अंतरराष्ट्रीय मंचों पर चीन के स्थान पर उभरता भारत

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रंजीत कुमार

दवाओं की उत्पादन लागत में भारी बढ़ोतरी, कारों के उत्पादन में गिरावट। इनकी वजह? कोरोना महामारी और रूस-यूक्रेन युद्ध। चीन से दवाओं के कच्चा माल की सप्लाई महंगी हुई तो उच्च तकनीक वाले सेमीकंडक्टर चिप की सप्लाई चेन टूट जाने से न केवल कारों का उत्पादन गिरा बल्कि देश की पूरी अर्थव्यवस्था पर आंच आने की आशंका बन गई है। सेमीकंडक्टर चिप का भारत में नगण्य उत्पादन होता है जबकि दुनिया की 75 प्रतिशत मांग चीन और पूर्वी एशियाई देशों से पूरी की जाती है। ताइवान चिप का बड़ा उत्पादक है। इसलिए ताइवान पर चीन ने कभी कब्जा जमा लिया तो दुनिया की एक चौथाई चिप उत्पादन क्षमता चीन के हाथों में होगी। किसी भी देश को चिप की सप्लाई रोकने की धमकी दे कर ही चीन उस देश को घुटने टेकने को विवश कर सकता है।

जनतांत्रिक विकसित देशों और चीन के बीच तनाव पहले से था लेकिन महामारी और युद्ध के दौरान जिस तरह से व्यापारिक माल को हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया गया, उससे ये देश सहम गए हैं

यूक्रेन संकट का सबक
यूक्रेन संकट के बाद दुनिया के फिर दो खेमों में बंटने और शीतयुद्ध का दूसरा दौर शुरू होने के मद्देनजर लोकतांत्रिक विकसित देश चीन व रूस की सप्लाई चेन से अपने को अलग करने की रणनीति पर काम करने लगे हैं। दरअसल, कोरोना महामारी और रूस यूक्रेन युद्ध ने जनतांत्रिक विकसित देशों को एक अहम सबक सिखाया है। भविष्य में वे कच्चा माल और कलपुर्जों की सप्लाई के लिए मात्र एक देश पर निर्भर नहीं रहेंगे। चीन ने सस्ते और कुशल कामगार तथा सुव्यवस्थित कानून व्यवस्था के साथ विशाल उपभोक्ता बाजार की बदौलत विकसित देशों की बहुराष्ट्रीय कंपनियों को आकर्षित किया। इन कंपनियों ने चीन में कार, इनके कलपुर्जे, सेमीकंडक्टर चिप्स आदि बनाने शुरू किए और पूरी दुनिया को सप्लाई करने लगीं। धीरे-धीरे कंपनियों ने कलपुर्जों के उत्पादन अपने देश में बंद कर दिए और चीन के निर्माण उद्योग को चमकाने लगीं। नतीजतन चीन समृद्ध, ताकतवर और घमंडी होता गया।

