हरयाणवी जन जीवन पर वैदिक संस्कृति एवं आर्यसमाज का प्रभाव

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लेखिका = डॉ० कुमारी सुशीला आर्या एम०ए०, पी०एच०डी०
प्रस्तुति = अमित सिवाहा

            हरयाणा पुरातन काल से वैदिक संस्कृति का केन्द्र रहा है। इसे ब्रह्मष देश अथवा ब्रह्मदेश के नाम से पुकारा जाता था। इसकी वर्तमान संज्ञा तथा प्राचीन कई एक नाम संस्कृत भाषा परक है। इतिहास साक्षी है कि इस क्षेत्र में ऋषि मुनियों के बहुत से पवित्र आश्रम विद्यमान थे जिनमें तत्ववेत्ता प्रकाण्ड जीवन्मुक्त विद्वान् तथा ज्ञानपिपासुओं की पिपासा अपने उपदेशामत से शान्त किया करते थे। यज्ञ यागों का बाहुल्य था। मोर आदि पक्षी मृग गाय आदि पशु निर्भीक विचरण करते थे। मांसाहारी बिरला ही होता था। दूध घृत की प्रवृत्ति जन्मजात सर्वत्र थी।

         इस सांस्कृतिक प्रभाव के दर्शन अद्यावधि भी इस प्रदेश में यत्र तत्र सर्वत्र किए जा सकते हैं। जैसा कि हरयाणा प्रान्त के लिए प्रख्यात हो चुका है- 'देसाँ में देस हरयाणा, जित दूध दही का खाना'। वैदिक संस्कृति संस्कारशीलता पर आधारित है। मानवीय मनोभावों के परिष्करण का नाम शील है। हमारे हरयाणा में शील सदाचार का महत्व बहुत बढ़ा चढ़ा है। धन आदि साधनों में न्यून होने पर भी त्यागी एवं चरित्रवान् साधु सन्तों के सम्मान की यहां पुरानी परम्परा है।

हरयाणवी संस्कृति में वैदिक संस्कृति के मूलभूत सिद्धांत अभ्युदय एवं निःश्रेयस् को सम्मिलित सिद्धि को मुक्त कण्ठ से स्वीकारा गया है। इस लोक के साथ परलोक की चिन्ता एक सामन्न्य विषय बन चुका है। सामाजिक दृष्टि से यहां मनु महाराज प्रोक्त-

अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविन :
चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्विद्या यशोवलम् ।

की मान्यता निर्विवाद है। बड़ों के चरण स्पर्श की रीति यहां जन सामान्य में प्रचलित है। वधुए अपनी पूज्या वृद्धाओं (मास, नणद जेठानी) के सदा चरण दबाती रहती है। वैदिक संस्कृति के ‘अतिथिदेवो भव’ का आदेश रूप इस भूमि पर अनुप्राणित हो सका है। यहां घर आये व्यक्ति को पानी मांगने पर दूध दिया जाता है। गृह्यसूत्रों के कबन’ न वै देवा अश्नन्ति न पिबन्ति दृष्ट्वा हि तृप्तियन्ति ” का भावानुवाद इस प्रचलित लोकोक्ति में देखा जा सकता है-कुनबा खीर खावै अर देवता भला मानें। वेद के “स्थिरैरंगैर्पु ष्टवांसस्तनू : देवहितं यदायुः” के अनुसार अंगों की पुष्टि स्थिरता (दृढ़ता) शारीरिक आयाम हरयाणावासियों की अपनी विशेषता है। वेदों ने द्यूतादि से धन कमाने का निषेध करते हुए कृषि कर्म पर बल दिया है। ह्रयाणवी संस्कृति में इस आदेश का प्रक्षरशः पालन किया जा रहा है-‘कृषिमुत् कूषस्व वित्ते रमस्व बहुमन्यमानः’ ।

