लक्ष्मण को किसने मूर्छित किया?

laksham ram

गोस्वामी तुलसीदास रचित श्री रामचरित मानस के अनुसार युद्ध भूमि में लक्ष्मण रावण पुत्र मेघनाद द्वारा छोड़ी गई शक्ति से मूर्छित हुए है लेकिन आदि कवि राम रावण के समकालीन महर्षि वाल्मीकि के युद्ध कांड में वर्णित वर्णन के अनुसार लक्ष्मण को रावण ने मूर्छित किया था। वाल्मीकि रामायण में १ नहीं ६ से अधिक श्लोक इस ऐतिहासिक तथ्य की पुष्टि करते हैं। जो इस प्रकार है। जब विभीषण की सहायता ३ दिन ३रात चले द्वंद युद्ध में लक्ष्मण ने मेघनाद का वध किया जिसका समय स्थान सहित आदि कवि वाल्मीकि ने रामायण में विस्तृत वर्णन किया है । अपने परम प्रतापी प्रिय पुत्र की मृत्यु की सूचना लंका में रावण को अपने मंत्रियों से प्राप्त हुई रावण क्रोध में लाल होकर युद्ध भूमि मे आता है विभीषण को देखते ही उस पर बर्छी से प्रहार करता है। परम प्रतापी लक्ष्मण अपने 3 बाणों से उस बर्छी को हवा में ही काट देते हैं। तब रावण क्रुद्ध होकर लक्ष्मण से बोलता है।

मोक्षितस्ते बलश्लाघिन् यस्मादेवं विभीषणः|
विमुच्य राक्षसं शक्तिस्तवीयं विनिपतात्यते।।

एषा ते ह्रदय भित्वा शक्ति लोर्हतलक्षण।
मद्बबाहुपरिघोत्स्रष्टा प्राणानादाय यास्यति।।

इत्युक्तवा विपुला शक्ति कालेनापि दुरासाम्।
मयेन मायाविहिताममोघा शत्रुघातनिम्।।

(वाल्मीकि रामायण, युद्ध कांड सर्गः ५५)

हे सराहनीय बलशाली लक्ष्मण! तूने विभिषण को बचा लिया अतः मैं इस शक्ति को अब तेरे ऊपर छोड़ता हूं मेरे हाथ से छूटी हुई है यह शक्ति तेरे हृदय को चीर कर तेरे प्राण निकाल कर ले जाएगी। ऐसा कहकर उस शक्ति को जो मयदानव की बनाई हुई थी जो कभी व्यर्थ ना जाने वाली और काल के लिए भी दुर्धर्ष थी। जो शत्रु का विनाश करने वाली और अपनी चमक से अग्नि की भांति प्रदीप्त हो रही थी। वह शक्ति रावण ने क्रोध में भरकर लक्ष्मण को लक्ष्य करके फेंकी और बहुत जोर से गर्जना की भयंकर गर्जना करती हुई वह शक्ति बड़े जोर से रण क्षेत्र में डटे हुए लक्ष्मण को लगी। महावेगशाली वह शक्ति लक्ष्मण की छाती में लगी जिससे उनका ह्रदय फट गया और वह पृथ्वी पर मूर्छित होकर गिर पड़े।

यह सब घटनाक्रम देखकर श्री राम आंखों में आंसू भरे हुए सोचते रहे कि इस समय क्या किया जाए फिर वह अग्नि की भाँति क्रोध से भड़क उठे और युद्ध करने के लिए उत्साहित हुए श्री राम ने सोचा कि यह समय विषाद करने का नहीं है ऐसा सोचकर रावण के वध का निश्चय करके प्रचंड युद्ध करने में प्रवृत्त हुए श्री राम ने वानरों से कहा प्रतिज्ञा पूर्वक।

अस्मिन् मुहूर्ते न चिरात् सत्यं प्रतिश्रणोमी वः|
अरावणमरामं वा जगद् द्रक्षयथ वानरा: ||( युद्ध कांड वाल्मीकि रामायण ५५वा सर्ग)

हे वानरो ! मे तुम लोगों के समक्ष प्रतिज्ञा पूर्वक सत्य सत्य कहता हूं कि तुम लोग शीघ्र ही इस संसार को रावण या राम से रहित देखोगे।

राम रावण में बहुत भीषण संग्राम होता है आदि कवि ने बहुत रोचक ओजपूर्ण इसका वर्णन किया है । आदि कवि ने लिखा है रावण रणभूमि छोड़कर पराजित होकर भाग खड़ा हुआ राम के पराक्रम के सम्मुख नहीं टिक पाया राम ने स्वर्ण जड़ित ७ बाणों से उसे घायल किया।

