भारतीय स्वतंत्रता के इतिहास का पुनर्लेखन ज़रूरी——- श्याम सुन्दर पोद्दार

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——————————————-भारतीय स्वतंत्रता का इतिहास जो पढ़ाया जा रहा है,उसके हिसाब से ब्रिटेन के प्रधान मन्त्री एटली भारत के स्वतंत्रता आन्दोलन से सहानुभूति रखते थे,उनके हाथ में ब्रिटेन की सत्ता आयी,तो उन्होंने भारत को स्वतंत्र कर दिया । महात्मा गाँधी को भारत को स्वतंत्र कराने का एकमात्र श्रेय दिया जाता है। इतिहास लेखको का यही कहना है की अहिंसा का सिद्धांत समझ आने के कारण हमारा हृदय परिवर्तन हो गया,अथवा साम्राज्यवाद अन्याय है,इसलिएटली ने स्वेच्छा से हिंदुस्तान को छोड़ा।

जबकि सच्चाई यह है,भारत के स्वतंत्रता संग्राम के क्रान्तिकारी पक्ष ने भारतीय सेना के सैनिको की वफ़ादारी अपने मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए,सशस्त्र लड़ाई लड़कर ब्रिटिस ताज से हटा कर,उन सैनिकों को बिद्रोहि बना दिया ।उनके विद्रोह को सम्भालने कीशक्ति ब्रिटेन के पास नही थी ।इसी मजबूरी के चलते,भारत छोड़ो आंदोलन के असफल होने व द्वितीय बिश्व युद्ध को जीतने के बाद भी,अंगरेजो को भारत छोड़ना पड़ा। ब्रिटेन की संसद में प्रधानमंत्री एटली ने भारत को स्वाधीनता प्रदान करने का कारण, ब्रिटेन की दो सैनिक दुर्बलताएँ थी जिसके कारण उन्हें भारत छोड़ना पड़ा। भारत में ब्रिटेन की सेना के सैनिक ब्रिटेन के प्रति वफ़ादार नही रहे व ब्रिटेन भारत को नियंत्रण में रखने के लिए इतनी बड़ी ब्रिटिश सेना afford नही कर सकता था। भारत सफ़र के समय ब्रिटेन के प्रधान मंत्री एटली ने इस बात को यह कहकर और स्पष्ट कर दिया की ,सुभाष चंद्र बोस व उनकी आज़ाद हिन्द सेना के संघर्ष ने भारतीय सैनिकों की ब्रिटिस ताज से वफ़ादारी को बदल दिया। जो हमें १८ फ़रवरी १९४६ को बम्बई -कराची में नौसेना के २२ हज़ार सैनिक आज़ाद हिन्द सेना के अधिकारियों को लालक़िले के बिचार के बाद आजीवन कारादंड घोषणा पर,विद्रोही हो अंग्रेज़ अधिकारियों पर गोली चलाने लगे। ब्रिटिश यूनियन जैक उतार कर भारतीय तिरंगा फहरा दिया गया। दूसरे दिन यह विद्रोह भारतीय वायु सेना में पहुँच गया और वायु सैनिक हड़ताल पर चले गए। यह विद्रोह थल सेना में आरम्भ होने के पहले ही ब्रिटिश वायसराय ने भारतीय नेताओं को बुला कर कहा, आप विद्रोही सैनिकों को जाकर कह दे आज़ाद हिन्द सेना के सेनापतियों का आजीवन कारादंड वापस लिया जा रहा है भविष्य में आज़ाद हिन्द सेना के सैनिको का trial नही होगा व भारत को हम स्वाधीनता भी प्रदान करेंगे ,आप अपने अपने बेर्रेक में चले जाए। स्वाधीनता समर की इतनी महत्वपूर्ण घटना व ब्रिटेन के प्रधानमन्त्री एटली की ब्रिटेन की संसद में भारत को स्वाधीनता देने के कारणो की घोषणा,कांग्रेसी व वामपंथी इतिहासकारों ने पूरी तरह इतिहास की पुस्तकों से उड़ा दिया व एक झूठी व्याख्या प्रस्तुत की की व एटली के एकदम झूठे कथन को प्रस्तुत किया। ताकि गाँधी को महानायक बनाया जा सके। एटली के अनुसार सुभाष चंद्र बोस व आज़ाद हिन्द सेना के चलते हमें भारत को छोड़ना पड़ा। कांग्रेस सरकार के रहते हुवे NCERT की पुस्तकों में स्कूल के छात्रों को सुभाष बोस व INA के बारे में पढ़ाया जाता “Subhash Bose and his INA had invaded India and failed. यह सब पढ़ कर एक कोमल