वैसे तो जनतांत्रिक विकसित देशों के चीन से रिश्तों में तनाव कोरोना महामारी के पहले से ही शुरू हो गया था लेकिन जिस तरह कोरोना और यूक्रेन युद्ध के दौरान व्यापारिक माल को हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया गया, उससे विकसित देश सहम गए हैं। हाल में अमेरिका व चीन और ऑस्ट्रेलिया व चीन के बीच चले व्यापारिक युद्ध के मद्देनजर भारत सहित तमाम देशों में यह आशंका है कि चीन से किसी टकराव या कोरोना जैसी किसी प्राकृतिक आपदा की स्थिति में इन उत्पादों की सप्लाई चेन टूट सकती है। इसलिए अमेरिका व यूरोपीय देश इस सप्लाई चेन का विकल्प खोज रहे हैं जिसमें वे भारत को महत्वपूर्ण साझेदार मानने लगे हैं। यही वजह है कि 25 अप्रैल को यूरोपीय संघ की प्रेजिडेंट उर्सुला लेयेन ने अपने भारत दौरे में भारत के साथ ट्रेड एंड टेक्नलॉजी काउंसिल (टीटीसी) की स्थापना पर सहमति दी है। 27 देशों के संगठन यूरोपीय यूनियन ने इस तरह की काउंसिल का गठन इसके पहले केवल अमेरिका के साथ ही किया है।
प्रस्तावित परिषद का दीर्घकालीन इरादा उच्च तकनीक वाले उत्पादों के लिए चीन का वैकल्पिक स्रोत तैयार करना है और इनके उत्पादन में आत्मनिर्भरता हासिल करनी है ताकि इनकी सप्लाई के लिए चीन का मोहताज नहीं रहना पड़े। इसके पहले मार्च 2021 में चार देशों के संगठन क्वाड (ऑस्ट्रेलिया, जापान , अमेरिका और भारत) ने चीन की सप्लाई चेन का विकल्प खोजने के लिए क्रिटिकल एंड इमर्जिंग टेक्नलॉजी वर्किंग ग्रुप का गठन किया था, जिसका मकसद उच्च तकनीक वाले ऐसे उत्पादों की पहचान कर उनका क्वाड के साझेदार देशों में साझा उत्पादन करना है जिनके लिए क्वाड के देश चीन पर अत्यधिक निर्भर हैं। इसके बाद ऑस्ट्रेलिया ने भी दुर्लभ खनिज का साझा उत्पादन कर बाकी दुनिया को सप्लाई करने पर भारत के साथ सहमति बनाई। दोनों देशों ने हाल में मुक्त व्यापार संधि कर सहयोग की इस सहमति को नया आयाम दिया है।
वास्तव में दुर्लभ खनिज व उच्च तकनीक वाले कलपुर्जों की सप्लाई पर चीन का एकाधिकार है और चीन यदि किसी देश को इनमें से किसी की भी सप्लाई रोक दे तो उस देश का उद्योग-धंधा चौपट हो सकता है। ऐसे में चीन ने कुछ सालों से 5-जी नेटवर्क के विकास में महारत हासिल की और यूरोपीय देशों व अमेरिका-ब्रिटेन से लेकर भारत तक के बाजार में छा जाने का सपना देखने लगा तो उन देशों के कान खड़े हुए। यदि 5-जी पर भी चीन का एकाधिकर स्थापित हो जाए तो पूरी दुनिया चीन की मुट्ठी में होगी।
इसलिए उच्च तकनीक वाले औद्योगिक कच्चा माल व कलपुर्जों की सप्लाई चेन का दायरा बढ़ाने की महत्वाकांक्षी रणनीति पर भारत के साथ विकसित देश गंभीरता से आगे बढ़ रहे हैं। वे देश चाहते हैं कि धीरे-धीरे चीन से इनका आयात कम किया जाए। इसके लिए वे देश अपनी कंपनियों को भी चीन छोड़ कर किसी और देश में जाने को प्रोत्साहित कर रहे हैं। ऐसी कुछ कंपनियां भारत की ओर देख रही हैं तो कुछ अन्य वियतनाम व अन्य दक्षिण पूर्व एशियाई देशों को परख रही हैं। लेकिन भारत के पास वैज्ञानिक व औद्योगिक आधार का जो विशाल दायरा है वह वियतनाम, थाइलैंड, मलयेशिया, इंडोनेशिया जैसे देशों के पास नहीं।

जरूरी तैयारियां
अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, जापान और यूरोपीय देशों ने हाल में भारत के साथ जिस तरह के सहयोग समझौते किए हैं वह भारत की औद्योगिक व तकनीकी क्षमता को मान्यता प्रदान करता है। सहयोग की ये सहमतियां और समझौते प्रभावी ढंग से अमल में लाए गए तो आने वाले सालों में भारत निश्चित रूप से चीन का कारगर विकल्प बन सकता है। लेकिन इसमें कई पेंच हैं। बड़ा सवाल यह है कि क्या भारत इसके लिए तैयार है। इसके लिए विकसित देशों की कंपनियों को अनुकूल घरेलू माहौल प्रदान करना होगा। समुचित माहौल बनाने के लिए न केवल देश भर में कानून व्यवस्था की स्थिति सुधारनी होगी बल्कि राज्य सरकारों को भी अपने स्तर पर निवेश के अनुकूल नीतियां बनानी होंगी, माहौल ठीक करना होगा और लालफीताशाही दूर करनी होगी।

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