गुण कर्म स्वभाव के आधार पर ईश्वर के अनेक नामों की सूची

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(ऐसे कुछ साथियों के विशेष आग्रह पर पुनः प्रसारित जो इस लेख को ईश्वर के नाम, रूपों को विशेष रूप से संग्रह करना चाहते हैं पूर्व प्रसारित किए गए लेख में कुछ संशोधन के साथ इसलिए प्रेषित किया जाता है)
10 अप्रैल 2024 की प्रातः कालीन बेला यथायोग्य आदर व सम्मान के साथ अभिवादन करते एवं छोटों को शुभ आशीष देते हुए हुए।

प्रिय आत्मन ।

ईश्वर के अनंत गुण कर्म स्वभाव हैं। इसलिए उसके अनंत नाम भी हैं। जो प्रत्येक नाम गुण, कर्म और स्वभाव के आधार पर हैं। जैसे ईश्वर अजन्मा है, अर्थात उसका जन्म नहीं होता, जब जन्म नहीं होता तो उसका मरण भी नहीं होता ,अर्थात वह अमर है ,अर्थात वह अजर है, अर्थात ईश्वर का आदि व अंत नहीं है।
ईश्वर अजन्मा है ।
ईश्वर का आदि व अंत नहीं है।
ईश्वर अंतर्यामी है ।
ईश्वर सभी काल में विद्यमान रहता है ।
इससे सिद्ध होता है कि ईश्वर प्रलय काल में भी चेतन रहता है।

ईश्वर ही त्रिकालज्ञ है।
अर्थात वही वर्तमान ,भूत और भविष्य को एकमात्र सदैव से जानने वाला है।
इसलिए कहा जाता है कि हे ईश्वर तू ही तू है ।
ईश्वर ही माता है ।
ईश्वर ही पिता है।
ईश्वर ही परमपिता है।
ईश्वर ही पिताओं का पिता है।
ईश्वर ही भ्राता है ।
ईश्वर ही सखा है ।
ईश्वर ही पैदा करने वाला है ।
ईश्वर ही सृष्टि कर्ता है ।
ईश्वर ही सृष्टा है।
ईश्वर ही धर्ता है।
ईश्वर ही भर्ता है।
ईश्वर ही हर्ता है।
ईश्वर ही कर्ता है ।
ईश्वर ही सर्वरक्षक है।
ईश्वर ही साक्षी है।
ईश्वर ही सर्वेश्वर है ।
ईश्वर ही संहारक है ।
ईश्वर ही राजा है ।
ईश्वर ही राजाओं का राजा है।
ईश्वर से बड़ा कोई राजा नहीं।
ईश्वर ही गुरु है ।
ईश्वर ही गुरुओं का गुरु है।
ईश्वर ही आदि गुरु है।
ईश्वर से बड़ा कोई गुरु नहीं।
ईश्वर ही निर्भय है।
ईश्वर ही निर्भांत ‌है।
ईश्वर ही संशय रहित है।
ईश्वर ही प्रकाशक है।
ईश्वर ही प्रकाशों का प्रकाश है।
ईश्वर ही आचार्य है।
ईश्वर ही रोम रोम में समाया हुआ है
ईश्वर जर्रे जर्रे में रमाया हुआ है।
ईश्वर ही कण-कण में व्याप्त है ।
(ईशावास्यमिदं यत्किंच जगत्याम जगत)
ईश्वर ही सर्वाधार है।
ईश्वर की माया अपरंपार है।
ईश्वर ही अजब रचनाकार है ।
ईश्वर ही गजब का सृजनहार है।
ईश्वर ही दयालु है ।
ईश्वर ही कृपालु है।
ईश्वर ही ज्ञान का सागर है।
ईश्वर ही इस जगत का आधार है ईश्वर ही सर्वाधार है।
ईश्वर ही अजर है ।
ईश्वर ही अमर है।
ईश्वर ही सर्वनियंता है ।
ईश्वर ही नियामक है।
ईश्वर ही रवि है ।
ईश्वर ही सोम है।
ईश्वर ही मंगल है ।
ईश्वर ही बुध है ।
ईश्वर ही बृहस्पति है ।
ईश्वर ही शुक्र है ।
ईश्वर ही शनि है।
ईश्वर ही शुद्धबुद्ध है।
ईश्वर ही सर्वशक्तिमान है ।
ईश्वर ही सर्वान्तर्यामी है।
ईश्वर ही ब्रह्मा है।
ईश्वर ही विष्णु है।
ईश्वर ही शिव है ।
ईश्वर ही विभु है।
ईश्वर ही अनंत है।
ईश्वर ही सब में ओतप्रोत है।
ईश्वर ही अग्नि है।
ईश्वर ही प्राण है।
ईश्वर ही प्रजापति है।
ईश्वर ही मनु है।
ईश्वर ही अक्षर है ।
ईश्वर ही इंद्र है ।
ईश्वर ही विराट है ।
ईश्वर ही सूक्ष्मतम है।
ईश्वर ही वरुण है।
ईश्वर ही विश्व है।
ईश्वर ही विश्वंभर है ।
ईश्वर ही हिरण्यगर्भ है।
ईश्वर ही वायु है ।
ईश्वर ही तेज है ।
ईश्वर ही तेजस है ।
ईश्वर ही आदित्य है ।
ईश्वर ही यज्ञ है ।
ईश्वर ही प्रज्ञ है ।
ईश्वर ही प्राज्य है ।
ईश्वर ही अव्यक्त है।
ईश्वर ही अगोचर है।
ईश्वर ही प्रकृति प्रेरक है।
ईश्वर ही अपरिमित सामर्थवान है।
ईश्वर ही परमेश्वर है।
ईश्वर ही न्यायाधीश है।
ईश्वर ही कल्याणकारी है ।
ईश्वर ही आत्मा है ।
ईश्वर ही परमात्मा है।
ईश्वर ही देव है ।
ईश्वर ही देवों का देव है।
ईश्वर ही महादेव है।
ईश्वर से बड़ा कोई देव नहीं।

