“वैदिक धर्म का समग्रता से प्रचार गुरुकुलीय शिक्षा से ही सम्भव”

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ओ३म्

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गुरुकुल एक लोकप्रिय शब्द है। यह वैदिक शिक्षा पद्धति का द्योतक शब्द है। वैदिक धर्म व संस्कृति का आधार ग्रन्थ वेद है। वेद चार हैं जिनके नाम ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद हैं। यह चार वेद सृष्टि के आरम्भ में सच्चिदानन्दस्वरूप, निराकार, सर्वव्यापक, सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ, अनादि, अनन्त, न्यायकारी, सृष्टिकर्ता और जीवों को उनके कर्मानुसार सुख-दुःख व मनुष्यादि जन्म देने वाले ईश्वर से चार ऋषियों अग्नि, वायु, आदित्य व अंगिरा को प्राप्त हुए थे। वेद ईश्वर की अपनी भाषा संस्कृत में हैं जो लौकिक संस्कृत से भिन्न है और जिसके शब्द व पद रूढ़ न होकर योगरूढ़ हैं। वेदों को जानने व समझने के लिए वैदिक संस्कृत भाषा का ज्ञान आवश्यक है और इसके लिए वर्णोच्चारण शिक्षा सहित व्याकरण के अष्टाध्यायी व महाभाष्य आदि ग्रन्थों का बाल व युवावस्था में लगभग तीन वर्ष तक अध्ययन करना व कराना आवश्यक है। यह अध्ययन किसी एक गुरु से किया जा सकता है। प्राचीन काल में वेदों के विद्वान जिन्हें ब्राह्मण कहा जाता था, वह शिक्षा व व्याकरण आदि का ज्ञान वनों में स्थित अपने गुरुकुल, अर्थात् गुरु के कुल, में कराया करते थे जहां अनेक विद्यार्थी एक गुरु से व्याकरण व उसके बाद निरुक्त आदि वेदांगों व उपांगों आदि अनेक ऋषिकृत ग्रन्थों का अध्ययन करते थे। यह परम्परा महाभारत के बाद यवन व अंग्रेजों के समय में भंग कर दी गई थी जिसका उद्देश्य वैदिक धर्म व संस्कृति को समाप्त कर विदेशी मतों को महिमा मण्डित करना था। इसका उद्देश्य लोगों का येन केन प्रकारेण धर्मान्तरण व मतान्तरण करना मुख्य था। इस कारण दिन प्रति दिन वैदिक धर्म व संस्कृति का पतन हो रहा था। महर्षि दयानन्द ने इस स्थिति को यथार्थ रूप में समझा था और संस्कृत का अध्ययन कराने के लिए एक के बाद दूसरी कई संस्कृत पाठशालाओं का अलग अलग स्थानों पर स्थापन किया था। किन्हीं कारणों से इन पाठशालाओं को आशा के अनुरुप सफलता न मिलने पर उन्हें बन्द करना पड़ा तथापि ऋषि दयानन्द ने जहां एक ओर सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, संस्कारविधि, आर्याभिविनय व ऋग्वेद-यजुर्वेद भाष्य आदि का प्रणयन किया वहीं उन्होंने व्यापकरण पर भी अनेक महत्वपूर्ण ग्रन्थ लिखकर अपने अनुयायियों को गुरुकुल स्थापित कर संस्कृत व वेदादि ग्रन्थों के पठन पाठन का मार्ग भी प्रशस्त किया था।

