संत कवि गंगादास जी ने जलाई थी रानी लक्ष्मीबाई की चिता

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डॉ. जे एन शर्मा

संत गंगादास के भाई के पौत्र चौधरी हरदयाल सिंह द्वारा दी गई वंशावली से ज्ञात होता है कि गंगादास के पूर्वज अमृतसर के निकट किसी स्थान से आकर ग्राम रसूलपुर में बस गए थे। डॉ. ब्रजपाल सिंह संत ने बोली के आधार पर पंजाब के माझ प्रदेश से इनका आगमन सिद्ध किया है। इनके पूर्वजों का मुख्य व्यवसाय कृषि था। गंगादास के जन्म के समय इनके परिवार के पास 60 एकड़ जमींदारी तथा 80 एकड़ कृषि की भूमि थी। इनके बचपन का नाम गंगाबख्श था। गंगाबख्श 10 वर्ष के भी नहीं हुए थे कि पहले इनकी माता और बाद में पिता का देहान्त हो गया। इनकी माता तो शिशुकाल में ही कालकवलित हो गई थी। प्रभु भक्ति की ओर बालक की तीव्र रुचि थी, इसका कारण कदाचित् वे संस्कार थे जो धार्मिक बुद्धि के माता—पिता से बालक को प्राप्त हुए थे। अत: कृषि कार्य में भी उनकी रुचि तथा मन नहीं था।

ग्यारह वर्ष की अवस्था में बालक गंगाबख्श गृह त्यागकर चले गए तथा हल और बैल खेतों में ही छोड़ गए। बैलों के घर लौटने पर इनकी खोज शुरू की गई, परन्तु कहीं पता नहीं चला। उदासीन संत विष्णुदास से दीक्षा लेकर गंगाबख्श ने उदासीन सम्प्रदाय में प्रवेश किया। यहीं कारण है कि इनके नाम से पहले उदासी या उदासीन का प्रयोग किया जाता है। संन्यास लेने के उपरान्त सद्गुरु द्वारा इनका नाम गंगादास रखा गया। संस्कृत और हिन्दी की प्रारम्भिक शिक्षा विष्णुदास के संरक्षण में ही हुई। शिक्षा में इनकी अत्यधिक रुचि देखकर इन्हें उच्च शिक्षा के लिए वाराणसी भेजा गया। कहते हैं कि वहां लगभग बीस वर्ष तक उन्होंने संस्कृत के अनेक धर्मग्रन्थों का अध्ययन किया। इनका काशी निवास बारह वर्ष की अवस्था से बत्तीस वर्ष की अवस्था तक ही प्रतीत होता है।

तत्पश्चात् भ्रमण करते हुए ये 1855 ई. में मध्य प्रदेश के ग्वालियर नगर के पास सोनरेखा नाम के नाले के निकट कुटी बनाकर रहने लगे। वहीं इन्होंने 18 जून, 1858 को झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का दाह संस्कार किया था, जिसका उल्लेख वृन्दावनलाल वर्मा कृत झांसी की रानी पुस्तक में तथा अन्य ऐतिहासिक ग्रन्थों में भी उपलब्ध होता है। अपने ऐतिहासिक उपन्यास झांसी की रानी में तो वृन्दावनलाल वर्मा ने यहां तक लिखा है कि एक बार लक्ष्मीबाई अपनी अंतरंग सखी मुन्दर के साथ संत गंगादास की कुटिया पर ग्वालियर गई थी। वहां रानी ने संत गंगादास से स्वराज्य स्थापना के विषय में विस्तृत चर्चा की थी। राष्ट्रीय प्रेम और भारत—भक्ति से ओत—प्रोत गंगादास का ह्दय पहले तो यह प्रश्न सुनकर टालता रहा, किन्तु बाद में रानी से उन्होने खुलकर बात की। उन्होंने झांसी की रानी को कहा कि सेवा, बलिदान और तपस्या से ही स्वराज्य की स्थापना हो सकती है। (वृन्दावनलाल वर्मा कृत झांसी की रानी, पृ0 322) भारत को स्वतन्त्र कराने की प्रेरणा देते हुए संत गंगादास ने इनकी ं तक कहा कि यह मत सोचो कि हमारे जीवनकाल में ही स्वराज्य प्राप्ति हो जाए। आप नींव के पत्थर बन जाओ और देशभक्त भी बनते रहेंगे, तब नींव भरने के पश्चात् स्वराज्य का महल उन्नत होगा।

