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कविता

गीता मेरे गीतों में , गीत 41 ( गीता के मूल ७० श्लोकों का काव्यानुवाद)

अन्तकाल में ईश्वर चिंतन मन – वचन – कर्म के द्वारा जो आचरण पर ध्यान दिया करते। आत्मबोध उन्हें हो जाता है , सब उनको ही योगी कहा करते।। ‘धर्म – मेध’ समाधि के द्वारा ‘ब्रह्म – बोध’ उन्हें हो जाता है। रोग- शोक -भोग जितने जग के ,छुटकारा भी मिल जाता है।। योगज – […]

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इतिहास के पन्नों से

नेहरू ने अपनी पहली टीवी कांफ्रेंस में ही संकेत दे दिया था कि वह गलत राह पर हैं

जब किसी नई तकनीक से किसी राजनीतिज्ञ का पाला पड़ता है तो कुछ मुश्किल है उसे भी झेलनी पड़ती हैं। कुछ लोग उन मुश्किलों को स्वीकार कर लेते हैं तो कुछ स्वीकार नहीं करने का नाटक करते हैं। पर सच यह है कि विज्ञान और तकनीक के नए-नए प्रयोगों को समझना हर किसी के बस […]

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डॉ राकेश कुमार आर्य की लेखनी से

ऋषि दयानंद और देश की वर्तमान हालत

‘आर्याभिविनय’ नामक अपनी पुस्तक के दूसरे अध्याय के पहले मंत्र में स्वामी दयानंद जी महाराज लिखते हैं कि – “हे प्रभु ! आप के अनुग्रह से हम सब लोग परस्पर प्रीतिमान, रक्षक, सहायक, परम पुरुषार्थी हों। एक दूसरे का दुख न देख सकें। स्वदेशस्थादि मनुष्यों को परस्पर अत्यंत निर्वैर, प्रीतिमान, पाखंडरहित करें।” इस कथन से […]

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कविता

गीता मेरे गीतों में , गीत … 40 ( गीता के मूल ७० श्लोकों का काव्यानुवाद)

अध्यात्म ज्ञान की आवश्यकता आनंद यदि पाना है तो भगवान की भक्ति करते चलो। जो भी मिले दीन दुखी जग में सबकी पीड़ा को हरते चलो।। सम्मान मिले- अपमान मिले मत ध्यान लगाओ इसमें कभी। भगवान की देन समझ करके, संतोष मनाओ उसमें सभी ।। दो दिन का जग का मेला है, बस धर्म पुण्य […]

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कविता

गीता मेरे गीतों में , गीत 39 ( गीता के मूल ७० श्लोकों का काव्यानुवाद)

परमेश्वर की विलक्षण शक्ति आर्त्त लोग भजते ईश्वर को , जिज्ञासु भी उसका यजन करें, अर्थी अर्थात कामना वाला भी उसका नियम से भजन करे। ज्ञानी भी उसको भजता है , पर उसका भजन सबसे उत्तम, परमात्मा है सब कुछ जग में- वह ऐसा मानकर भजन करे।। ब्रह्म प्रकृति में रहकर भी प्रकृति से रहता […]

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कविता

गीता मेरे गीतों में , गीत 38 ( गीता के मूल ७० श्लोकों का काव्यानुवाद)

बौद्धिक उत्कृष्टता जहां-जहां ‘विभूति’ है जग में और दिखा करती ‘श्री’ कहीं, वह बनकर ‘अंश’ मेरे ‘तेज’ का , मानो जग में चमक रही। मैं अपने तेज के कारण अर्जुन! जगत को धारण किए रहूं, यह सृष्टि -नियम-अनुकूल बात है मानस में मेरे दमक रही।। जो भी सृष्टि में दिख रहा उसे भगवान की विभूति […]

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कविता

गीता मेरे गीतों में , गीत 36 ( गीता के मूल ७० श्लोकों का काव्यानुवाद)

सार तत्त्व तर्ज :- कह रहा है आसमां कि यह समा ……. धुआं दिखाई दे कहीं तो मान लो वहां आग है। जन मस्ती में गाते दिखें तो मान लो वहां फाग है।। जल को जीवन मानते सब , उसमें रस भगवान हैं। जल के बिन जीवन नहीं ,जीवन का जल आधार है।। नाम वासुदेव […]

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कविता

गीता मेरे गीतों में , गीत 35 ( गीता के मूल ७० श्लोकों का काव्यानुवाद)

ईश्वर की सर्वव्यापकता जीवन झोपड़ी जल रही उजड़ रहे हैं सांस। खांडव वन में पक्षीगण करते शोक विलाप ।। चला चली यहां लग रही गए रंक और भूप। समय पड़े तुझे जावणा मिट जावें रंग रूप ।। वह भीतर बैठा कह रहा , क्यों होता बेचैन ? धन – वैभव को भूलकर मुझे भजो दिन […]

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इतिहास के पन्नों से

गीता मेरे गीतों में , गीत 34 ( गीता के मूल ७० श्लोकों का काव्यानुवाद)

रचना और प्रलय तर्ज :- कह रहा है आसमां कि यह समा ……. रचना भी करता हूँ मैं ही , पालना करता हूँ मैं। सब चराचर की जगत में प्रलय भी करता हूँ मैं।। अहंकार वश जिसने किया जीना कठिन संसार का। ऐसे हर इक दुष्ट जन का संहार भी करता हूँ मैं ।। झोपड़ी […]

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कविता

गीता मेरे गीतों में , गीत 33 ( गीता के मूल ७० श्लोकों का काव्यानुवाद)

सर्व व्यापक में दृष्टि से उत्थान मैत्री का सम्मान करो , कुछ करुणा का भी ध्यान करो । मुदिता भी अपनाइए समय पर उपेक्षा का बर्ताव करो।। सुखीजनों को देख कीजिए – प्रेमपूर्ण मित्रता का अनुबंध। दु:खीजनों को देख कीजिए, करुणा का दया पूर्ण संबंध।। करते हों जो पुण्य जगत में , उनसे हर्षित हो […]

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