         वैदिक मान्यताओं का संबल लिए प्रगति पथ पर कदम बढ़ाता हुआ हरयाणा प्रान्त इस संस्कृति के पुनरुद्धारक महर्षि दयानन्द एवं आर्यसमाज का भी कम ऋणी नहीं है। आर्य समाज की विचार धारा के प्रसार प्रचार के लिए यहां का वातावरण विशेष अनुकूल रहा। शिक्षा का अभाव होने पर भी सामान्य पद्धति प्रचारकों विशेषतः भजनोपदेशकों ने हरयाणा का एक प्रकार से पिछली एक शताब्दी में काया पलट सा कर दिया। जो प्राचीन वैदिक मान्यताएं पाखण्डों की विडम्बना से क्षत विक्षत होने को थी उन्हें पुनः स्थापित किया गया। कोई ग्राम, कोई नगर मुहल्ला या 'पाना' इस विचारधारा के प्रभाव से अछूता न रहा। विवाह शादी के रीति रिवाज बदले। नाम बदले । संस्कार सुधरे। सामाजिक बुराइयां धूम्रपान मद्यपानादि को हतोत्साहित किया गया। नारी जाति का सम्मानित स्वरूप उभर कर सामने आया। गन्दे गीतों और अश्लील कामोत्त जक स्वांगों का स्थान चरित्र निर्माणकारी भजनों एवं वेदमंत्रों ने लिया। यज्ञोपवीत की प्रथा प्रचलित हुई। भाव भरे गीत गूंज उठे:-

बुरी लागे उघाड़ी ए जनेऊ बिन छाती
बिन घर्म नकारी ए ये काया कहलाती

सादगी तो हरयाणावासियों के जीवन में पहले ही थी। सरलता से अनुचित लाभ उठा कर इन्हें ठगने वाले पोपों की पोल आर्य समाज ने खोल दी। फिर क्या था ! हरयाणावासी जैसे अंगड़ाई ले नींद से उठ बैठे और लगे ऋषि दयानन्द के गुण गाने-

ऋषि दयानन्द आया ए, बदल गया ढंग सजनी ।

सामाजिक क्रांति के ये दृश्य बड़े ही लुभावने थे। कहां तो बाल विवाह इतना प्रचलित था कि लड़को को थाली में बिठा कर फेरे दिए जाते थे। इस विडम्बना का निराकरण कर कहां अब कन्या अपने विवाह के विषय में अभिभावकों को इस प्रकार की सधी हुई सलाह देने लगी-

दादा जी मैं कह रही तुम से मेरा वर आप जा ढूंढो ।
ढूंढो जी गुरुकुल के ब्रह्मचारी, रखें जो मुझे प्राणों से प्यारी।
लगा दो के ले के खम्बे दिला दो वेदी पर फेरे।

अथवा फिर विवाह की इतनी शीघ्रता भी क्या है-

पढूगीं चारों वेद जाऊंगी गुरुकुल में,
भाई गुरुकुल में, बहन गुरुकुल में,
मेरी भी मानों बात रहूंगी गुरुकुल में,

आर्यसमाज के इसी प्रभाव के फलस्वरूप हरयाणा में बड़ी संख्या में गुरुकुल खोले गए यद्यपि कन्याओं की उच्च शिक्षा का प्रबन्ध अभी भी इस प्रान्त में आनुपातिक दृष्टि से कम है।

हरयाणा के सभी प्रकार के लोकगीतों में आर्य समाज का प्रभाव स्पष्ट देखा जा सकता है। क्योंकि आर्य समाज के प्रचार का मुख्य माध्यम गीत ही रहे। शिक्षितों को संख्या न्यून होने से विद्वता से भरे व्याख्यान सुनने सुनाने की प्रवृत्ति तथा अवकाश उतना नहीं था। ढोलक की थाप और हारमोनियम की मधुर स्वर लहरी से खिच कर चली आई जनता के कानों में सरल सरस गीतों के माध्यम से वेदोक्त सिद्धांतों का ऊपदेशामृत उंडेला जाने लगा। पहले विवाहों में स्त्रियां गन्दे गीत गाती थी जिनमें अश्लीलता वा कलह की चर्चा रहती थी। अब उनके स्थान पर सदाचार, प्रेम, सौम्यता, गौ सेवा, सफाई, सास-ससुर की सेवा, पाखण्ड-त्याग जैसे स‌द्भाव भरे गीत प्रचलित हुए-

