स्वतन्त्रता की ७५ वीं वर्षगाँठ पर आइये जानें कि स्वतन्त्रता दिलाने में आर्यसमाजियों को कैसा त्याग और संघर्ष करना पडा़ था।*

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*प्रस्तुति – आचार्य राहुलदेवः*

अंग्रेजी सरकार ने आर्यसमाज को कुचलने तथा दबाने का पूर्ण निश्चय कर लिया था, स्थान-स्थान पर आर्यसमाजियों तथा आर्यसमाज से सम्बन्धित पुरुषों को उत्पीड़ित किया जाने लगा था, उस समय की सरकारी नौकरियों में विद्यमान आर्यसमाजियों पर तो मानो विपत्तियों का पहाड़ ही टूट पड़ा था, क्योंकि सरकारी नौकरी में होने के कारण उनको पीड़ित, दुःखी तथा त्रस्त करना सरकार के लिए बहुत ही सरल काम हो गया था, उस समय के आर्यसमाजियों पर क्या बीती ? इसका दिग्दर्शन कराने के लिए कुछ घटनाओं का संक्षिप्त संग्रह यहां प्रस्तुत किया जाता है, इससे पाठकों को यह भी ज्ञात हो जायेगा कि विपदा और आंधी के उस तूफानी दौर तथा काल में आर्यसमाजियों ने किस प्रकार अपनी बहादुरी का परिचय दिया, वे टूट तो गये परन्तु झुके नहीं और किस प्रकार अपनी लौकिक अनित्य सम्पदाओं के सर्वस्व की बाजी लगाकर भी उन्होंने अपने सिद्धांतों, मान्यताओं तथा आर्यत्व की रक्षा करके उस विपत्ति की घड़ी में खरे उतरे, यह एक गौरव का विषय है।

*आर्यसमाजियों से दुर्व्यवहार*

१. मैं सायंकाल सड़क पर घूम रहा था, सामने से घोड़े पर सवार नाभा के वृद्ध राजा हरिसिंह आ रहे थे, वह अक्सर लाहौर जाते थे, और मैं उन्हें पहचानता था, मैंने हाथ जोड़कर उनका उचित सत्कार किया, उन्होंने पूछा कि पढ़ते हो ? मेरे उत्तर देने पर पूछा कि कहाँ ? मैंने कहा कि दयानन्द कालेज में ? ‘कहने लगे कि हंसराज से कह देना कि अंग्रेजों के साथ उलझना ठीक नहीं, जितने आर्यसमाजी तुम हो, उनके लिए तो मेरी फौज ही काफी है, राजा नाभा ने अपना सन्देश पहुंचाने के लिए अच्छा दूत चुना, उसके कथन से इतना तो पता लगता है कि उस समय का राजनैतिक वायुमण्डल कैसा था ?’

२. गुलाबचन्द एक सिख रेजिमेण्ट में लेखक था, वह कर्त्तव्य परायण तथा सत्यप्रिय और परिश्रमी था, परन्तु साथ ही अधिकारियों को उत्तर देने में निर्भीक था, पहले तो उसकी इस बात की प्रशंसा होती थी, किन्तु अब उसका वही गुण कांटे की तरह खटकने लगा और उसे इसके लिये पृथक् कर दिया कि वह आर्यसमाजी है, इस प्रकार हम देखते हैं कि आर्यसमाजी का अर्थ हुआ उद्दण्ड अर्थात् निर्भीक एवं सत्यवादी।

३. जिला करनाल के तीन जेलदारों में से एक आर्यसमाजी था, उसकी डायरी में लिख दिया गया कि वह जेलदार तो अच्छा है, परन्तु इसका निरीक्षण किया जाना चाहिये क्योंकि यह आर्यसमाजी है।

४. एक डिप्टी कमिश्नर ने एक नगर के प्रमुख पुरुषों को बुलाकर कहा कि यदि तुम्हारे यहां कोई आर्यसमाजी रहता है, तो उसे निकाल दो, स्वयं उन प्रमुख पुरुषों में ही दो आर्यसमाजी थे, उन्होंने पूछा कि आयसमाजियों के विरुद्ध क्या किया जाये ? डिप्टी कमिश्नर ने कहा कि कुछ करो, तुम्हारे विरुद्ध कोई भी कार्रवाई न होगी, वे बोले कि आप स्पष्ट निर्देश करें, तो उनका पालन किया जा सकता है और आप ही स्पष्ट कार्रवाई करने से डरते हैं तो फिर हममें यह साहस कहां है ?

