गतांक से आगे…. ब्रह्म तो मायाधीश है, जीव है मायाधीन। माया बंध को तोडक़र, बिरला हो स्वाधीन ।। 970।। व्याख्या :-इस संसार में जीव, ब्रह्म, प्रकृति अनादि हैं। तीनों की अपने-अपने क्षेत्र में सत्ता है किंतु सर्वोच्च सत्ता ब्रह्म की है। जीव और प्रकृति का अधिष्ठाता ब्रह्म है। जीवों के आवागमन के क्रम का […]
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गतांक से आगे….मत जी खाने के लिए,जीने के लिए खाय।मन को रखना मोद में,रोग निकट नही आय ।। 963।। व्याख्या : महर्षि पतंजलि ने कहा था-हित भुक, मितभुक, ऋतभुक अर्थात भोजन ऐसा करो जो तुम्हारे शरीर की प्रकृति और ऋतु के अनुकूल हो किंतु भूख से थोड़ा खाओ। अत: मनुष्य को खाने के लिए नही […]
ऐसा जीवन जी चलो, खुश होवें भगवन्त
बुद्घि से ही उपजताजीवन में सदा ज्ञान।गर बुद्घि में अहं हो,तो ज्ञान बनै अज्ञान ।। 948।। व्याख्या :-संसार में आज जितना भी बहुमुखी और बहुआयामी विकास दृष्टि गोचर हो रहा है, इसके मूल में मनुष्य की बुद्घि है। यह बुद्घि मनुष्य को परमपिता परमात्मा का अनुपम उपहार है। ज्ञान सर्वदा बुद्घि में ही उपजता है […]
गतांक से आगे….संत की वाणी का असर,सब काहू पै न होय।चुम्बक लोहे को खींच ले,कीचड़ देय बिछोय।। 952 ।। व्याख्या :-संत अथवा सत्पुरूष तो चमकते हुए सूर्य की तरह होते हैं। सूर्य की किरणें पृथ्वी के कण-कण को आलोकित करती हैं किंतु वे उन घरों को प्रकाशित नही कर पाती हैं जिनके दरवाजों के ताले […]
बिखरे मोती-भाग 9८ गतांक से आगे….कर्म करे जैसे मनुष्य,मन भुगतै परिणाम।प्रकृति-पुरूष निरपेक्ष हैं,मत कर उल्टे काम।। 929।। व्याख्या :-प्राय: लोग यह प्रश्न करते हैं कि कर्म देह का विषय है अथवा आत्मा का? इस प्रश्न का सीधा सा उत्तर हमारे ऋषियों ने वेद, उपनिषद और गीता में इस प्रकार दिया है-कर्म न तो देह का […]
समय शक्ति संपत्ति का, नाश करे है विवाद
बिखरे मोती-भाग 97 गतांक से आगे….दुर्भाव से सद्भाव के,मिटते जायें संबंध।जैसे बदबू की हवा,खाती जाय सुगंध ।। 929 ।। व्याख्या :-हृदय की शुद्घि सद्भाव से होती है। हृदय में प्रसन्नता भी सद्भाव से ही रहती है। यदि किसी कारणवश हृदय में दुर्भाव पैदा हो जाए तो वह गोखरू के कांटे की तरह बढ़ता जाता है, […]
बिखरे मोती-भाग 96 गतांक से आगे….जीवन में हो पवित्रता,रखना हमेशा ध्यान।पवित्रता से होत है,आत्मा का कल्याण ।। 922 ।। व्याख्या :-चित्त की निर्मलता अथवा पवित्रता ही धर्म है। इसलिए मनुष्य को चाहिए कि जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में प्रतिपल विशेष ध्यान रखें। हमारे ऋषियों ने इसलिए मन, वचन, कर्म की पवित्रता पर विशेष बल दिया […]
बिखरे मोती-भाग 9५ गतांक से आगे….धर्महीन जीवन सदा,बिन पतवार की नाव।लक्ष्य तक पहुंचे नही,बीच में देय डुबाय।। 919।। व्याख्या :धर्महीन जीवन बिना पतवार की नाव के समान है। जिस प्रकार बिना पतवार के नाव, अपने गंतव्य स्थान तक नही पहुंच पाती है, उसे लहरें एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाती हैं, कभी-कभी तो […]
कर्माशय से ही मिलें, आयु योनि भोग
बिखरे मोती-भाग 94 गतांक से आगे….बंूद एक ही इत्र की,फोहे को महकाय।दिव्य गुण की प्रधानता,मनुज से देव बनाय ।। 917 ।। व्याख्या :दिव्य गुण अर्थात ईश्वरीय गुण। ये आत्मिक ऐश्वर्य के मूलतत्व भी कहलाते हैं। इन्हीं के कारण व्यक्ति के तेज और यश में वृद्घि होती है। ये ईश्वरीय गुण अग्रलिखित हैं जैसे-ज्ञान (विवेक अथवा […]
रसना से लगा घाव तो, जीवन भर रहे याद
बिखरे मोती-भाग 93 गतांक से आगे…. वह ऐसे निष्प्राण हो जाता है जैसे पानी के बिना पौधा सूख जाता है। याद रखो, संबंधों का ताना-बाना सदभाव के जल पर चलता है। ठीक उसी प्रकार जैसे नदी के जल पर नाव चलती है। यदि नदी का जल सूख जाए तो नाव नही चल सकती है। […]