ऋषि दयानंद के काम इतने हैं कि कभी रुक नहीं सकते

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एक बात ध्यान रखनी चाहिये इतिहास से आप बड़ा लाभ उठा सकते हैं लेकिन यह तभी होगा जब आप वर्तमान में भी सक्षम होंगे। एक व्यक्ति सड़क पर पत्थर कूटने की मजदूरी कर रहा था। उससे किसी ने पूछा तू कौन हैं। यह बोलता हैं मेरे पिताजी तहसीलदार थे। उसने फिर अपना प्रश्न दोहराया तू कौन है। अब की बार यह बोला मेरे दादा जी जिलाधिकारी थे। इसने फिर से एक बार पूछा तू कौन है। यह इस बार भी ऐसा ही धमाकेदार उत्तर देता है मेरे परदादा प्रदेश सरकार में मन्त्री थे। क्या यह सब बताने से इस व्यक्ति की कोई बात बनेगी। दैनिक दहाड़ी यदि पांच सौ होगी तो कोई इसे साढ़े पांच सौ दे देगा। नहीं। इसलिये वेदों में पदे पदे बेटे बेटियों के लिये संदेश है अपने पिता पितामह आदि से अधिक परिश्रम करो और उनसे अधिक उन्नति और विकास करो। पिता यदि लैक्चरार थे तो तुम कम से कम प्रोफेसर तो बन जाओ। आजकल बड़ी हलचल है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लालकिले की प्राचीर से अनेक लोगों के नाम लिये जिन्होंने भारत को आजादी दिलवाने में एक दूसरे से बढ़कर बलिदान दिये लेकिन महर्षि दयानंद सरस्वती का नाम कहीं भी उल्लेख नहीं किया। हम इस पर आत्म चिन्तन करें। झंड़े उनके गढ़ते हैं जो स्वयं झंड़ा लेकर धमाकेदार तरीक़े से आगे बढ़कर चलते हैं और सावधानी पूर्वक जमाकर स्वयं झंड़ा गाढ़ते हैं। आर्य समाज का इतिहास बहुत अच्छा है इसमें कोई भी दो राय नहीं है। लेकिन साहब, क्यों भूल जाते है कि जो दिखता है वही बिकता है। वर्तमान में आपके शो रुम में दिख क्या रहा है। वही आपस के लडाई- झगड़े, तू -तू मैं -मैं, मुकदमेवाजी, लाठी डंडे, बन्दकें, खून खराबे, धोखाधड़ी आदि। आर्य समाज की सम्पतियों को खुद ही हड़पना, बेचना, लूट ले जाना। हमने अच्छी खासी बनी बनाई आर्य समाज की संस्थाओं को बरवाद कर दिया। गुरुकुल वृन्दावन अच्छा खासा विश्वविद्यालय था।वहां के स्नातक और परास्नातक अपने ही मौलिक ढ़ंग के धनी थे। डा. विजयेन्द्र स्नातक तो दिल्ली विश्वविद्यालय तक में एक सम्मानित खनक के साथ विभागाध्यक्ष थे। नरदेव स्नातक एम. पी. रहे और रेलवे वोर्ड़ के चेयर मैन भी रहे। लेकिन आज वह विश्वविद्यालय समाप्त है। आज उसकी भूमि बचना भी मुश्किल हो रहा है। किसने किया उस विश्वविद्यालय को इस तरह बरवाद। गुरुकुल कांगड़ी तो भारतीय शिक्षा विधि का सबसे पहला, सबसे मौलिक और सर्वाधिक सफलतम प्रयोग था। इस आदर्श शिक्षा संस्थान को देखने और दर्शन करने दुनिया के अनेक देशों से लोग आते थे और देखकर भारी हैरान होते थे। कम से कम साधन और भारी से भारी सब प्रकार का विश्वस्तरीय शिक्षा सम्बन्धी सौष्ठव। आज वह विश्वविद्यालय क्या है। देश की आजादी के ७५ वर्ष बाद भी प्रयोग के तौर पर विश्वविद्यालय। जिस गुरुकुल कांगड़ी ने आयुर्वेद को भारत की दृष्टि से उस अन्धेरे युग में भी विश्व स्तर पर अत्यन्त लोक प्रिय बनाया। आज उसका आयुर्वेद महाविद्यालय वर्षों पूर्व उसके हाथ से पूरी तरह निकलकर सरकारी संस्था बन चुका है। यह क्या हो रहा है। यह आर्य समाज विघातक ताण्डव कौन