं। सबसे प्रेरणादायक तथ्य यह हैं की किसी स्वर्ण ने अछूतों के लिए अपने प्राण न्योछावर किये हो ऐसे उदाहरण केवल आर्यसमाज के इतिहास में ही मिलते हैं। #डॉ_विवेक_आर्य

इतिहास की अमर गाथा आर्यसमाज के इतिहास में अनेक प्रेरणादायक संस्मरण हैं जो अमर गाथा के रूप में सदा सदा के लिए प्रेरणा देते रहेंगे। एक ऐसी ही गाथा रोपड़ के लाला सोमनाथ जी की हैं। आप रोपड़ आर्यसमाज के प्रधान थे। आपके मार्गदर्शन में रोपड़ आर्यसमाज ने रहतियों की शुद्धि की थी। यूँ तो […]

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इतिहास के पन्नों से

गाँधीजी के ब्रह्मचर्य प्रयोग : जवाबों के इंतजार में कई सवाल..

. जोसेफ लेलीवेल्ड की नई पुस्तक ‘ग्रेट सोलः महात्मा गाँधी एंड हिज स्ट्रगल विद इंडिया’ पर गुजरात में प्रतिबन्ध लगा दिया गया। पुस्तक में विवादास्पद प्रसंग सन 1904-13 का है, जब गाँधीजी की दोस्ती हरमन कलेनबाख (1871-1945) से हुई। गाँधी और कलेनबाख एक-दूसरे को ‘अपर हाऊस’ और ‘लोअर हाऊस’ कहते थे। इसका कोई अर्थ स्पष्ट […]

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1857 की क्रांति और स्वामी दयानन्द* राजीव दीक्षित जी की जुबानी।

दीक्षित जी कहते हैँ मैंने 3,4 वर्ष अपने भारतीय अधिकारी साथियों के साथ इंग्लैंड के इंडिया हाऊस और पुरातत्व संग्रहालय मे 1857 के स्वाधीनता आंदोलन के प्रपत्र देखे हैं। 1857 स्वतंत्रता संग्राम के पाँच मुख्य केंद्र थे।मेरठ,दिल्ली, कानपुर, झाँसी और बिठूर। बिठूर तांत्याटोपे का गांव था। वहाँ अंग्रेज़ो ने तीन वर्ष में पैंतालीस हजार सैनिक […]

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31 अगस्त: आज ही अंग्रेजों के बजाय उनके भारतीय गद्दार मुखबिर को जेल में घुस कर मारा था क्रांतिकारियों ने ….

31 अगस्त: आज ही अंग्रेजों के बजाय उनके भारतीय गद्दार मुखबिर को जेल में घुस कर मारा था क्रांतिकारियों ने .. एक ऐसा इतिहास जिसे निगल गए नकली कलमकार स्वाधीनता प्राप्ति के प्रयत्न में लगे क्रांतिकारियों को जहां एक ओर अंग्रेजों ने लड़ना पड़ता था, वहां कभी-कभी उन्हें देशद्रोही भारतीय, यहां तक कि अपने गद्दार […]

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इतिहास के पन्नों से हमारे क्रांतिकारी / महापुरुष

भगवान् श्री कृष्ण: महान प्रेरणादायक व्यक्तित्व

#डॉविवेकआर्य एक मित्र ने शंका के माध्यम से पूछा कि क्या आप श्री कृष्ण जी को भगवान् मानते है? मेरा उत्तर इस प्रकार से है- महाभारत में श्री कृष्ण जी के विषय में लिखा है- वेद वेदांग विज्ञानं बलं चाप्यधिकं तथा। नृणां हि लोके कोSन्योSस्ति विशिष्ट: ।। अर्थात आज के समुदाय में वेद वेदांग के […]

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