160 भोगों का उपभोग भी, ना कर पाते लोग। भरथरी कह कर गए , भोग रहे हैं भोग।। भोग रहे हैं भोग, पल-पल हम मरते जाते। जितना चाहें निकलना,उतना फंसते जाते।। बीत जाए यूं ही जीवन, नहीं समझते लोग। जीवन में नहीं कर पाते, भोगों का उपभोग।। 161 जाति बंधन छोड़ दो, यही मनुज का […]
अध्याय … 54 जाति बंधन छोड़ दो ……