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डॉ राकेश कुमार आर्य की लेखनी से

दूध माफिया : मानव जाति के हत्यारे

भारत में एक समय था जब गर्मियों के दिनों में विवाह समारोहों को इसलिए नहीं रखा जाता था कि उन दिनों में दूध की कमी पड़ जाती थी। लोग सर्दियों में विवाहादि करना उचित मानते थे। पर आज की स्थिति में व्यापक परिवर्तन आ चुका है। अब आप एक छोटे कस्बे में भी यदि 50 विवाह, शादियां होते देखते हैं तो भी वहां दूध की कमी नहीं पडऩे वाली। भारत में फिर से दूध की नदियां बहने लगी हैं?
इसका अभिप्राय यह नहीं है कि देश में ‘रामराज्य’ आ गया है। इसके विपरीत सच यही है कि इस समय घोर कलियुग चल रहा है। इसी कलियुग में मिलावटी दूध और घी आप जितना चाहो उतना ले सकते हैं। आजकल दूध में मिलावट नहीं होती-अर्थात दूध में पानी नहीं मिलाया जाता है-अपितु पानी में दूध मिलाया जाता है। पानी को सफेद करके फिर उसमें एक विशेष प्रकार के केमिकल्स मिलाये जाते हैं, जिनसे बनावटी दूध तैयार हो जाता है। यह (मिलावटी नहीं) बनावटी दूध लोगों में फेफड़ों की, कैंसर की और आंतों की बीमारियां पैदा कर रहा है और नई उम्र के बच्चे भी अकाल मृत्यु के शिकार हो रहे हैं।
बड़े शहरों में बनावटी दूध का प्रयोग अधिक है, अब तो यह कस्बों और गांवों की ओर भी बढ़ रहा है। कहने का अभिप्राय है कि भविष्य की महामारी देश के हर-आंचल को अपने कब्जे में लेने को पांव फैला रही है।
स्वामी रामदेव जी महाराज जैसे ‘संस्कृति भक्त’ लोगों ने देश में स्वदेशी के प्रति लगाव पैदा करके जनजागरण का अच्छा कार्य किया है। पर बनावटी दूध की समस्या से देश को मुक्ति दिलाने की ‘रामबाण औषधि’ उनके पास भी नहंी है। उनके यहां अधिकतर उत्पाद बेहतर ढंग से तैयार हो रहे हैं, ‘दन्तकान्ति’ जैसे टूथपेस्ट ने ही अनेकों लोगों को दांतों की बीमारी से मुक्त कर दिया है, इसी प्रकार बाबा रामदेव गाय का घी भी लोगों को दे रहे हैं। जब तक देश में उचित अनुपात में गायों का अस्तित्व ही नहीं होगा-तब तक देश में गाय के दूध और घी की उचित आपूर्ति किसी भी प्रकार संभव नहीं है। देश में इस समय दो करोड़ गोवंश भी नहीं होगा। पर जितना भी है इस सबको भी चलती-फिरती कब्रों (मनुष्य का पेट) में काट-काटकर फेंकने की तैयारी की जा रही है। इस पर देश के संजीदा लोगों को गम्भीर चिन्ता हो रही है। परन्तु गोपालक कृष्णजी के वंशज लालू प्रसाद यादव मोदी सरकार पर तंज कस रहे हैं कि एक समय था जब देश में शेर, चीते, बघेड़े आदि से डर लगा करता था, पर आज तो गाय से डर लगता है। उनका आशय सरकार द्वारा गोवंश को मारते पाये जाने वाले अपराधियों के खिलाफ हो रही कार्यवाही से है। वे नहीं चाहते कि देश में गोवंश बचे। जब देश के राजनीतिज्ञों की सोच ऐसी हो तो देश में दूध की कमी होकर बनावटी दूध को बनाने का ही रास्ता साफ होता है। दूसरे शब्दों में देश को आंतों, फेफड़ों व कैंसर की महामारी में धकेलना तो इन ‘लालुओं’ को स्वीकार है, पर गोवंश जीवित रहे और देश का यौवन सुरक्षित व स्वस्थ रहे-यह उन्हें स्वीकार नहीं है। ‘वोटों’ की राजनीति ने इन ‘यादव वंशियों’ की भी बुद्घि खराब कर दी है।
एक सज्जन कह रहे थे कि वह गाय का दूध 75 रूपये किलो बेचता है, और गौघृत 1400 रूपये किलो बेचता है। उससे पूछा गया कि जब मार्केट में 35-40 रूपये किलो दूध और 550 रूपये किलो गोघृत (बाबा रामदेव वाला) उपलब्ध है तो तुम इतना महंगा क्यों बेच रहे हो? तब उसने बताया कि गाय का चारा व चोकर इतना महंगा हो गया है कि दूध 75 रूपये किलो से कम पर बिक नहीं सकता। इसी प्रकार घी की स्थिति है। अब वास्तविक दूध और घी यदि आप लेना चाहें तो वह आपको इस मूल्य पर मिलेगा। पर बाजार में बनावटी दूध और घी आपको 35-40 रूपये किलो दूध और बनावटी घी तो 300-350 रूपये किलो