भारतीय संस्कृति के पुरोधा श्री कृष्ण जी का सदाचार

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योगिराज श्रीकृष्ण का सदाचार
महाभारत के प्रमुख पात्र योगिराज श्रीकृष्ण भारतवर्ष की महान् विभूतियों में से एक थे। वे सदाचारी और आदर्श पुरुष थे। वे आदर्श संयमी और मर्यादावादी व्यक्ति थे। पुराणकारों ने उनके उज्ज्वल स्वरूप को बिगाड़ दिया। उनकी देखा-देखी जयदेव, चण्डीदास और सूरदास आदि कवियों ने भी उनके रूप को बहुत विकृत कर दिया है। उनके विषय में यह कहा गया है कि वे जार थे और व्यभिचारियों के शिरोमणि थे। वे गोपियों के साथ रतिक्रिया करते थे। उनकी दासियाँ थीं। उनके कुब्जा और राधा के साथ वासनात्मक सम्बन्ध थे। इस प्रकार अनुचित लाँछन उन पर लगाये गये। उन्हीं को पढ़-पढ़ाकर विधर्मी लोग श्रीकृष्ण की बहुत निन्दा करते हैं। वास्तव में वे बहुत ऊँचे इन्सान थे और परमसंयमी पुरुष थे। उनके जीवन की एक घटना से उनके सदाचार और ब्रह्मचर्य का परिचय मिलता है―
ब्रह्मचर्यं महद्घोरं तीर्त्वा द्वादशवार्षिकम् ।
हिमवत्पार्श्वमास्थाय यो मया तपसार्जितः ।।
समानव्रतचारिण्यां रुक्मिण्यां योऽन्वजायत ।
सनत्कुमारस्तेजस्वी प्रद्युम्नो नाम मे सुतः ।।
―सौप्तिक पर्व १२.३०-३१
मैंने बारह वर्ष तक ब्रह्मचर्य का पालन करके हिमालय की गुफाओं में रहकर बड़ी तपस्या के द्वारा जिसे प्राप्त किया था, मेरे समान व्रत का पालन करनेवाली रुक्मिणी देवी के गर्भ से जिसका जन्म हुआ है, जिसके रूप में तेजस्वी सनत्कुमार ने ही मेरे यहाँ जन्म लिया है, वह प्रद्युम्न मेरा प्रिय पुत्र है।
बारह वर्ष के इस घोर ब्रह्मचर्य के पीछे एक घटना है। वह इस प्रकार है कि जब योगेश्वर श्रीकृष्णजी ने रुक्मिणी के साथ विवाह किया तो सुहागरात में रुक्मिणी से कहने लगे―रुक्मिणी! विवाह के पश्चात् सभी भोग-विलास में पड़ जाते हैं। हे रुक्मिणी! हम दोनों ब्रह्मचर्य-व्रत का पालन करें और ऐसी सन्तान उत्पन्न करें जो दिव्य-गुणयुक्त हो।’ ऐसी सन्तान के लिए ही उन्होंने बारह वर्ष तक बद्रीनाथ के स्थान पर रहकर ब्रह्मचर्य-व्रत का पालन किया और प्रद्युम्न नामक सन्तान को उत्पन्न किया। प्रद्युम्न भी अपने गुणों के कारण अद्वितीय स्थान रखता था। विश्व के इतिहास में गृहस्थ होते हुए भी इतने संयम-पालन का दूसरा उदाहरण मिलना दुर्लभ है। गृहस्थ में बारह वर्ष का ब्रह्मचर्य एक अद्भुत घटना है।
उनके विषय में कहा जाता है कि वे गोपियों के साथ रासलीला रचाते थे एवं राधा के साथ उनके यौन सम्बन्ध थे, परन्तु गीता का अध्ययन करते हुए पता चलता है कि वे सदाचार के परम पोषक थे―
यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः ।
न स सिद्धिमवाप्नोति न शान्तिं न परां गतिम् ।।
जो व्यक्ति शास्त्र की मर्यादा का उल्लंघन करता है और मनमानी करता है, वह न तो सफलता को प्राप्त होता है, न शान्ति को और न ही मोक्ष को प्राप्त होता है।
ध्यायतो विषयान् पुंसः संगस्तेषूपजायते ।
संगात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते ।।
क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः ।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ।।
―गीता २.६२-६३
विषयों का चिन्तन करने से उनमें आसक्ति उत्पन्न होती है, आसक्ति से विषयों की प्राप्ति की कामना, विषयों की अप्राप्ति से क्रोध, क्रोध से अविवेक ( मूढ़ता ), अविवेक से स्मृति में विकार, स्मृति में विकार से बुद्धि का नाश और बुद्धि के नाश से मनुष्य का नाश हो जाता है।
सोचने का विषय है कि सदाचार की इतनी ऊँची बातें कहनेवाला युगपुरुष परस्त्री-गमन करेगा? क्या वह पराई स्त्रियों के कपड़े उठाकर भाग जाएगा? क्या वह कुब्जा और राधा से समागम करेगा?
महाभारतकार ने तो उनके चरित्र पर कोई लांछन नहीं लगाया। हाँ, ब्रह्मवैवर्तपुराण, गोपाल-सहस्रनाम और विष्णुपुराण में श्रीकृष्णजी को दुराचारी सिद्ध किया गया है, परन्तु वास्तविक स्थिति ऐसी नहीं है। यह एक महापुरुष के चरित्र पर एक बहुत बड़ा कलंक है। वास्तव में वे सदाचार की दिव्यमूर्ति और पवित्रता एवं निर्व्यसनता की साक्षात् प्रतिमा थे।
साभार : ‘वेद सन्देश’ से, लेखक : प्रा. रामविचार एम. ए.

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