जब चीनी सेना अपनी तैयारी कर रही हो, तब भारत को क्या चुप बैठना चाहिए ?

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पुष्परंजन

ग्यारह नवंबर, 2021 को पीपुल्स लिबरेशन आर्मी यानी पीएलए 72वां स्थापना दिवस मना रही थी। उस मौके पर केडी-63 प्रक्षेपास्त्रों से लैस चीनी युद्धक विमान ‘एचसिक्स-के’ भारतीय सीमा पार क्या धौंस-पट्टी दिखाने के लिए उड़ानें भर रहे थे, या रूस से आ रही एस-400 मिसाइलों की खेप का भय था? पीएलए, इस समय तिब्बत केंद्रित रणनीति पर काम कर रही है। चीनी रक्षा मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि पीएलए की दस रेजीमेंटों ने 14 हज़ार 764 फीट ऊंचाई पर अवस्थित ‘दुनिया की छत’ कहे जाने वाले तिब्बत में ‘ऑपरेशन स्नोलैंड मिशन-2021’ अभ्यास पूरा कर लिया है। इस सैन्य अभ्यास में दस हज़ार सैनिकों की हिस्सेदारी का मतलब है, चीन माउंटेन वारफेयर को मज़बूत करने में लगा हुआ है।

एक रिपोर्ट जून, 2020 में पेइचिंग से प्रकाशित पत्रिका ‘माडर्न वीपेनरी’ में छपी थी, जिसमें चीनी रक्षा विशेषज्ञों ने स्वीकार किया था कि भारत माउंटेन वारफेयर में अमेरिका और रूस से कहीं आगे है। चीन अब 1962 की ग़लतफहमी में नहीं है, जिसमें 1383 भारतीय सैनिक शहीद हुए थे, और 1047 घायल। उस युद्ध में पीएलए के 722 सैनिक मारे गये थे, और 1400 घायल हुए थे। संख्या बल के हिसाब से देखें, तो भारत का अधिक नुकसान हुआ था। 1962 के बाद से भारतीय सेना ने अपनी कमज़ोरियों को लगातार दुरुस्त करने की चेष्टा की है, यह चीनी रक्षा विशेषज्ञों ने पिछले साल स्वीकार किया था। चीन 1962 की ग़लतफहमी का शिकार होकर 1979 में वियतनाम से भिड़ गया था, जिस युद्ध में पीएलए की नाक कटी थी।

पेइचिंग से प्रकाशित पत्रिका ‘माडर्न वीपेनरी’ के वरिष्ठ संपादक हुआंग क्वोची ने स्वीकार किया कि इंडियन माउंटेन फोर्स के 12 डिवीजन, जिसमें लगभग दो लाख भारतीय सैनिक हैं, दुनिया की वृहद्तम संख्या वाली फोर्स है, जिसे 1970 के बाद से लगातार मज़बूत किया गया है। हुआंग ने भारतीय तैयारियों के बारे में उस रक्षा पत्रिका में जानकारी दी कि इस समय भारतीय माउंटेन फोर्स के पास अमेरिका से आयातित ‘एएच-65 ई लांगबो’ अपाचे अटैक हेलीकॉप्टर है, 155 एमएम वाली दुनिया की सबसे हल्की होवित्ज़र तोपें हैं। मारक क्षमता वाले सुखोई, जगुआर, राफेल जैसे अत्याधुनिक युद्धक विमान हैं। दुनिया की सबसे घातक असाल्ट व स्नाइपर राइफलें हैं। वो सन‍् 62 वाला भारत नहीं है, जब उसकी सेना थ्री नॉट थ्री राइफल से लड़ रही थी। ‘माडर्न वीपेनरी’ पत्रिका चीनी मिलिटरी हार्डवेयर सप्लायर ‘नोंरिंको’ से फंडेड है। सवाल यह है कि क्या जानबूझ कर हमें किसी ग़लतफहमी का शिकार होने के लिए उसने यह रिपोर्ट छापी थी? यह रिपोर्ट ऐसे मौके पर छपी थी, जब डोकलाम विवाद चरम पर था।

चीनी रक्षा मंत्रालय की एक रिपोर्ट बताती है कि 2016 में तिब्बत मिलिटरी कमांड (टीएमसी) को थिएटर कमांड से सीधा लिंक किया जा चुका था। चीन की सेना को सेंट्रल मिलिटरी कमीशन (सीएमसी) नियंत्रित करता है, जिसके अधीन इस्टर्न, वेस्टर्न, नार्दर्न, सेंट्रल और सदर्न, पांच थिएटर कमांड हैं। युद्ध के हालात में सेना के तीनों अंग एक साथ काम करें, उसे आसान शब्दों में ‘थिएटर कमांड’ कहते हैं। आज की तारीख़ में युद्ध वाली स्थिति आने पर डिफेंस साइबर एजेंसी, डिफेंस स्पेस एजेंसी, स्पेशल ऑपरेशन डिवीज़न को भी ‘थिएटर कमांड’ में समन्वित कर दिया जाता है। इस तरह के ज्वाइंट वारफेयर की शुरुआत अमेरिकी राष्ट्रपति आइज़नहावर के समय 1961 तक विकसित कर ली गयी थी। फिर 70 के दशक में ब्रिटेन और 80 के दशक में फ्रांस, जर्मनी और ऑस्ट्रेलिया ज्वाइंट वारफेयर की अवधारणा में आगे आये। रूस ने 2010 में और चीन ने 2015 में ‘थिएटर कमांड’ का सृजन किया था।

