आखिर भारत छोड़कर विदेश क्यों चले जाते हैं लोग ?

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प्रह्लाद सबनानी

पूर्वी अफ्रीकी देशों में 20 लाख से अधिक भारतीय मूल के नागरिक रहते हैं। ये देश हैं, कीनिया, युगांडा, तंजानीया, मोजाम्बिक, घाना, माजागाडगस्कर। इसी प्रकार, कैरेबीयन देशों में बहुत बड़ी संख्या में भारतीय मूल के नागरिक रह रहे हैं।

भारतीय मूल के नागरिकों का भारत से पलायन प्रमुख रूप से तीन खंडकालों के दौरान हुआ है। प्रथम, वर्ष 1833 में भारतीय मूल के नागरिकों को बड़ी संख्या में (लगभग 15 लाख) दक्षिणी अमेरिका एवं कैरिबियन देशों में श्रमिकों के तौर पर भेजा गया था। उस समय भारत पर ब्रिटेन का प्रशासन चल रहा था। अतः ब्रिटेन के प्रशासन द्वारा भारतीय मूल के नागरिकों को मारिशस, गयाना, त्रिनिदाद, टुबैगो, कैरेबियन देशों- फिजी, मलय पेनिनसुला, पूर्वी अफ्रीकी देशों एवं दक्षिणी अफ्रीकी देशों में भेजा गया था। इसी खंडकाल में फ्रान्स प्रशासन द्वारा तमिलनाडु राज्य से कई भारतीय मूल के नागरिकों को रीयूनियन में भेजा गया था एवं पुर्तगाल प्रशासन द्वारा गोवा राज्य से कई भारतीय नागरिकों को मोजाम्बिक में भेजा गया था। उस खंडकाल में ब्रिटेन, फ्रान्स एवं पुर्तगाल का इन राज्यों पर प्रशासन चल रहा था और इन देशों की पूरे विश्व में कई कॉलोनियां थीं, जहां श्रमिकों के तौर पर नागरिकों की आवश्यकता थी। अतः भारतीय मूल के नागरिकों को उस खंडकाल में उक्त वर्णित देशों एवं अन्य कई देशों में भेजा गया था।

द्वितीय लहर के अंतर्गत वर्ष 1880 में कई भारतीय व्यापारी पूर्वी अफ्रीका एवं मध्य पूर्व के देशों में व्यापार करने की दृष्टि से वहां जाकर बस गए थे। विशेष रूप से गुजराती एवं सिंधी व्यापारी ओमान, दुबई, दक्षिणी अफ्रीका एवं पूर्वी अफ्रीका के देशों में जाकर बस गए थे। इसी के साथ पंजाबी, राजस्थानी, बलोची, सिंधी एवं कश्मीरी नागरिक आस्ट्रेलिया एवं कनाडा आदि देशों में जाकर बस गए थे।

वर्ष 1960-70 के खंडकाल में जो तीसरी लहर प्रारम्भ हुई थी वह आज तक जारी है। इस दौर में उच्च तकनीकी क्षेत्र में उच्च शिक्षा एवं उच्च कौशल प्राप्त भारतीय मूल के नागरिक उत्तरी अमेरिका एवं यूरोप के विकसित देशों में जाकर बस गए थे। वर्ष 1970 के आसपास मध्य पूर्व के अरब देशों में कच्चे तेल की भारी मात्रा में खोज हुई थी, इस खंडकाल में भारतीय मूल के नागरिक भारी संख्या में अरब देशों में श्रमिकों के रूप में जाकर बस गए थे। आज भी प्रतिवर्ष 25 लाख से अधिक भारतीय मूल के नागरिक अन्य देशों में जाकर बस जाते हैं, जो पूरे विश्व में अन्य देशों के मुक़ाबले में सबसे बड़ी संख्या है।