ईश्वर ही वसु है।
ईश्वर ही आकाश है।
ईश्वर ही प्रकाश है।
ईश्वर ही ज्ञान है।
ईश्वर ही प्रज्ञान है।
ईश्वर ही ज्ञान का अथाह भंडार है ।
ईश्वर ही ज्ञान का आदि स्रोत है।
ईश्वर ही पृथ्वी है।
ईश्वर ही जल है ।
ईश्वर ही अत्ता है ।
ईश्वर ही रूद्र है।
ईश्वर ही राहु है।
ईश्वर ही केतु है ।
ईश्वर ही होता है ।
ईश्वर ही चित् है ।
ईश्वर ही अज है ।
ईश्वर ही नित्य है ।
ईश्वर ही पवित्र है ।
ईश्वर ही सच्चिदानंद है।
ईश्वर ही निराकार है ।
ईश्वर ही सगुण है ।
ईश्वर ही निर्गुण है ।
ईश्वर ही जगदीश्वर है।
ईश्वर ही गणेश है।
ईश्वर ही गणपति है ।
ईश्वर ही देवी है ।
ईश्वर ही देवता है
ईश्वर ही शक्ति है ।
ईश्वर ही सरस्वती है ।
ईश्वर ही लक्ष्मी है ।
ईश्वर ही न्याय है ।
ईश्वर ही न्यायकारी है।
ईश्वर ही विद्या है ।
ईश्वर ही यम है ।
ईही शंकर है।
ईश्वर ही आप्त है ।
ईश्वर ही काल है ।
ईश्वर ही प्रिय है।
ईश्वर ही स्व है ।
ईश्वर ही भू: है।
ईश्वर ही भुव: है।
ईश्वर ही स्वयंभू है ।
ईश्वर ही राम है।
ईश्वर ही निर्विकार है।
ईश्वर ही अनुपम है।
ईश्वर ही सर्वेश्वर हैं।
ईश्वर ही महेश (महा जमा ईश )है।
ईश्वर ही गणेश (गण जमा ईश) है।
ईश्वर हीमहान है।
किस-किस नाम से जाना जाए तुझे?
तुझे कैसे रिझाऊं?
तुझे कैसे खोजूं?
तुझे कैसे पहचानूं?
तेरे मिलने का स्थान कौन सा है?
तेरा ध्यान कब ,कैसे और कहां करूं?
कब तक पुकारा जाए तुझे? क्योंकि तू अनंत तेरी कथा अनंता,
तेरी कथा ही अनंत है ।
निदिध्यासन एवं प्राणिधान से ईश्वर को प्राप्त किया जा सकता है।
लेकिन प्राप्त करने के लिए हमको पहले यह मानना होगा कि हम ईश्वर की संतान हैं और हम उसके बच्चे हैं।
जैसे एक छोटा बच्चा अपने माता अथवा पिता के आदेश को मानता है, वैसे ही हमको ईश्वर के आदेश को मनाना होगा और ईश्वर के द्वारा वेदों में बताए गए रास्ते पर चलना होगा।
यहां यह भी समझना आवश्यक होगा कि वास्तव में ईश्वर से हमारा कोई स्वाभाविक संबंध नहीं है। अर्थात आत्मा परमात्मा का पुत्र नहीं है, परंतु ऐसा मानना एक नेमित्तिक संबंध है। जो हम आत्मा केवल अपने स्वार्थ के लिए ईश्वर के साथ नैमित्तिक संबंध स्थापित कर लेते हैं।
वैसे ईश्वर सदैव हमारे साथ रहता है क्योंकि वह सर्व व्यापक है। वह हमारे अंदर भी है। वह हमारे बाहर भी है। यह हमारे केवल देखने की दृष्टिकोण विशेष पर निर्भर करता है ।हम ईश्वर को सर्वत्र अनुभव कर सकते हैं। हम उसको कण कण‌ में तथा उसको जर्रे जर्रे में व्याप्त समझ सकते हैं। ईश्वर हमें प्रतिक्षण देखता है। इसलिए वह साक्षी है। इसलिए ईश्वर दृष्टा है ।इसलिए ईश्वर सृष्टा है ।ईश्वर नियंता है ।अर्थात ईश्वर सब जगह रहता है। उसका कोई विशेष स्थान नहीं। वह सातवें आसमान पर ना तीसरे चौथे पर है वह सर्वत्र व्याप्त है।