तक मिल रहा है, ऐसे में कोई व्यक्ति असली दूध, घी क्यों खरीदेगा? वह तो सस्ता ही खरीदना चाहेगा जो उसे बड़ी सहजता से उपलब्ध है। धनिक वर्ग दूध और घी का स्वाद भूल चुका है-उसे तो बनावटी दूध ही दूध लगता है और बनावटी घी ही घी लगता है, इसलिए उसे असली घी दूध की आवश्यकता ही नहीं है। वह चाय में भी ‘ग्रीन टी’ पसंद कर रहा है और दूध को अपने जीवन से निकालता जा रहा है। इसके बाद मध्य वर्ग की बात आती है-उसमें बहुत से ऐसे परिवार हैं जो कि किसान पृष्ठभूमि से जुड़े हैं और जिनके बड़े बजुर्गों को असली दूध व घी की पहचान है, वे दूधिया को टोकते भी हैं कि असली दूध व घी लाओ, पर इस टोकने का लाभ कुछ भी नहीं होता। वह दूधिया उनका मूर्ख बनाता है, और कहता है कि आपके लिए अलग डिब्बी में गाय का दूध लाता हूं, जबकिसच यह होता है कि अपनी साइकिल पर वह जिस छोटी डिब्बी को लटकाये रखता है-उसमें भी वह बनावटी दूध ही रखता है। जिसे वह आपके यहां खाली करता है तो आपके घर से आगे चलकर उसे फिर अपने बड़े डिब्बे में पड़े दूध से भर लेता है और फिर उसे अगले घर में जा पलटता है। इस प्रकार हमारा मध्यम वर्ग भी बनावटी दूध पीने के लिए अभिशप्त हो चुका है।
अब आते हैं देश के निम्न वर्ग पर। उसकी तो बेचारे की वैसे ही रीढ़ टूट चुकी है। वह अपनी गरीबी में असली दूध पीने की बात सोच भी नहीं सकता। इस प्रकार देश के ‘श्वेत बाजार’ पर दूध माफियाओं का एकाधिकार हो चुका है। ये ऐसे लोग हैं जिन्होंने देश से गाय को समाप्त करने का महाजाल बुन रखा है। ये नहीं चाहते कि देश में गाय और भैंस जैसे दुधारू पशु रहें। इन्हें ये शीघ्रातिशीघ्र समाप्त कर देना चाहते हैं। जिससे कि उनका दूध बाजार में एकाधिकार को चुनौती देने वाला ही न रहे। जब लालू प्रसाद यादव जैसे लोग गोहत्यारों को बचाने की वकालत करते हैं तो उस समय समझना चाहिए कि ये लोग उन लोगों की वकालत कर रहे हैं जो देश में दूध माफियाओं के रूप में सक्रिय हैं और चांदी काट रहे हैं। इन्हीं दूध माफियाओं के कारण देश के किसानों में आत्महत्या की प्रवृत्ति बढ़ रही है। देश का किसान कभी भी अपनी खेतीबाड़ी से संपन्न नहीं हो सकता। उसे दूध, घी भी चाहिए और ये उससे छीने जा रहे हैं, दूध घी के रहते किसानों को सूखे मेवे खाने की आवश्यकता नहीं पड़ती थी, घर में घी, दूध, दही व लस्सी होने से किसान परिवार को सब्जी बनाने की आवश्यकता नहीं होती थी, वह इन्हीं से भोजन कर लेता था। इस प्रकार दूध घी से उसके स्वास्थ्य की रक्षा हो जाती थी। उसे पराली जलाने की आवश्यकता नहीं पड़ती थी, क्योंकि उसके पशु उसे खा लेते थे। उसे खाद की आवश्यकता नहीं पड़ती थी-क्योंकि उसके पशु गोबर की खाद तैयार करने में उसकी सहायता करते थे, उसे टै्रक्टर की आवश्यकता नहीं थी-क्योंकि उसे घर की गाय से बैल मिल जाते थे-वह प्रकृति का मित्र था और प्रकृति उसकी मित्र थी। बनावटी दूध के माफियाओं ने किसान और प्रकृति की मित्रता के इस चक्र को तोड़ दिया है। जिससे किसान भूखा मर रहा है, लोग इस सच को या तो समझ नहीं रहे हैं या फिर समझकर भी उससे मुंह फेर रहे हैं।
देश को इस समय सचमुच ‘महाश्वेत क्रान्ति’ की आवश्यकता है। इसके लिए ‘पशु-हत्या निषेध कानून’ को और भी कड़ा बनाने की आवश्यकता है। हमें जागरूक होना होगा और मनुष्य के पेट को पशुओं की कब्र बनाने से रोकने की दिशा में सक्रिय कदम उठाने होंगे। देश में दूध माफियाओं को मानवजाति का हत्यारा घोषित करना होगा। इन हत्यारों के विरूद्घ ‘मानव हत्या’ के केस दर्ज कराये जाएं। यदि इन केसों से किसी ‘लालू’ को या किसी ‘भालू’ को कोई आपत्ति हो तो उसे देश की जनता उपेक्षित करे और साथ ही ऐसे लोगों को अपराधियों का संरक्षक मानकर उनके प्रति घृणा का भाव प्रकट किया जाए।

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