सासू की सेवा बस में, गौओं की सेवा बस में.
ये पोप जिमाना ए, एक कोन्या मेरे बस में

गहनों का व्यर्थ बोझ हरयाणा की नारी जाति के लिए एक प्रकार से अभिशाप रहा। स्वास्थ्य के लिए ये घातक, जान को भयदायक । बजने वाले आभूषण चंचलता को उभार कर चरित्र हनन के प्रेरक माने गए। तभी कर्त्तव्य बोध की दिशा दिखाने वाले गीत प्रचलित हुए-

मत टूम घड़ाओ बाजे को, तुम बेटो हो कोई राजे की ।

कहे कन्या कर जोड़, गन्दे रिवाजों को छोड़;
हमें विद्या के गहने पहनाओ पिता जी।

आयों एवं तथाकथित ‘पोपों’ की तुलना करने वाले गीत भी कम आकर्षक न थे-

क्याँह मैं राजी आर्य, जले क्याँह मैं राजी पोप
ए मन्ने प्यारे लाग्गै आरिये!

ब्याह मैं राजी आर्य, जले तेरामी मैं पोप ए
ए मन्नें प्यारे लागें आरिये ।

जैसे वाक्य अनेक गीतों के स्थायी स्वर बन गये। एक देवी के पति आर्य बन जाने से उसे किस प्रकार स्थायी सुख शांति का वरदान मिल सका यह इस लोकगीत की पक्तियों से स्पष्ट है-

ए मेरे आर्य हुए भरतार सखी मैं बहुत सुख पाई ए।
ए कदे दे ना मां की गाल कदे ना धमकी लाई ए।
ए जद हो जा मेरे ते खोट, अकेले जा समझाई ए।

सचमुच हरयाणा के जन जोवन में आर्यों ने एक नया मोड़ ला दिया-

नई नई रीत चलाई आरियाँ नै।
सारी पुरानी रीत छुड़ाई आारियां नै ।

और इस नवीनता के कारण ही-

आरियों की वैदिक चाल मेरे मन बस गई ए,
रंग बिरंगी झालर लटकें, हरी पीली सूही लाल
मेरे मन बस गई ए।

इस प्रभाव को अपने तक ही सीमित न रखकर सामान्य अनपढ़ बहिनों तक ने भी अपने पड़ौसिनों को बांटना प्रारम्भ कर दिया-

ए मेरी सुन ले पड़ौसन बात तनै समझा दयूंगी,
मेरे चाल गुरुकुल साथ जलसा दिखा दयूंगी,
ओड़े पंडत बाचे वेद तनै सुणवा दयूंगी ।

प्रस्तुत लोकगीत केवल कुछ उदाहरण हैं। वास्तव में आर्यत्व का पवित्र मात्र हरयाणा प्रान्त की नस नस में समाया हुआ है। भले ही यहां शोभायमान भवन आर्य समाज के नहीं हैं। शिक्षण संस्थायें भी दूसरे प्रांतों की तुलना में अधिक नहीं पुनरपि आर्य समाज के सिद्धांत कार्यक्रम एवं भावबोध को इस प्रान्त ने सच्चे हृदय से स्वीकारा है। इस कथन में कोई असंगति एवं विवाद नहीं हो सकता। भविष्य में इस प्रभाव की वृद्धि एवं सम्पोषण हम सबका नैतिक कर्तव्य है।

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