शी चिनफिंग के शासन प्रमुख रहते 23 मई, 2021 को तीसरी बार तिब्बत पर श्वेत पत्र प्रस्तुत किया गया। पहला व्हाइट पेपर 2015 में, और दूसरा 2019 में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना (सीपीसी) की शिखर बैठक में पेश किया गया था। इससे स्पष्ट होता है कि चीनी सत्ता प्रतिष्ठान तिब्बत के प्रति कितना सजग है। तीनों श्वेत पत्रों में भारत में रहने वाले 94 हज़ार 203 तिब्बती, नेपाल में 13 हज़ार 524, और भूटान में 1300 तिब्बतियों समेत दुनियाभर में फैले तिब्बती डायसफोरा के लगभग डेढ़ लाख सदस्यों की गतिविधियों की रिपोर्ट भी पेश की गई थी। डायसफोरा के ये सभी सदस्य सेंट्रल तिब्बतन एडमिनिस्ट्रेशन से निबंधित होते हैं, चुनांचे चीन की नज़र ‘सीटीए’ पर बनी रहती है। साल 2021 के श्वेत पत्र में शी प्रशासन ने बताया था कि तिब्बत मिलिटरी कमांड और शिन्चियांग मिलिटरी कमांड में क्या कुछ हो रहा है। ख़ासकर, तिब्बत मिलिटरी कमांड के अंतर्गत आने वाले पीपुल्स आर्म्ड पुलिस फोर्स, बॉर्डर डिफेंस रेजिमेंट, न्यीग्ची व ल्हासा में तैनात 52वें, 53वें और 54वें ब्रिगेड की तफसील 23 मई, 2021 के तीसरे श्वेत पत्र में दी गई थी।

27 दिसंबर, 2018 को चीन के मिनिस्ट्री ऑफ नेशनल डिफेंस (एमएनडी) ने खुलासा किया कि तिब्बत सीमा पर 105 एमएम गन से लैस टाइप 15 लाइटवेट टैंक, टाइप 99, टाइप 96 टैंक तैनात किये गये हैं। ये किसी भी ऊंचाई वाले स्थान पर तुरंत रवाना किये जा सकते हैं। चीन ने उरूम्ची तक हाईस्पीड रेल कब की तैयार कर ली थी, और इधर 36 अरब डॉलर वाले सिचुआन-तिब्बत रेल लाइन इसी सैन्य कार्यक्रम का हिस्सा था। चीनी, जुलाई, 2021 में न्यींग्छी तक बुलेट ट्रेन के ज़रिये पहुंच चुके थे, जो अरुणाचल से लगा है। शी चिनफिंग न्यींग्छी 23 जुलाई, 2021 को आये थे, यह क्या भारत के लिए वेकअॅप कॉल नहीं था? इसलिए चीनी तैयारी को देखते हुए हमें उत्तराखंड व लद्दाख से अरुणाचल तक अधोसंरचना, ऑल वेदर सड़क और रेल संपर्क की गति तेज़ करनी होगी।

चीन जहां दबता और भय खाता है, वह है अमेरिका और उसकी तिब्बत नीति। सीआईए इस मामले में आक्रामक रही है, इसे ध्यान में रखना चाहिए। आज भी अमेरिकी एड के माध्यम से फंड भेजे जा रहे हैं। 1988 से अमेरिकी कांग्रेस हर साल निर्वासित तिब्बतियों के लिए विभिन्न सहयोग कार्यक्रमों को अप्रूव करती रही है। यूएस कांग्रेस ने वित्त वर्ष 2021 में 25 मिलियन डॉलर तिब्बतियों के लिए अनुमोदित किया था। चीन यह भूलता नहीं है कि सीआईए 1957 से 1961 के बीच उत्तर-पूर्वी तिब्बत के खाम क्षेत्र में विद्रोही तैयार करने में अपनी ताक़त झोंक चुका था। अमेरिकी सेना के टेंथ माउंटेन डिवीजन ने वर्जीनिया और कोलाराडो के कैंप हाले में 14 हज़ार खंफा गुरिल्लों को प्रशिक्षित किया था। 1958 में यह सब कुछ सीआईए के तत्कालीन निदेशक ऐलेन डलेस की देखरेख में चल रहा था। तो क्या ऐसी स्थिति की कभी वापसी होगी? चीन जब-जब तिब्बत में सैनिक तैयारी चाक-चौबंद करता है, नज़रें वाशिंगटन की ओर भी टिकी होती हैं।

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