वाल्मीकि रामायण के श्लोकों के अवलोकन से हमें भली-भांति बोध हो जाता है कि लक्ष्मण को मेघनाद ने नहीं लंकापति रावण ने मूर्छित किया था। इतिहास के विषय में समकालीन व्यक्ति की सम्मति निर्णायक व प्रमाणित मानी जाती है। वाल्मीकि रचित आदि महाकाव्य रामायण मूल महाकाव्य इतिहास ग्रंथ है इस ग्रंथ की छाया लेकर समय-समय पर अनेक भाषाओं में क्षेत्रीय रामायण लिखी गई है भारत ही नही भारत के बाहर अन्य भू राजनीतिक भागो पर भी लेकिन सब के मूल में आदि कवि वाल्मीकि रामायण ही है। ऐसे एक नहीं अनेक प्रसंग है जो रामचरितमानस में वर्णित है लेकिन मूल वाल्मीकि रामायण जो संस्कृत देववाणी में लिखी गई है उनमें उनका कोई उल्लेख नहीं है इतना ही नहीं तुलसी के मानस में वर्णित अनेक प्रसंग घटनाएं तो युक्ति प्रमाण तर्क विज्ञान सृष्टि नियम की कसौटी पर खरे नहीं उतरते।

इसी प्रसंग पर जब हम वाल्मीकि रामायण के ५५ से लेकर ५६ सर्ग के श्लोकों का अवलोकन करते हैं जहा लक्ष्मण की चिकित्सा की जाती है हनुमान जी हिमालय पर्वत से संजीवनी बूटी लाते हैं। मूर्छित लक्ष्मण की चिकित्सा करने वाले वैद्य जिनका नाम सुषेण था, को तुलसी ने लंका का राज वैद्य बताया है। जबकि आदि कवि वाल्मीकि के द्वारा वर्णित वर्णन के अनुसार सुषेन वानरों के सेनापति थे युद्ध विद्या में निपुण होने के साथ-साथ आयुर्वेद में भी पारंगत थे ।वानरो के चिकित्सा प्रकोष्ठ के अध्यक्ष थे। सुषेण वैद्य के लिये वाल्मीकि रामायण में वानर युथपति से लेकर हरियूथपः जैसे विशेषणों का अनेक बार का प्रयोग किया गया है।

मूल वाल्मीकि रामायण से हमें यह बोध होता है रामायण कालीन चिकित्सा विज्ञान बहुत उन्नत था। वैद्य सुषेण ऐसा लेप घायल वानर पक्ष के योद्धाओं के शरीर पर लगाते थे जिससे लगाने के पश्चात बाणो की पैनी नोके अपने आप शरीर से बाहर निकल पड़ती थी। अवतार और चमत्कार के लिए वाल्मीकि रामायण में कोई स्थान नहीं है आदि कवि वाल्मीकि की रामायण ज्ञान विज्ञान कला कौशल युक्ति श्रद्धा पवित्रता वैदिक परिवार समाज मूल्य को स्थापित प्रसारित करते हुए रघुकुल शिरोमणि राजाराम की जीवन संघर्ष को आम जनमानस के सम्मुख प्रस्तुत करती है । यदि आदि कवि वाल्मीकि आज जीवित होते तो वह सबसे पहला प्रश्नचिन्ह तुलसी पर ही लगाते उनके अद्भुत परिश्रम साहित्यिक कृति रचना वाल्मीकि रामायण को उसमे वर्णित ऐतिहासिक घटनाक्रम प्रसंगों को तोड़ने मरोड़ने का अधिकार तुलसीदास को किसने दिया।

घटनाओं के यथार्थ वर्णन के स्थान पर कल्पनाशीलता का सहारा लेकर आर्ष लेखन पद्धती के विकृतिकरण का अधिकार तुलसीदास को किसने दिया?

हद तो तब हो जाती है जब महर्षि वाल्मीकि के नाम पर समता समरसता की गवाही देने वाले लोग उनकी जयंती अर्थात बाल्मीकि जयंती के अवसर पर आदि संस्कृत वाल्मीकि रामायण का पाठ वाचन ना कर रामचरितमानस का पाठ करते हैं कितना अन्याय उस महर्षि के साथ हम ऐसा करते हैं धार्मिकता सांस्कृतिक सांस्कृतिकता का सहारा लेकर ।

जब हमारे पास आदि कवि वाल्मीकि रचित रामायण महाकाव्य है तो क्या हमें शोभा देता है उस महाकाव्य का आश्रय लेकर लिखे गए किसी ऐसे ग्रंथ को उसके स्थान पर सुशोभित करने का जो जिस ग्रंथ का लेखक मुगलकालीन था ना राम रावण का समकालीन था ना वाल्मीकि जैसा परम महर्षि था।

आगे आप विचार करें।

– आर्य सागर खारी

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