मचा रहा है। हम कर क्या रहे हैं आर्य समाज के बड़े बड़े कार्यक्रम व्यक्ति के कार्यक्रम बनकर रह जाते है। सती प्रथा के विरोध में राजस्थान में देवराला यात्रा आर्य समाज ने निकाली बहुत साहस का और बहुत बड़ा काम था लेकिन उस इतने बड़े काम को भी हम आर्य समाज वालों ने ही स्वामी अग्निवेश का काम बना कर छोड़ दिया। सन् 1983 में अजमेर में आर्य समाज का बहुत बड़ा सम्मेलन हुआ। क्या उसका श्रेय स्वामी आनंद वोध नहीं ले गये। होड़ल से चण्डीगढ़ शराब बन्दी के विरोध मे़ बहुत हद तक सफल शोभायात्रा निकली किसने उसका श्रेय आर्य समाज को दिया। उसमें अग्निवेश इन्द्रवेश और उनके साथी ही दिखाई देते थे। आज भी आप देखें, मैने स्वयं एक दिन श्रध्देय वरेण्य स्व. श्री राजसिंह जी से पूछा आप दिल्ली आर्य प्रतिनिधि सभा के प्रधान हैं। रोहिणी के सफल आर्य महा सम्मेलन ने तो आपको अन्तर्राष्ट्रीय छवि की दृष्टि से एवरेस्ट की चोटी से भी ऊंचा उठा दिया है। अब आपको एक अलग से ऐसे आश्रम की क्या आवश्यकता है जिसे लोग राजसिंह के आश्रम के नाम से ही जाने।राजसिंह जी अब नहीं रहे इसलिये ऐसा कहना शोभा नहीं देता। परन्तु आप विचार कीजिये ऐसी बातों का उत्तर है क्या कोई।आज अखिलेश्वर जी, ब्र. आर्य नरेश जी और और भी कितने नाम है मेरे अनुमान में तो हजारों ही होगें जो आर्य समाज के होते हुये आर्य समाज के नहीं है व्यक्तियों के हैं और समय पर उनकी कोई ताकत आर्य समाज को नहीं मिलती। बाबा रामदेव जी की तपस्या को कोटि कोटि नमन। पतंजलि जैसा सफल प्रकल्प।अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के प्रकल्प प्रणेता और प्रकल्प प्रबन्धक बाबा जी के कुशल संयोजन, प्रबंधन और कार्य निष्पादन को देखकर भारी हत्प्रभ हैं। लेकिन वह सारा कार्यक्रम क्या आर्य समाज का है। आर्य समाज के हिस्से कुछ भी नहीं। केवल बाबा जी के भावों का खेल है। बाबा जी आज म़ु़ंह फेर ले तो आर्य समाज क्या कर सकता है। आर्य समाज में आज होने को बहुत हो रहा है परन्तु सच यह हैं कि एक बहुत लम्बे समय से कुछ भी नहीं हो रहा। अब कहां हैं वे वार्षिकोत्सव जिसकी भीड़भाड़ देखकर ही अंग्रेजों के छक्के छूट जाते थे। जिनकी भीड़ देखकर महात्मा गांधी जैसे देश विदेश घूमे और दक्षिण अफ्रीका में अंग्रेजों के विरुद्ध सफल आन्दोलन चला चुके व्यक्ति की भी आंखे चकाचौंध होकर विस्फरित हो गई थी। आर्य समाज अद्भुत तरीक़े से जनता जनार्दन से जुड़ा था। लाहौर के सनातन धर्म के लोग आते थे आर्य समाज अनार कली में स्वामी श्रध्दानंद से प्रार्थना करते थे महाराज हम पर कृपा करो। हम भी उत्सव कर रहे है। आप लोगों से कहें तो लोग हमारे यहां भी आयें।आज हम कहां खडे़ हैं यह हमें ही विचार करना पड़ेगा। क्यों हमारे रविवार के सत्संग में लोग नहीं आते है। क्यों हमारे वार्षिकोत्सव बिना श्रोताओं के ऐसे ही या दो चार श्रोताओं से ही सम्पन्न हो जाते है। दिल्ली में श्रध्दानंद बलिदान स्मृति की शोभा यात्रा का मार्ग दिन दिन छोटा क्यों होता जा रहा है। क्यों उसमें लोगों की भीड़ पहले से कम होती जा रही है। पहले उत्सव या कोई दूसरा कार्यक्रम इतने लंगरों के बल पर तो नहीं होते थे। पहले इतने भजनोपदेशकों