हृदय छात्र की सुभाष बोस व INA के बारे में क्या धारणा बनेगी। वह उनका खलनायक बनाएगा। की सुभाष बोस कितना दुस्ट आदमी है जिसने भारत पर हमला किया। अच्छा हुवा हार गया। जबकि सत्य यह है,सुभाष बोस ने भारतमाता को अंगरेजो से मुक्त करने के लिए ब्रिटिश भारत पर आक्रमण किया व अंत में ब्रिटिश राज को समाप्त करने में सफल रहे। सुभाष बोस ने सावरकर की लिखी India’s first war of independence का बिभिन्न भाषाओं में अनुवाद कराके INA के सैनिकों में बितरित ही नही किया, आज़ाद हिन्द रेडीओ से आकाशवाणी के माध्यम से देशवासियों से कहा INA को जो प्रशिक्षित सैनिक मिले है,वह सावरकर की ही देन है,उनके प्रयास से ही इतने अधिक भारतीय युवक ब्रिटिश सेना में प्रवेस किए।अर्थात् सावरकर के चलते ही आज़ाद हिन्द सेना को इतने प्रशिक्षित सैनिक मिले। सुभाष की तरह कांग्रेस व वामपंथी इतिहास कारों ने सावरकर को खलनायक बना कर प्रस्तुत किया। हिन्दु महासभा को मुस्लिम लीग़ की तरह का ख़तरनाक संगठन के रूप में प्रस्तुत किया। जबकि सत्य यह है,इसकी स्थापना सावरकर ने नही कांग्रेस के बड़े नेता मदन मोहन मालवीय ने कांग्रेस पार्टी का हिन्दु समाज में विस्तार हो इसलिए १९१४ में की थी। जिस स्थान पर कांग्रेस का अधिवेशन होता उसी पण्डाल में हिन्दु महासभा का अधिवेशन होता। कांग्रस के अध्यक्ष हिन्दु महासभा के अध्यक्ष होते,मदन मोहन मालवीय, लाला लाजपत राय, स्वामी श्रधानंद आदि कांग्रेस अध्यक्ष हिन्दु महा सभा के अध्यक्ष रह चुके है।बिहार हिन्दु महासभा के राजेन्द्र प्रसाद अध्यक्ष थे व जगजीवन राम कोषाध्यक्ष थे। हिन्दु महासभा के अधिवेशन में मोतीलाल नेहरू,गाँधी,जवाहर लाल नेहरू भी भाग लेते थे। १९३४ से कांग्रेस सदस्यों पर हिन्दु महासभा की सदस्यता की मनाही लागू होगयी। १९३७ में सावरकर के हिन्दु महासभा के अध्यक्ष बनने के बाद कांग्रेस व हिन्दु महासभा पूर्णतः अलग हो गए। हिन्दु महासभा का सावरकर के पाँच वर्ष का अध्यक्षीय कार्यकाल हिन्दु महासभा का स्वर्णिम काल रहा। हिन्दु महासभा ने हैदराबाद के निज़ाम के अपनी हिन्दु जनता पर किए जा रहे अत्याचारो के विरुद्ध ज़बरदस्त आंदोलन चलाया और निज़ाम हैदराबाद को वहा की हिन्दु जनता पर अत्याचार बंद करने पड़े। भारत की ब्रिटिश सेना में देश का बहुसंख्यक समाज हिन्दु होने के बावजूद हिन्दु सैनिकों की संख्या मात्र ३२ प्रतिशत थी। आए दिन मुस्लिम लीग के नेता सेना में मुस्लिम युवकों की ६६ प्रतिशत संख्या रहने के चलते हिन्दु जनता को धमकाते थे। सेना में हमारा वर्चस्व है हम जब चाहे हिन्दुओं को रगड़ देंगे। सावरकर के हिन्दुओं के सैनिकीकरण कार्यक्रम के चलते हिन्दु युवकों का अनुपात ३२ प्रतिशत से बड़ कर ६६ प्रतिशत हो गया। मुस्लिम लीग के नेतावो की हर समय धमकी देना बंध हुवा। जब कांग्रेस के एक निर्वाचित अध्यक्ष सुभाष चंद्र बोस को गाँधी ने पहले कांग्रेस अध्यक्ष पद से त्यागपत्र देने को बाध्य किया फिर कांग्रेस से भी निकाल दिया ।उस समय अपनी भविष्य की राजनीति के लिए मार्ग दर्शन लेने हिन्दु महा सभा के अध्यक्ष सावरकर से मिलने बम्बई में सावरकर सदन पहुँचे। सावरकर के परामर्श को मानते हुवे देश से निकल कर जापान पहुँचे व रासबिहारी बोस से मिलकर INA का नेतृत्व उनसे लिया।

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