ऋषि दयानन्द धर्मवेत्ता एवं समाज सुधारक सहित सच्चे देशभक्त, ऋषि, योगी व समस्त वैदिक साहित्य के मर्मज्ञ विद्वान थे। उन्होंने वैदिक धर्म, इसकी मान्यताओं एवं सिद्धान्तों के प्रचार सहित समाज सुधार का अभूतपूर्व कार्य किया। 30 अक्टूबर, सन् 1883 को विष देकर उनकी हत्या कर वा करा दी गई जिस कारण वह अपनी भावी योजनाओं को पूर्ण न कर सके। यदि वह कुछ वर्ष और जीवित रहते तो वेदभाष्य का कार्य पूर्ण करने सहित गुरुकुलों की स्थापना कर अपने जैसे वैदिक धर्म के प्रचारक तैयार करने का प्रयत्न अवश्य करते। उनकी मृत्यु के बाद उनके शिष्यों ने सत्यार्थप्रकाश आदि उनके ग्रन्थों में शिक्षा विषयक विचारों को क्रियान्वित करने के लिए शिक्षण संस्थाओं की स्थापना का कार्य किया। इसे दयानन्द ऐंग्लो-वैदिक स्कूल नाम दिया गया था जो बाद में एक वट वृक्ष बना और बताया जाता है कि सरकारी स्कूलों के बाद यही देश के सर्वाधिक लोगों को शिक्षित करने वाली सबसे बड़ी शिक्षण संस्था है। किन्हीं कारणों से दयानन्द ऐंग्लो वैदिक कालेज में संस्कृत को वह स्थान न मिला जिसकी वहां आवश्यकता थी और जिसका समर्थन स्वामी दयानन्द जी के विचारों से होता था।

इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए पंजाब की आर्य प्रतिनिधि सभा के एक प्रमुख सर्वप्रिय नेता स्वामी श्रद्धानन्द जी ने सन् 1902 में हरिद्वार के निकट कांगड़ी ग्राम में एक गुरुकुल की स्थापना की जहां संस्कृत व्याकरण व भाषा का ज्ञान कराने के साथ वेद आदि शास्त्रों का अध्ययन भी कराया जाता था। यह गुरुकुल कांगड़ी अपने समय में विश्व में विख्यात हुआ। इस शिक्षण संस्था में उन दिनों के भारत के वायसराय आये और इंग्लैण्ड के भावी प्रधानमंत्री रैम्जे मैकडोनाल्ड भी आये थे। इस गुरुकुल से संस्कृत भाषा के अध्येता अनेक स्नातक बने जिन्होंने समाज व देश में अपनी विद्या का लोहा मनवाया। कुछ पत्रकार बने तो कुछ वेदाचार्य वा धर्माचार्य, कुछ इतिहासकार तो कुछ नेता व सांसद बने। संस्कृत व हिन्दी भाषा के अध्यापन के क्षेत्र में तो अनेक स्नातकों ने अपनी सेवायें दी जिससे संस्कृत व हिन्दी का देश भर में प्रचार हुआ। समय के साथ साथ देश भर में ऋषि दयानन्द और आर्यसमाज के अनुयायियों ने गुरुकुलों की स्थापना की और वहां संस्कृत का अध्ययन-अध्यापन कराया जिससे देश व समाज को वैदिक विद्वान व अध्यापक-प्राध्यापक मिलते आ रहे हैं। आर्यसमाज में अधिकांश पुरोहित भी हमारे गुरुकुलों के ही शिक्षित युवक होते हैं। स्वामी रामदेव और आचार्य बालकृष्ण आदि भी विश्व प्रसिद्ध हस्तियां हैं जो आर्यसमाज के गुरुकुलों गुरुकुल खानपुर वा कालवां की देन हैं। यह गुरुकुल आन्दोलन निरन्तर आगे बढ़ रहा है। इसके मार्ग में अनेक कठिनाईयां भी हैं जिस पर गुरुकुलों के आचार्यों व हमारी सभाओं के नेताओं को मिलकर विचार करना चाहिये और उसके समाधान का निश्चय कर उसे क्रियान्वित करने के प्रयास भी करने चाहियें।