५. एक रेजिमेण्ट के सिपाही आर्यसमाजी थे, उन्हें यज्ञोपवीत उतार देने की आज्ञा दी गई, उन्होंने जाटसभा के द्वारा एक निवेदन पत्र भिजवाया जिसे आपत्तिजनक समझा गया।

६. एक मुसलमान जमादार ने एक यूरोपियन लेफ्टिनेण्ट को विवाद में हरा दिया, इसकी शिकायत हुई और मुसलमान को डांटकर कहा गया कि तुम आर्यसमाजी हो, उसने उत्तर दिया कि मैं तो मुसमान हूं, अधिकारी ने उसे और डांटा और कहा कि तुम मुसलमान आर्यसमाजी हो ।

७. आर्यसमाज के प्रचारक पं० दौलतराम झांसी गये, वहां उन्होंने सिपाहियों को भी उपदेश दिया और उनसे अनाथालय के लिए चन्दा लाये, पण्डित जी पर अभियोग चलाया और दण्ड यह दिया गया कि या तो झांसी या उसके पांच मील के अन्दर रहनेवाले तथा सरकार को 1000 से 2000 की आय पर कर देने वाले दो सज्जनों की जमानत दिलाओ या एक वर्ष के कठोर कारावास का कठोर दण्ड भुगतो, यों तो दौलतराम जी आगरे के खातेपीते घर के थे परन्तु झांसी में अजनबी थे इसलिए झांसी में कारावास भुगतना पड़ा।

८. जोधपुर में वायसराय पधारे थे उनके मार्ग में आर्यसमाज मन्दिर पड़ता था, पुलिस ने समाजवालों से कहा कि अपना फट्टा तथा झण्डा उतार लो, उनके इन्कार करने पर पुलिस ने ये दोनों चिह्न उतार लिये।

९. पंजाब की एक ब्रिगेड में आज्ञा दी गई कि सिपाही आर्यसमाज श्रथवा किसी अन्य राजनीतिक सभा में न जाया करें।

१०. एक भारतीय रेजिमेण्ट के एक डाक्टर को उसके आफिसर ने त्यागपत्र का मसविदा लिखकर दिया कि इसके द्वारा समाज से सम्बन्ध विच्छेद करो, यह आज्ञा न मानने के कारण आखिर उसे सेवा छोड़नी पड़ी।

११. रोहतक में किसी ने ढिंढोरा पिटवाया कि आर्यसमाज का मन्दिर सरकार द्वारा जब्त कर लिया गया है, समाज के प्रधान के पूछने पर डिप्टी कमिश्नर कार्यालय ने लिखा कि ऐसा ढिढोरा सरकारी आज्ञा से नहीं पीटा गया, परन्तु तो भी इसके विरुद्ध सरकार ने अपनी ओर से घोषणा तक करना स्वीकार नहीं किया।

१२. इन्द्रजीत शाहजहांपुर की जिला कचहरी में काम करता था, उसने रोगी होने के कारण अवकाश लिया, वह आर्यसमाज का उत्साही कार्यकर्त्ता था, उसे आज्ञा दी गई कि या समाज प्रचार करें या सरकार की सेवा।

१३. इन्दौर आर्यसमाज का प्रधान लक्ष्मणराव शर्मा पुलिस इन्स्पेक्टर जनरल के कार्यालय में हैड एकाउण्टेण्ट था, उसने समाज के जुलूस की आज्ञा मांगी, इस पर उसे समाज छोड़ देने को कहा गया, ऐसा न कर सकने के कारण उसे सरकार की सेवा छोड़ देनी पड़ी।

*क्रमशः…*

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