ब्रिटिश सरकार और शासन प्रबन्ध की खुली आलोचना, जो उनके काव्य में उपलब्ध होती है, वह भी उनकी राष्ट्रीय भावना का स्थूल प्रमाण है। अपने लगभग 90 वर्ष के जीवनकाल में गंगादास ने पर्याप्त पर्यटन किया था। काशी, ग्वालियर, हरियाणा तथा पंजाब के अनेक स्थानों में घूमते हुए मेरठ जनपद के ग्राम ललाना, ग्राम फत्तपुर, ग्राम खानपुर, ग्राम रसूलपुर आदि में कुछ समय तक निवास करने के पश्चात् अन्त में 15 अथवा 20 वर्ष तक राजा नृग के ऐतिहासिक कुएं के पास गढ़मुक्तेश्वर में रहे थे, जहां इनका आश्रम आज भी स्थित है। ग्राम ललाना में हिंडन नदी के तट पर रहकर इन्होंने भारतपदावली की रचना की थी। इन्होंने स्वयं लिखा है।

वर्णन करे भजन भारत के बैठ के नगर ललाने मैं। पुत्र सेठ जो काशीराम के दयावन्त सो जाने मैं।।

ग्राम ललाना और चमरावल के मध्य में जहां इन्होंने निवास किया था, वहां बाग, कुआं और कुटी 1970 ई. तक बनी हुई देखी गई थी। सेठ काशीराम को महात्मा जी की सेवा और वरदान से सन्तान प्राप्ति की बात भी अत्यन्त प्रसिद्ध है। पण्डित बालूराम व्यास को यहीं इन्होंने अपना शिष्य बनाया था।

सन् 1893 ई. में इनका ग्राम खानपुर, जिला मेरठ में रहना भी सिद्ध होता है। यहां इन्होंने नासिकेत कथा—काव्य की रचना सम्पन्न की थी। डॉ. ब्रजपाल सिंह संत के अनुसार ये तत्कालीन चौधरी श्रीराम के रथखाने तथा चौबारे में रहे थे। बक्सर के निकट फत्तापुर गांव में भी ये लगभग दस वर्ष तक रहे थे। विजियकौर नामके अपनी शिष्या को इन्होंने यहीं दीक्षिण किया था।

प्रतीत होता है कि ग्वालियर से लौटने के पश्चात् ये अपने ग्राम रसूलपुर के पास कुचेसर रोड चौपले पर भी कुछ वर्षों तक रहते रहे थे। मस्त महात्माओं की भांति ये अपने घोड़े पर चढकर आसपास के संतों से मिलते रहते थे। अपना सफेद रंग का घोड़ा ये सदैव अपने आश्रम में ही रखते थे। जिसकी देखभाल इनके शिष्य करते रहते थे। सन् 1911 ई. में वे दिल्ली दरबार में अपने घोड़ा पर चढ़कर ही दिल्ली आए थे। इनके भव्य व्यक्तित्व का देखकर प्रबन्धकों ने इन्हें किसी रियासत का राजा समझा और घोड़े से उतरते ही इन्हें आ्गे की कुर्सियों पर ले जाने लगे। परन्तु इन्होंने स्वयं उन्हें अवगत कराया कि वे तो साधु हैं, अत: दर्शक—दीर्घा में ही बैठाएं।

बाल ब्रह्मचारी संत गंगादास बहुत पवित्र और नियमित जीवन व्यतीत करते थे। व्रत, पूजा—पाठ बहुत करते थे। बिना स्नान किए भोजन नहीं करते थे और भोजन करते हुए कभी बोलते नहीं थे। वे प्राय: अपने हाथ का बना भोजन 24 घण्टों में केवल एक बार ही करते थे और यह निमय उनका अन्त तक चलता रहा। इस महान संत कवि का निर्वाण सं.1970 (सन् 1913 ई0) की जन्माष्टमी को प्रात: 6 बजे गढ़मुक्तेश्वर में ही हुआ था। प्राण त्यागने से पहले उन्होंने अपने उपस्थित परिवारजनों को आदेश दिया कि मेरा शव गंगा में प्रवाहित करा देना और इस आश्रम की कोई भी वस्तु घर मत ले जाना, क्योंकि यह दान की सामग्री है। सबको कमरे से बहार जाने को कहा और पद्मासन लगाकर प्राण त्योग दिए।