गुरुकुलों से प्रतिवर्ष हमें व्याकरणाचार्य व धर्माचार्य मिलते रहते हैं परन्तु आर्यसमाज में उन्हें उचित दक्षिणा व वेतन पर कार्य नहीं मिलता। इसका परिणाम यह होता है कि वह अपनी आजीविका के लिए महाविद्यालयों व अन्य सरकारी संस्थाओं की ओर अपनी दृष्टि डालते हैं। उनमें जो योग्यतम होते हैं वह महाविद्यालायों एवं अन्य अच्छी सरकारी सेवाओं में चले जाते हैं। इससे आर्यसमाज व वैदिक धर्म उनकी सेवाओं से वंचित हो जाता है और वह प्रयोजन भी पूर्ण नहीं होता जिसके लिए गुरुकुल ने उन्हें तैयार किया था। इसमें दोष गुरुकुलों के स्नातकों का कम आर्यसमाज व इसकी सभा संस्थाओं व नेताओं का है जो इन्हें आर्यसमाज के कार्यों में उचित वेतन व दक्षिणा पर नियुक्ति नहीं दे पातीं। ऐसे उदाहरण कम ही मिलते हैं कि स्नातक बन कर अच्छी सरकारी नौकरी प्राप्त कर लेने पर सरकारी सेवाओं में कार्यरत हमारे गुरुकुल के स्नातक दो-चार व अधिक घंटे नियमित रूप से गुरूकुल व आर्यसमाज रूपी माता का ऋण चुकाने के लिए कार्य करते हों और इसके अन्तर्गत शोध, लेखन व निःशुल्क रूप से मौखिक प्रचार आदि करते हों। आज का भारतीय समाज उच्च मानवीय मूल्यों के ह्रास का शिकार है। इसके लिए स्वामी श्रद्धानन्द, पं. लेखराम, पं. गुरुदत्त विद्यार्थी आदि हमारे मार्गप्रदर्शक व आदर्श बन सकते हैं। सभी स्नातकों से तो हम अपेक्षा नहीं कर सकते परन्तु योग्य विद्वानों का यह कर्तव्य है कि उन्होंने गुरुकुल व आर्यसमाज के सहयोग से जो ज्ञान प्राप्त किया है उसका कुछ लाभ वह गुरुकुल व आर्यसमाज को भी प्रदान करें। गुरुकुलों के सभी समर्थ स्नातकों को इसका ध्यान रखना चाहिये।

हमें इस समस्या पर भी विचार करना चाहिये कि हम गुरुकुल के योग्य व योग्यतम आचार्यों को उचित दक्षिणा दें। यह तभी सम्भव होगा जब गुरुकुल के पास पर्याप्त साधन व धन हो। इतनी दक्षिणा तो मिलनी ही चाहिये कि जिससे आचार्य व उसके परिवार का आज की परिस्थितियों में भोजन व सन्तानों की शिक्षा आदि का निर्वाह हो सके। हमें लगभग 20 वर्ष पूर्व वृन्दावन व अनेक स्थानों पर जाने का अवसर मिला। हमने वहां देखा कि हमारे आचार्यों को बहुत न्यून वेतन मिलता था। इससे हमें लगता है कि भविष्य में हमारे सभी गुरुकुलों को योग्य आचार्य शायद हीं मिलें। एक बार श्री आदित्य मुनि जी ने भोपाल से प्रकाशित सभा की पत्रिका में अपने सम्पादकीय लेख में किसी गुरुकुल में आचार्यों के वेतन की समस्या पर प्रकाश डालते हुए टिप्पणी की थी कि वहां आचार्यों को वेतन बहुत ही कम मिलता है। उन्होंने यह भी लिखा था कि जितना वेतन होगा वैसा ही वहां शिक्षा का स्तर भी होगा। हम चाहते हैं कि समय समय पर हमारे गुरुकुलों के आचार्यों व आर्य नेताओं की जो बैठक व गोष्ठी हो, उनमें इस समस्या पर भी विचार हो।