आज भारतीय मूल के 320 लाख से अधिक नागरिक विश्व के विभिन्न देशों में निवास कर रहे हैं। इनमें 140 लाख भारतीय नागरिक प्रवासी भारतीय के रूप में इन देशों में निवास कर रहे हैं एवं शेष 180 लाख भारतीय मूल के रूप में इन देशों के नागरिक बन चुके हैं। कुल मिलाकर 146 से अधिक देशों में भारतीय मूल के नागरिक निवास कर रहे हैं। कई देशों में तो भारतीय मूल के नागरिकों की संख्या आज भारी तादाद में हो गई है। ओमान, सेंट विन्सेंट, कुवैत, सूरीनाम, रीयूनियन फ्रान्स में भारतीय मूल के नागरिकों की संख्या इन देशों की कुल जनसंख्या का 20 से 30 प्रतिशत के बीच है। इसी प्रकार, युनाईटेड अरब अमीरात, फिजी, त्रिनिदाद एवं टोबेगो, गयाना एवं मारिशस में भारतीय मूल के नागरिकों की संख्या लगभग 40 प्रतिशत है। मारिशस में तो लगभग 70 प्रतिशत भारतीय मूल के नागरिक निवास कर रहे हैं। बल्कि, कुछ देशों, जैसे- युनाईटेड अरब अमीरात, यमन और वेनेजुएला में तो स्थानीय मूल के नागरिकों से अधिक भारतीय मूल के नागरिकों की संख्या हो गई है। मलेशिया में मलाया और चीनी के बाद तीसरा सबसे बड़ा जातीय समूह तमिल भाषाईयों का है जो वहां की कुल जनसंख्या का 8 प्रतिशत है। अमेरिका के न्यू जर्सी राज्य में तीसरी भाषा के रूप में गुजराती भाषा को मान्यता प्रदान की गई है।

पूर्वी अफ्रीकी देशों में 20 लाख से अधिक भारतीय मूल के नागरिक रहते हैं। ये देश हैं, कीनिया, युगांडा, तंजानीया, मोजाम्बिक, घाना, माजागाडगस्कर। इसी प्रकार, कैरेबीयन देशों में बहुत बड़ी संख्या में भारतीय मूल के नागरिक रह रहे हैं। गयाना, सूरीनाम, त्रिनिदाद, टुबैगो में भारतीय मूल के नागरिकों की संख्या सबसे अधिक है। जमैका, सेंट विन्सेंट में भारतीय मूल के नागरिकों की संख्या दूसरे नम्बर पर है। इसके साथ ही, बहामास, बारबाडोस, बेलीज, फ्रेंच गयाना, पनामा, ग्रेनाडा, ग्वाटेमाला, मैंटलूसिया, हैती, मार्टिनिक, ग्वाडेलोप में भी भारतीय मूल के नागरिक बड़ी संख्या में रहते हैं। साथ ही, फिलिपीन, जापान, सिंगापुर, नेपाल, म्यांमार में भी बड़ी संख्या में भारतीय मूल के नागरिक निवास कर रहे हैं। इसी प्रकार, इंडोनेशिया में भी कई शताब्दियों से भारतीय मूल के नागरिक रह रहे हैं। सनातन हिंदू धर्म का प्रचार प्रसार इंडोनेशिया में बहुत अधिक हुआ है। बाली की 87 प्रतिशत जनसंख्या हिंदू धर्म की अनुयायी है। अभी इंडोनेशिया में 1.25 लाख से अधिक भारतीय मूल के नागरिक निवास कर रहे हैं। इन देशों में भारतीय मूल के नागरिक उद्योग, व्यापार एवं अन्य क्षेत्रों की गतिविधियों में अपना योगदान देकर इन देशों की अर्थव्यवस्थाओं को आगे बढ़ाने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

उक्त देशों के अतिरिक्त विकसित देशों में भी भारतीय मूल के नागरिकों की संख्या में तेजी से वृद्धि हो रही है। उत्तरी अमेरिका के कनाडा में 15 लाख से अधिक भारतीय मूल के नागरिक निवासरत हैं, जो कुल जनसंख्या का 4 प्रतिशत हैं। ब्रिटिश कोलम्बिया की कुल जनसंख्या का 5 प्रतिशत हिस्सा भारतीय मूल के नागरिकों का है। प्रतिवर्ष लगभग 85,000 भारतीय मूल के नागरिकों को कनाडा में स्थायी निवास की अनुमति मिल रही है एवं लगभग 2 लाख से अधिक भारतीय उच्च शिक्षण प्राप्त करने के लिए प्रतिवर्ष विदेश जाते हैं। अमेरिका में 40 लाख से अधिक भारतीय मूल के नागरिक निवास कर रहे हैं जो अमेरिका की कुल जनसंख्या का लगभग 1.2 प्रतिशत है। अमेरिका में प्रतिवर्ष 80 प्रतिशत से अधिक एच1बी वीजा भारतीय मूल के नागरिकों को प्रदान किए जा रहे हैं। वर्ष 2016 में आस्ट्रेलिया में 11.31 लाख भारतीय मूल के नागरिक निवास कर रहे थे जो आस्ट्रेलिया की कुल जनसंख्या का 4.7 प्रतिशत है। वर्ष 2011 के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, ब्रिटेन में भारतीय मूल के 14.5 लाख नागरिक निवासरत थे, जो ब्रिटेन की कुल जनसंख्या का 2.3 प्रतिशत हिस्सा हैं। सिंगापुर में भारतीय मूल के नागरिकों की कुल 7 लाख से अधिक की संख्या, चीन एवं मलाया के बाद तीसरे स्थान पर है और यह सिंगापुर की कुल जनसंख्या का 9 प्रतिशत है।

