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पूर्वोत्तर भारत के साहित्यकारों का हिंदी के विषय में चिंतन

दुनिया में सर्वाधिक लोगों द्वारा बोली जाने वाली हिंदी भाषा अपने ही घर में विमाता बनाई गई है। गणतन्त्र भारत के सत्तर साल होने के बावजूद भी हिंदी को राजभाषा से राष्ट्रभाषा का छोटा सा सफर भी तय न करने दिया गया। दक्षिण और पूर्वोत्तर भारत में राजनीतिक उथल पुथल मचाकर हर बार माँग को महत्वहीन बना दिया गया। जबकि सच्चाई यह है कि कुछ तथाकथित राजनीतिक गलियारे के बाहर हिंदी को भारी जनसमर्थन प्राप्त है। समस्त भारत ही नहीं बल्कि कुछ बाहरी देशों में भी हिंदी कम से कम सम्पर्क भाषा के रूप में अवश्य प्रतिष्ठित है। विशाल शब्दकोश और समृद्ध व्याकरण ने अन्य भाषा भाषियों को भी बहुत प्रभावित किया है।

आइए, पूर्वोत्तर के लेखक वर्ग का हिंदी के प्रति विचार जानने की कोशिश करते हैं। कार्बिआलांग निवासी समराज चौहान जो कि लेखन के साथ साथ स्नातक के छात्र भी हैं, कहते हैं किं, ” न दीवार, न ही सीमा, एक ही है स्वर, एक ही है रंग इसका। जो अनन्त हृदयों को जोड़े, वही सर्वोत्तम भाषा है।
हिंदी के स्वागत में सारी धरती डोल रही है।
अब तो पूर्वोत्तर से केवल हिंदी बोल रही है।।”

उम्र के सातवें दशक में भी हिंदी की सेवा में संलग्न रहने वाली गृहणी बिमला शर्मा बोधा जी जोरहाट से कहती हैं कि, ” पूर्वोत्तर के रचनाकार हिंदी में अपनी गहरी पकड़ व पहचान बनाने में प्रयासरत हैं। हिंदी पत्र – पत्रिकाओं में लेखन से लेकर शिक्षा क्षेत्र में भी इनके कदम मजबूती से आगे बढ़ रहे हैं।”

तिनसुकिया से डॉ ऋतु गोयल जो कि उम्दा गज़लकार भी हैं, मानती हैं कि, “पूर्वोत्तर के लोग अब अलगाव की मानसिकता को छोड़कर हिंद, हिंदी व हिंदी भाषी को अपने दिल में स्थान देने लगे हैं। अब ये जान चुके हैं कि सर्वांगीण विकास के लिए हिंदी के माध्यम से समस्त देश को एक आत्मीय सूत्र में बाँधा जाना चाहिए।”

जोरहाट, असम से सेवानिवृत्त अधिकारी एवं सुविख्यात लेखिका डॉ रुणु बरुवा रागिनी चाहती हैं कि, “अनुवाद साहित्य को बढ़ावा देकर अंचल/प्रांत को हिंदी से समुचित तरीके से जोड़ा जा सकता है। इस दिशा में पहल करने की महती आवश्यकता है।”

हिंदी लेखन में रुचि रखने वाली लेखिका जयश्री शर्मा ज्योति जी पद्य में अपनी भावनाओं को व्यक्त करती हैं।
“पूर्वोत्तर के सातों प्रदेशों ने, हिंदी भाषा को अपनाया है।
अपनी भाषाओं के संग रख, इसे प्रेम से गले लगाया है।।”

शिक्षिका एवं लेखिका डॉ वाणी बरठाकुर विभा तेजपुर से विचार व्यक्त करते हुए कहती हैं कि, “असम की संस्कृति बेहद प्राचीन एवं बहुत समृद्ध है। अगर इसे देश के कोने कोने में पहुँचाना है तो हिंदी में लिखना होगा। हिंदी न केवल एक भाषा है बल्कि समस्त भारत को जोड़ने का सूत्र भी है। मुझे गर्व है कि मैं हिंदी में ही ज्यादातर लिखती हूँ।”

सेवानिवृत्त शिक्षक एवं कवि कृष्णा कोविद जी हिंदी की उत्पत्ति और वर्तमान में उसकी उपयोगिता को बताते हैं। “हमारे पूर्वोत्तर के बहुत से गुणी ज्ञानी साहित्यकार हिंदी भाषा को समृद्ध करने में बहुमूल्य योगदान कर रहे हैं। इनके प्रयासों से हिंदी वैश्विक स्तर पर सम्मानित हो रही है।”

कलियावर, असम में शिक्षिका के रूप में कार्यरत कल्पना देवी आत्रेय का हिंदी प्रेम कुछ यूँ छलक पड़ा, “हिंदी में जो मिठास और अपनापन झलकता है, दूसरी भाषा में नहीं। पूर्वोत्तर में कई संस्थाएँ पूरी निष्ठा से हिंदी के प्रचार प्रसार में लगी हैं।”

सेवानिवृत्त प्राचार्य डॉ चन्द्रकांता शर्मा जी पूर्वोत्तर में हिंदी के विकास की कहानी बहुत हर्षित होकर बताती हैं। ये कहती हैं कि, “कई भाषाओं की लिपि देवनागरी है जिससे हिंदी से अनायास ही सम्बंध जुड़ जाता है। हिंदी वह सेतु है जिसने पूर्वोत्तर को भीतर और बाहर दोनों जगहों पर जोड़ा है।”

न केवल पूर्वोत्तर के लोग बल्कि पूर्वोत्तर की भाषाओं ने भी खुले दिल से हिंदी को अपनाया है। एक प्रोफेसर ने जब कहा था कि ‘हिंदी हत्यारन है जो स्थानीय भाषाओं को लील जाती है’ तो पूर्वोत्तर के लोगों ने जोरदार तरीके से इस वक्तव्य का विरोध किया था। हिंदी को दूने उत्साह एवं अपनत्व के साथ अपनाया। अब हिंदी यहाँ की जनप्रिय भाषा बन रही है।

प्रस्तुति: डॉ अवधेश कुमार अवध
मेघालय – 8787573644

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