आर्यसमाज की सभाओं को यह भी प्रयास करने चाहिये कि उनके सभी गुरुकुल परस्पर एक दूसरे से एक परिवार की तरह जुड़े हुए हों। एक गुरुकुल में यदि कोई समस्या आये तो अन्य गुरुकुल, आर्यसमाज व सभायें उनका सहयोग करें। सभी गुरुकुलों का पाठ्यक्रम भी समान होना चाहिये। सर्वत्र ऋषि प्रणीत पाठविधि व आर्ष ग्रन्थों का ही पठन पाठन हो। आर्यसमाज के सदस्य व धनिक लोग ऋषि दयानन्द के सिद्धान्तों व पाठ विधि पर चलने वाले गुरुकुलों व उनके आचार्यों को उचित साधन उपलब्ध कराने के लिए तत्पर रहें। वर्तमान समय में आर्यसमाज की विचारधारा व पाठविधि के कितने गुरुकुल देश भर में चल रहे हैं, इसका डेटा व जानकारी किसी एक केन्द्रीय स्थान पर होनी चाहिये जिससे उन गुरुकुलों, आचार्यों व ब्रह्मचारियों आदि की संख्या का अनुमान आर्यसमाज के सुधी सदस्यों व नेताओं को हो सके। आज हमें पता नहीं कि देश में कुल कितने गुरुकुल चल रहें हैं और वहां लगभग कितने ब्रह्मचारी शिक्षा प्राप्त करते हैं? उन गुरुकुलों की स्थापना कब व किसके द्वारा हुई? उनके पास साधनों की स्थिति कैसी है? यह भी नहीं पता कि उन गुरुकुलों से अब तक कितने स्नातक बनें और वह कहां क्या कार्य करते हैं? उनमें से कितने आर्यसमाज को अपनी सेवाओं से कृतार्थ कर रहे हैं व आर्यसमाज से जुड़े हैं। अतः हमारे गुरुकुलों के संयुक्त सम्मेलनों में समय समय पर इन विषयों पर भी विचार होना चाहिये। ऐसे अनेक प्रश्न और हो सकते हैं जिन्हें गुरुकुलों के परस्पर सम्मेलनों में विद्वानों के सम्मुख रखा जाना चाहिये और जहां आवश्यकता हो वहां सुधार पर विचार किया जाना चाहिये। लेख को विराम देने से पूर्व हम यह भी निवेदन करना चाहते हैं कि वर्तमान समय में आर्यसमाज की सभाओं की शक्ति बिखरी हुई व असंगठित है जिससे आर्यसमाज को अपार हानि हो रही है। यदि यह विघटन जारी रहा तो इससे भविष्य में अतीत में हुई आर्यसमाज की हानि से अधिक हानि होगी। आने वाली पीढ़िया हमें क्षमा नहीं करेंगी। अतः आर्यसमाज के सभी नेताओं, अधिकारियों व आर्यसमाज के सुधी सदस्यों को इस ओर भी ध्यान देना चाहिये। ईश्वर सबको सद्प्रेरणा करें जिससे संगठन में मतभेद दूर हो सकें।

वैदिक धर्म को वेदशास्त्रों सहित दर्शन, उपनिषद, मनुस्मृति, रामायण, महाभारत, सत्यार्थप्रकाश तथा ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका आदि के अध्ययन से ही जाना व समझा जा सकता है। धर्म का पालन तभी कर सकते हैं जब हम वेदों सहित इतर समस्त वैदिक साहित्य का अध्ययन करेंगे। इससे सभी लोगों को स्वाध्याय की प्रवृत्ति वाला बनना समीचीन है। धर्म प्रचार के लिए पूर्णकालिक धर्मप्रचारक विद्वानों की आवश्यकता है जो वैदिकधर्म को समग्रता से जानते हों तथा जिनकी उपदेश शैली अत्यन्त सरल एवं प्रभावशाली है। उत्तम वेद प्रचारक विद्वान व धर्माचार्या गुरुकुल से अध्ययन किये हुए स्नातक ही हो सकते हैं। अतः गुरुकुलों की धर्म रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका है। हमें गुरुकुलीय शिक्षा मंे निष्णात विद्वानों व प्रचारकों का सम्मान करने सहित उन्हें प्रचार के आवश्यक सभी साधन व सुविधायें उपलब्ध कराने पर ध्यान देना चाहिये। इसी से वैदिक धर्म की रक्षा व प्रचार का मार्ग प्रशस्त होगा। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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