भारत के बाद जिन अन्य देशों से बहुत बड़ी संख्या में नागरिक अन्य देशों में बस गए हैं उनमें रूस, मैक्सिको, चीन एवं सीरिया शामिल हैं। रूस एवं मेक्सिको से 1.1 करोड़ से अधिक नागरिक, चीन से एक करोड़ से अधिक नागरिक एवं सीरिया से 80 लाख से अधिक नागरिक दूसरे देशों की नागरिकता प्राप्त कर चुके हैं। मैक्सिको के 98 प्रतिशत नागरिकों ने अमेरिका की नागरिकता ली हुई है। सीरिया के 45 प्रतिशत नागरिकों ने टर्की की नागरिकता ली हुई है। जबकि भारतीय मूल के नागरिक पूरे विश्व में फैले हुए हैं। सबसे अधिक लगभग 35 लाख से अधिक भारतीय नागरिकों ने यूनाइटेड अरब अमीरात में नागरिकता ली हुई है जो भारत से कुल बाहर गए नागरिकों का 19 प्रतिशत है। अमेरिका में 27 लाख से अधिक भारतीय मूल के नागरिकों ने नागरिकता ली हुई है, सऊदी अरब में 25 लाख से अधिक भारतीयों ने नागरिकता ली है। इसी प्रकार, आस्ट्रेलिया, कनाडा, कुवैत, ओमान, कतर, ब्रिटेन जैसे देशों में बहुत बड़ी संख्या में भारतीयों ने नागरिकता प्राप्त की है।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विश्व की कुल जनसंख्या के 3.6 प्रतिशत नागरिक विभिन्न देशों में जाकर बस गए हैं। अमेरिका में सबसे अधिक 5.1 करोड़ नागरिक अन्य देशों से आकर बस गए हैं। जो अमेरिका की कुल जनसंख्या का 16 प्रतिशत है। जर्मनी में 1.6 करोड़ से अधिक नागरिक अन्य देशों से आकर बस गए हैं। सऊदी अरब में 1.3 करोड़ से अधिक नागरिक, रूस में 1.2 करोड़ से अधिक नागरिक एवं ब्रिटेन में 90 लाख से अधिक नागरिक अन्य देशों से आकर बस गए हैं।

आज विश्व के लगभग 50 से अधिक देशों में भारतीय मूल के नागरिकों की संख्या प्रभावशाली स्तर पर पहुंच गई है। अब समय आ गया है कि इन देशों में निवास कर रहे भारतीय मूल के नागरिकों द्वारा भारतीय सनातन दर्शन को पूरे विश्व को देने का प्रयास किया जाना चाहिए ताकि पूरे विश्व में शांति स्थापित की जा सके। भारत में भी इस सम्बंध में गम्भीरता से विचार किया जाना चाहिए कि किस प्रकार इन देशों में निवास कर रहे भारतीय मूल के नागरिकों के माध्यम से भारतीय सनातन दर्शन को विस्तार देने का कार्य किया जा सकता है। आज दरअसल विश्व के लगभग सभी देश आतंकवाद एवं पूंजीवाद के चलते निर्मित हुई विपरीत परिस्थितियों से त्रस्त हैं एवं इन देशों के नागरिक इन परेशानियों से छुटकारा पाना चाहते हैं जोकि केवल भारतीय सनातन दर्शन में ही सम्भव दिखाई देती है।

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