पर तो हम आश्रित नहीं थे। पहले इतने उपदेशक भी तो हमारे पास नहीं थे। दिल्ली में पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन के सामने कम्पनी बाग में महीनों जमी आर्य समाज की भीड़ का मेला आज भी कई बूढ़ों को भारी रोमांचित करता है। ऐसी भीड़ यहीं तो नहीं होती थी। दिल्ली में कई जगह होती थी और महीनों जमती थी। सदर बाजार म़े लाल किले के सामने और भी कई जगह। आर्य समाज ने किस क्षेत्र में काम नहीं किया। दलित, पशु पक्षी संरक्षण, गरीब अनाथ संरक्षण, राजनीति, व्यापार, उद्योग धन्धे, भाषा, वेशभूषा, भोजन , महिला संरक्षण, शिक्षा, भूमि सुधार, जंगल सुरक्षा, सैना,पुलिस सब जगह। आज सब क्षेत्रों में एक बार फिर से काम करने की जरूरत है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विश्व हिन्दू परिषद, हिन्दू महासभा आदि से कुछ भी काम न चलेगा। यह संस्थायें आर्य समाज के उत्थान के लिये किसी ने नहीं बनाई थी। यह सब संस्थायें प्रायः आर्य समाज के प्र प्रतिकार के लिये ही बनी। इनकी हिम्मत नहीं थी यह आर्य समाज का प्रतिकार कर पाती। इसलिये किसी ने कहा आर्य समाज हमारी अन्तर्भूत संस्था है। तो किसी ने कुछ और। इस प्रकार बड़ी ही कुटिलता से इन्होंने आर्य समाज को पीछे धकेला है। बहनो और भाइयो! घबराओ मत आर्य समाज के लिये काम करो। महर्षि दयानंद सरस्वती के काम इतने हैं कि यह रुक ही नहीं सकते। आपको याद होगा, महर्षि दयानंद जी महाराज को विष देकर धूर्तता पूर्वक मार दिया। उसके बाद ढ़ाई तीन वर्ष तक आर्य समाज का काम इस तरह रुक गया जैसे कुछ हुआ ही नहीं। आर्य समाज के विरोधी बगलें बजाने लगे। आर्य समाज के प्रति श्रद्धा भाव रखने वालों पर हंसने लगे। कहते थे देख लो आर्य समाज! समाप्त हो गया न! और तब उस घोर अन्धेरे में भी श्रध्देय पं. गुरुदत्त विद्यार्थी उभरे और आर्य समाज इस ढंग से उभरा कि देखने वाले देखते ही रह गये। अंग्रेजों और मुसलमानों की तो सारी चालाकियां ही मिट्टी में मिलती चली गई। खीझे अंग्रेजों ने हमारे लाखों नवयुवकों और दूसरे लोगों को उनके तेज से ड़रकर अकारण ही मार ड़ाला। सोचें अमर शहीद भगत सिंह ने किसका क्या बिगाड़ा था। अपने देश के लिये आजादी की ही बात तो कर रहे थे। उधर दक्षिण में हैदराबाद में आर्य समाजी लोगों ने किसका क्या बिगाड़ा था। जो रजाकारों ने उनको अमानवीय ढंग से और बहुत बुरी तरह से मारा कूटा और उनकी जाने ले ली। हमें तो एक ही बात कहनी हैं। आर्य बहनों और भाइयो, आर्य समाज के लिये निस्वार्थ भाव से काम करो। आर्य समाज ही भविष्य के भारत की सही आशा है। शेष को देश परख चुका है। कुछ को अभी परखा है और कुछ को अब परख रहा है। अभी तक तो किसी में दम दिखा नहीं। इसलिये आप ज्यादा चिन्ता न करें कि मोदी जी ने गड़वड़ कर दी। मोदी जी मोदी जी हैं। आप गड़वड़ न करें। मोदी जी को अपना काम करने दें और यह विचार करें मोदी जी के स्तर का काम करने का मोदी जी का विकल्प क्या है अगर कोई नहीं है तो माहौल खराब न करें। हमारे बोलने से भी लोग भ्रमित हो सकते है। यदि लोग भ्रमित होते हैं तो यह भी हमारे लिये अच्छा नहीं होगा।

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