महाकवि गंगादास की लगभग 50 रचनाएं हैं, जिनमें से 45 प्राप्त हो गई हैं। हिन्दी साहित्य के आधुनिक काल के अनेक कवियों कवियों में जो राष्ट्रीय भावना दृष्टिगत होती है, उसका प्रथम कवि भारतेन्दु बाबू हरिश्चन्द्र को इसलिए मान लिया गया था, क्योंकि संत गंगादास और उनके काव्य की खोज तब तक नहीं हुई थी। राष्ट्रीय भावना और अंग्रेजी शासन का विरोध सर्वप्रथम संत गंगादास के काव्य में उपलब्ध होता है। संत गंगादास भारतेन्दु जी से 27 वर्ष पूर्व पैदा हुए थे। हिन्दुस्तान है खराब आज आब सारी जाती रही लिखने वाले संत गंगादास ने ही अंग्रेजी शासनाध्यक्ष का स्पष्ट विरोध करते हुए लिखा था कि — नीतिहीन राजा अन्याई। वेद विरोधी सठ दुखदाई।।

ब्रिटिश शासन की कुव्यवस्था का विरोध करते हुए उन्होंने कहा
चोरों के इस वक्त पर बरत रहे तप—तेज।
भूप दण्ड देते नहीं भई पाप की मेज।।
भई पाप की मेज कचैड़ी लोभी जानो।
नीति तज गयी देस पाप भय सबै समानो।।
गंगादास कह मुखकाले रिश्वतखोरों के।
हाकिम लोभी करैं बरी दावे चोरों के।।

भारतेन्दु—पूर्व हिन्दी काव्य पर यह आक्षेप रहा है कि ब्रिटिश शासन का विरोध अथवा निन्दा करने की राष्ट्रीय भावना उसमें कहीं नहीं मिलती, परन्तु गंगादास का काव्य इसका अपवाद है। समाज में व्याप्त अनाचारों एंव दुराचारों का मूल कारण वे तत्कालीन शासन को ही मानते थे। यथा राजा तथा प्रजा के अनुसार वे कहते थे कि जब राजा ही नीतिहीन, अन्यायकारी और वेद विरोधी हो तो प्रजा का कल्याण कैसे हो सकता है।

ब्रिटिश कालीन भ्रष्ट शासन, अन्यायकारी न्यायालयों, बेईमान न्यायाधीशों, लालची अधिकारियों और रिश्वतखोर कर्मचारियों का यथार्थ चित्रण करते हुए इस संत कवि ने यहां तक कहा है कि वास्तविक चोरों के विरुद्ध किए गए वाद भी उत्कोच—लोलुप न्यायाधीश खारिज कर देते हैं। न्यायालयों की मेज पाप पूर्ण कार्यों का कलुष स्थल बन गई है।
विविध धार्मिक सम्प्रदायों, निर्गुणियों, योगियों आदि की 19वीं शताब्दी में बाढ—सी आ गयी थी। संत गंगादास इनसे प्रभावित तो हुए परन्तु विविध दर्शनों के आचार्य और संस्कृत साहित्य के प्रकाण्ड पण्डित होने के कारण कहीं भी वेदान्त को छोडकर नहीं चले। संत गंगादास के काव्य में वर्णित विविध योग पद्धतियों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे कहीं भी वेदशास्त्रों के विरुद्ध नहीं चले। वे वेदान्ती पहले है और कुछ बाद में। वेद विरोधी सम्प्रदायों के विषय में वे स्पष्ट उद्धोष करते हैं कि ये अनेक सम्प्रदाय कपटी, पाखण्डी,दुखद साधना के प्रचारक और भ्रान्त हैं।

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