बिखरे मोती-भाग 209 गतांक से आगे…. अब प्रश्न पैदा होता है आत्मा शरीर से निकलता कैसे है? मुक्तात्मा के लिए सुषुम्णा नाड़ी, जो काकू में से गुजरकर, कपाल को भेदकर , बालों का जहां अंत है, वहां से जाती है। यह सुषुम्णा नाड़ी आत्मा के शरीर में से निकलने का मार्ग है। इस प्रकार जो […]
Month: December 2017
ऋषभ कुमार मिश्र ‘असफल विद्यालय’ का तर्क देकर सरकार अपने दायित्व से पीछा नहीं छुड़ा सकती। विद्यालयों की स्वायत्तता निजी हाथों में सौंपने से पहले अपनी विरासत को याद करना जरूरी है। महात्मा गांधी एक आत्मनिर्भर और स्वायत्त विद्यालय की परिकल्पना में विश्वास करते थे। एक ऐसा विद्यालय जिसका प्रबंधन स्थानीय समुदाय के पास हो […]
हिमालय और गुजरात के चुनावों में हमने नेताओं की कुछ हल्की बातें देखी हैं। जब ‘हल्के’ लोगों को बड़ी जिम्मेदारी दी जाती है या वे हमारे द्वारा अपने नेता मान लिये जाते हैं तो उनसे ऐसी हल्की बातों की अपेक्षा की जा सकती है। हमारे नेताओं को कौन समझाये कि विकास कभी ‘पागल’ या ‘बदतमीज’ […]
कांग्रेस का सोनिया कालकांग्रेस से सोनिया काल विदा ले चुका है। अब वह अस्ताचल की ओर है। बेशक उन्होंने कांग्रेस की तथाकथित शानदार परम्परा का निर्वाह करते हुए अपना ‘सिंहासन’ अपने पुत्र राहुल को सौंप दिया है, पर वह अब बुझता हुआ दीप ही कही जाएंगी। क्योंकिअब वह कांग्रेस अध्यक्ष पद पर या भारत के […]
गीता का चौथा अध्याय और विश्व समाज अर्जुन! तुझे याद रखना चाहिए कि जो व्यक्ति सहज प्राप्त वस्तु से सन्तुष्ट है, सुख-दु:खादि द्वन्द्वों से दूर है उनसे परे हो गया है अर्थात उन्हें अपने पास फटकने तक नहीं देता और न स्वयं उधर कभी जाता हुआ देखा जाता है अर्थात चोरी करते हुए देर सवेर […]
बिखरे मोती-भाग 186 गद्दारी महामारी एक, किन्तु रूप अनेक। संत गृहस्थी राजा भी, जमीर रहे हैं बेक ।। 1116 ।। व्याख्या :- गद्दारी से अभिप्राय विश्वासघात से है अर्थात विश्वास में धोखा करने से है। आज समाज अथवा राष्ट्र में, यहां तक कि परिजनों, मित्र, बंधु बांधवों में सबसे अधिक अवमूल्यन हुआ है तो वह […]
बिखरे मोती-भाग 208 गतांक से आगे…. शिवपुराण में श्रद्घा के संदर्भ में कहा गया है-”मां की तरह हितकारिणी यदि कोई शक्ति मनुष्य के मानस में हो सकती है, तो वह शक्ति-श्रद्घा है।” श्रद्घा के संदर्भ में ‘शतपथ-ब्राह्मण’ में कहा गया है-”आध्यात्मिक अथवा धार्मिक राह पर चलने के लिए सबसे अधिक जिस ऊर्जा अथवा शक्ति की […]
गीता का चौथा अध्याय और विश्व समाज इसी आनन्दमयी सांसारिक परिवेश को ‘विश्वशान्ति’ कहा जाता है। जिनका चित्त मैला कुचैला है, हिंसक है, दूसरों पर अत्याचार करने वाला है-उनका भीतरी जगत उपद्रवी और उग्रवादी होने से हिंसक हो जाता है, जिसमें शुद्घता नाम मात्र को भी नहीं होती। फलस्वरूप उनका बाहरी जगत भी तदनुरूप बन […]
‘सदगुण विकृति’ करती रही हमारा पीछा औरंगजेब ने अपने शासनकाल में चित्तौड़ पर कई आक्रमण किये, पर इस बार के आक्रमण की विशेषता यह थी कि बादशाह स्वयं सेना लेकर युद्घ करने के लिए आया था। मुगलों का दुर्भाग्य रहा कि बादशाह की उत्साहवर्धक उपस्थित भी युद्घ का परिणाम मुगलों के पक्ष में नही ला […]
भारत में एक समय था जब गर्मियों के दिनों में विवाह समारोहों को इसलिए नहीं रखा जाता था कि उन दिनों में दूध की कमी पड़ जाती थी। लोग सर्दियों में विवाहादि करना उचित मानते थे। पर आज की स्थिति में व्यापक परिवर्तन आ चुका है। अब आप एक छोटे कस्बे में भी यदि 50 […]