कुछ लोग कहते हैं कि ऊपर वाले की मर्जी।
यह ऊपर वाला सातवें आसमान का या तीसरे -चौथे आसमान का ऊपर वाला नहीं है। बल्कि इस ब्रह्मांड को चलाने वाला, इस ब्रह्मांड को रचने वाला, इस सृष्टि का आदि और अंत करने वाला, सर्व शक्तिमान, सर्वज्ञ ,सर्वान्तर्यामी ,सबसे ऊपर है तो वह केवल परमात्मा है। इसलिए वह ऊपर वाला कहा जाता है।किसी और कारण से नहीं कहते हैं उसको।
आत्मा अल्पज्ञ है। लेकिन ईश्वर सर्वज्ञ है। आत्मा में जो ज्ञान प्रयत्न वह आत्मा का स्वाभाविक नहीं बल्कि परमात्मा का ही दिया हुआ है।
ईश्वर का निज नाम केवल ओम है। परंतु ध्यान देने योग्य बात है कि शेष सब नाम अपने प्रवृत्ति निमित्त के अनुसार परमेश्वर की किसी एक विशेषता को अभिव्यक्त करते हैं। परंतु ओम उसके पूर्ण स्वरूप को अभिव्यक्त करता है। तथा उसके ही स्वरूप को प्रदर्शित करता है। अन्य किसी तत्व के लिए सर्वथा अप्रयुक्त है।
बहुत बड़ी विडंबना है कि कुछ लोग ईश्वर को मानते हैं परंतु जानते नहीं और सबसे अधिक मतभेद भी ईश्वर के विषय में है। सबसे अधिक झगड़ा भी इसी विषय पर है कि ईश्वर है या नहीं। यदि है तो कहां रहता है। कुछ लोग ईश्वर को जानते हैं। परंतु मानते नहीं ,क्योंकि भिन्न-भिन्न मत मत में ईश्वर के बारे में अनेक भ्रांतियां फैलाई गई हैं।

नेति _नेति ।
देवेंद्र सिंह आर्य एडवोकेट चेयरमैन उगता भारत समाचार पत्र

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