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व्यक्तित्व

सदी के महानायक का मौन मुखर व्यक्तित्व

बोलने को तो सभी बोलते हैं। नदी, नाले, समंदर, झरने भी बोलते हैं। पशु-पक्षी भी बोलते हैं। महसूस करें तो विनाश के पूर्व और बाद का सन्नाटा भी बोलता है। किन्तु ये सब सिर्फ बोलते हैं या सिर्फ चुप रहते हैं। इंसान ही ऐसा है जो बोलकर भी चुप रह सकता है और चुप रहकर […]

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महत्वपूर्ण लेख

चलना जरा संभल के कंगना, अंगना टेढ़ा है

डॉ अवधेश कुमार अवध भारत की व्यावसायिक/व्यापारिक राजधानी मुम्बई यूँ तो हमेशा से ही खास रही है। आजकल उद्धव- संजय की नादानियों ने और कंगना की विरुदावलि ने तापमान कुछ ज्यादा ही बढ़ा दिया है। देश की तथाकथित बुद्धिजीवी जनता भी दो खेमों में एक-दूसरे पर गुर्राती नजर आ रही है। केन्द्र में बैठी भाजपा […]

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भाषा

पूर्वोत्तर भारत के साहित्यकारों का हिंदी के विषय में चिंतन

दुनिया में सर्वाधिक लोगों द्वारा बोली जाने वाली हिंदी भाषा अपने ही घर में विमाता बनाई गई है। गणतन्त्र भारत के सत्तर साल होने के बावजूद भी हिंदी को राजभाषा से राष्ट्रभाषा का छोटा सा सफर भी तय न करने दिया गया। दक्षिण और पूर्वोत्तर भारत में राजनीतिक उथल पुथल मचाकर हर बार माँग को […]

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कविता

कैसे हम सच्चाई को जान पाएंगे

जब गजनवी के दरबार से सोमनाथ का आकलन और खिलजी के दरबार से पद्मावती का आकलन, बख्तियार के दरबार से नालंदा का आकलन तथा गोरी के दरबार से पृथ्वीराज का आकलन पढ़ेंगे तो – कैसे हम सच्चाई को जान पाएँगे! जब बाबर के दरबार से राणा साँगा का मूल्यांकन और हुमायूँ के दरबार से सती […]

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कविता

वचन पर्व राखी

थाल सजाकर बहन कह रही,आज बँधा लो राखी। इस राखी में छुपी हुई है, अरमानों की साखी।। चंदन, रोली, अक्षत, मिसरी, आकुल कच्चे-धागे। अगर नहीं आए तो समझो, हम हैं बहुत अभागे।। क्या सरहद से एक दिवस की,छुट्टी ना मिल पायी? अथवा कोई और वजह है, मुझे बता दो भाई ? अब आँखों को चैन […]

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कविता

ईद मुबारक

  चाँद उतरता हो जिस आँगन, उसको ईद मनाने दे । अपनी किस्मत में बस रोजा, रोजा रोज निभाने दे । कब तक देख भरी माँगों को, अपना माथा फोडेंगे – चाँद अड़ा है अपनी जिद पर, हमको भी अड़ जाने दे ।। चाँद देखकर ईद मुबारक- तुम भी बोलो मैं भी बोलूँ। वर्षों तक […]

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कविता

सूर्य पुकार सुनो

सूर्य जगाय रहे जग को उठ रैन गई अब सोवत क्यों? जाग गये सब फूल कली तुम सोकर स्वप्न पिरोवत क्यों? शक्ति अपार भुजा में भरी प्रण आप करो अपने हिय से। काज धरा पर हैं जितने सब आन बने निज निश्चय से।।   प्रात हुआ यहि कारण की निशि के सपने सब पूर्ण करो। […]

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कविता

सोच सको तो सोचो

गिलगित बाल्तिस्तान हमारा है हमको लौटाओ। वरना जबरन ले लेंगे मत रोओ मत चिल्लाओ।। खून सने कातिल कुत्तों से जनता नहीं डरेगी। दे दो वरना तेरी छाती पर ये पाँव धरेगी।। तेरी मेरी जनता कहने की ना कर नादानी। याद करो आका जिन्ना की बातें पुन: पुरानी।। देश बाँटकर जाते जाते उसने यही कहा था- […]

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कविता

कोरोना बनाम मधुशाला

कोरोना बनाम मधुशाला जिनके घर में खाने के भी लाले पड़े हुए हैं। भूखे बच्चे बीवी बाबा साले पड़े हुए हैं। साकी की यादों पर पहरा झेले थे जो कल तक- मधुशाला में आज वही मतवाले पड़े हुए है।। जिनके घर के चुल्हे भी बेबस आँसू रोते हैं। औरों की रहतम पर खाते या भूखे […]

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कविता

कविता : श्रम

कब तक पूर्वज के श्रम सीकर पर यूँ मौज मनाओगे। आज बीज श्रम का रोपोगे तब कल फल को पाओगे। पूर्वज की थाती पर माना पार लगा लोगे खुद को- लेकिन अगली पीढ़ी को बद से बदतर कर जाओगे।। इसीलिए उठ नींद त्यागकर सूरज का दीदार करो। श्रम सीकर की कीमत समझो और कर्म स्वीकार […]

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