गतांक से आगे….नाम अनंत है-तरह तरह के नाम मनुष्य अपने पीछे छोड़ सकता है, दिव्य गुण भी अनंत हैं, इन दिव्य गुणों के कारण मनुष्य जैसा चाहे वैसा ही नाम पीछे छोड़ सकता है। जो इस रहस्य को जान जाता है वह मृत्यु को जीत लेता है।(2.) आर्तभाग ने फिर अगला प्रश्न किया-हे मुनिश्रेष्ठ! अच्छा […]
Category: बिखरे मोती
गतांक से आगे…..तुझसा, प्राणी नही धनवान,रे मत भटकै प्राणी……..(16)पिंजरा मिल्यो है नौ द्वार को।सुन पंछी की पुकार को।।इसकी मूक तडफ़ पहचान,रे मत भटकै प्राणी……..(17)देखता रहा है, तन के रूप को।जानाा कभी ना, निज के स्वरूप को।। तू है, दिव्य गुणों की खानरे मत भटकै प्राणी……..(18)चौबीसों घंटे जी इस राग में।समर्पण, अभिप्सा और त्याग में।।अपना, वेदों […]
गतांक से आगे…..तुझसा, प्राणी नही धनवान,रे मत भटकै प्राणी……..(16)पिंजरा मिल्यो है नौ द्वार को।सुन पंछी की पुकार को।।इसकी मूक तडफ़ पहचान,रे मत भटकै प्राणी……..(17)देखता रहा है, तन के रूप को।जानाा कभी ना, निज के स्वरूप को।। तू है, दिव्य गुणों की खानरे मत भटकै प्राणी……..(18)चौबीसों घंटे जी इस राग में।समर्पण, अभिप्सा और त्याग में।।अपना, वेदों […]
‘यमस्य लोका दध्या बभूविथ’
अथर्ववेद की उपरोक्त पंक्ति का भावार्थ :-जिसने मेरे अंतर को झकझोर दिया। (19/56/1)यमस्य अर्थात नियंत्रणकर्ता, न्यायकारी भगवान। लोका-अर्थात प्रकाश से, लोक से। बभूविथ-तू समर्थ हुआ।व्याख्या :-मनुष्य को आगाह करते हुए अथर्ववेद का ऋषि कहता है-हे मनुष्य! तू कहां से आया है? कहां तुझे जाना है? तू राही किस मंजिल का है? मनुष्य की इस सोयी […]
‘यमस्य लोका दध्या बभूविथ’
अथर्ववेद की उपरोक्त पंक्ति का भावार्थ :-जिसने मेरे अंतर को झकझोर दिया। (19/56/1)यमस्य अर्थात नियंत्रणकर्ता, न्यायकारी भगवान। लोका-अर्थात प्रकाश से, लोक से। बभूविथ-तू समर्थ हुआ।व्याख्या :-मनुष्य को आगाह करते हुए अथर्ववेद का ऋषि कहता है-हे मनुष्य! तू कहां से आया है? कहां तुझे जाना है? तू राही किस मंजिल का है? मनुष्य की इस सोयी […]
एक राजा था, शायद भारत के दक्षिण में। एक दिन वह शिकार के लिए जंगल में गया। वहां मार्ग भूल गया। भूख और प्यास से व्याकुल हो उठा। उसने एक लकड़हारे को जंगल में लकडिय़ां काटते देखा। बहुत से पेड़ कट चुके थे, थोड़े से बचे थे। उन्हीं में से एक पेड़ की शाखा काट […]
एक राजा था, शायद भारत के दक्षिण में। एक दिन वह शिकार के लिए जंगल में गया। वहां मार्ग भूल गया। भूख और प्यास से व्याकुल हो उठा। उसने एक लकड़हारे को जंगल में लकडिय़ां काटते देखा। बहुत से पेड़ कट चुके थे, थोड़े से बचे थे। उन्हीं में से एक पेड़ की शाखा काट […]
मनुष्य का व्यक्तिव्य बड़ा ही जटिल और गहन है। उसका आरपार पाना बहुत ही कठिन है। मनुष्य के इस इंसानी चोले में साधु और शैतान दोनों ही छिपे हैं। वह ऊंचा उठे तो इतना ऊंचा उठे कि देवताओं को भी पीछे छोड़ दे और यदि गिरने पर आए तो वह पशुओं से भी नीचे गिर […]
मनुष्य का व्यक्तिव्य बड़ा ही जटिल और गहन है। उसका आरपार पाना बहुत ही कठिन है। मनुष्य के इस इंसानी चोले में साधु और शैतान दोनों ही छिपे हैं। वह ऊंचा उठे तो इतना ऊंचा उठे कि देवताओं को भी पीछे छोड़ दे और यदि गिरने पर आए तो वह पशुओं से भी नीचे गिर […]
समझें, आत्मकेन्द्रित होने के सही अर्थ
प्राय: देखा गया है कि लोग आत्मकेन्द्रित होने का अर्थ अपने तक सीमित रहना, जिसे अंग्रेजी में रिजर्व नेचर कहते हैं। यह तो स्वार्थपरता है, अर्थ का अनर्थ है। आत्मकेन्द्रित होने से वास्तविक अभिप्राय है-अपने आत्मस्वरूप में केन्द्रित होना, अनंत आनंद में जीना, संतोष, सरसता और शांति में जीना। इसके लिए ध्यान में उतरने का […]