गोमूत्र और हमारा स्वास्थ्य

30311032710559735भारत में गोमूत्र को औषधीय रूप में लेने की परंपरा बहुत प्राचीन है। हमारी चिकित्सा प्रणाली और आयुर्वेद एलोपैथिक चिकित्सा प्रणाली की भांति रोग से लड़ता नही है, अपितु रोग को मिटाता है। इसलिए जैसे शोक के समूल नाश के लिए योग की खोज की गयी वैसे ही हमारे ऋषि पूर्वजों ने रोग के समूल नाश के आयुर्वेद की खोज की।

गाय अपने आप में बहुत ही अनोखा और अमूल्य प्राणी है। इसकी रीढ़ की हड्डी में हमारे ऋषियों ने देखा कि एक सूर्यकेतु नाम की नाड़ी होती है, जिस पर सूर्य की स्वर्णिम किरणें जब पड़ती हैं, तो वे किरणें, गोरस (गोमूत्र) तथा गो दुग्ध में मिलकर उनके रंग को सोने जैसा बनाती हैं। इसीलिए गाय के दूध और घी पीले-पीले से होते हैं। सूर्यकेतु नाड़ी के प्रभाव से ही गोमूत्र में भी पीलापन उत्पन्न हो जाता है। यही कारण है कि गाय के दूध-घी का प्रयोग करने वाले व्यक्तियों की चेहरे की रंगत स्वर्णिम हो जाती है।

गांवों के बड़े बुजुर्गों का स्वानुभूत योग था कि जिस व्यक्ति के वीर्य में दोष हो और इस कारण जिसे संतान प्राप्ति का सुयोग और सौभाग्य नही मिल पा रहा हो वह व्यक्ति यदि गाय-बैल की गर्दन के नीचे लटकने वाली खाल की नियमित मालिश अपने हाथों से करे तो उसको संतान प्राप्त हो जाती है। इसी प्रकार गाय की चमड़ी पर नित्य हाथ फेरने से व्यक्ति के त्वचा रोगों में लाभ होता है और टी.बी., कैंसर जैसी घातक बीमारियों का खतरा दूर रहता है। क्योंकि गाय अपनी सांस से तथ जुगाली के समय निकलने वाली झाग से ऐसी बीमारियों को नष्ट करती है। इसीलिए गांवों में लोग गाय की सेवा उसके ऊपर हाथ फेरकर ही किया करते थे और आज भी करते हैं। जहां-जहां गायों की इस प्रकार सेवा की जा रही है, वहां-वहां उपरोक्त घातक बीमारियां अभी नही पहुंची हैं।

गौमूत्र हमें नियमित सेवन करना चाहिए। आजकल गैस चूल्हों से भोजन तैयार हो रहा है। यह भोजन ‘प्रैशर कुकर’ में जब पकाया जाता है तो उसके 93 प्रतिशत पोषक तत्व ‘प्रैशर कुकर’ में ही नष्ट हो जाते हैं। हमें मात्र 7 प्रतिशत पोषक तत्व ही मिलते हैं। जबकि गाय के गोबर से तैयार उपलों पर या आरूणियों से जो भोजन तैयार किया जाता था उसमें 93 प्रतिशत पोषक तत्व उपस्थित रहते थे। इस प्रकार आज कल हम जिस भोजन को ले रहे हैं वह भोजन के नाम पर विष या विषसम ही है। यही कारण है कि छोटे छोटे बच्चों को भी शीघ्र ही चश्मे लग जाते हैं। गोमूत्र और गोदुग्ध का सेवन नियमित करने से यह स्थिति समाप्त हो सकती है। परंतु स्मरण रखना चाहिए कि विदेशी प्रजाति की जर्सी गाय के मूत्र का सेवन कभी नही करना चाहिए।

गोमूत्र सदा ऐसी गाय का सेवन करना चाहिए जो देशी हो तथा विभिन्न वनीय वनस्पतियों को घूम घूमकर चरती हो, व्यायाम करती हो। क्योंकि विभिन्न वनस्पतियों का सेवन करने से गोमूत्र में उन वनस्पतियों के औषधीय गुण आ जाते हैं, जिससे वह हमारे लिए बहुत ही उपयोगी बन जाता है। गौमूत्र की मात्रा लगभग 25 मिलीलीटर या ढाई तोला के लगभग लेनी चाहिए। यह मात्रा प्रात: एवं सांयकाल दोनों समय लेनी उचित होती है। इसके नियमित सेवन से पेट में कोष्ठबद्घता (कब्ज) का रोग कभी नही हो पाता है। मल पेट में पड़ा रहकर सड़ता नही है, अपितु दोनों समय पेट साफ हो जाता है। जिससे अपानवायु दुर्गन्धित नही होती है और गैस नही बनती है। इसके अतिरिक्त वायु विकार व संधिवात आदि रोग भी शांत होते हैं। क्योंकि जब पेट में मल सड़ेगा नही तो वायु (गैस) भी नही बनेगा और इस प्रकार वायु रोगों का जन्म ही नही होगा। आजकल लोगों को मोटापा बहुत शीघ्रता से आता है, जिससे संधिवात और अन्य वायु विकारों का जन्म होता है। यदि गोमूत्र का सेवन किया जाएगा तो ये मोटापे का रोग कभी निकट भी नही आ सकेगा। फेफड़े स्वच्छ और स्वस्थ रहेंगे और हमारे हृदय को अतिरिक्त ऊर्जा व्यय करनी नही पड़ेगी। हृदय स्वस्थ और सबल रहेगा। हृदय की सबलता और स्वस्थ रहने से हमारे भीतर धैर्य और सहनशक्ति बढ़ती है, क्योंकि चिड़चिड़ापन हमसे दूर रहता है। धैर्य और सहनशक्ति के बढ़ने से ओज और तेज में वृद्घि होती है। जिससे हमारा मुख मंडल सदा शांत रहता है और वह स्वर्णिम आभा से दमकता रहता है।

इस प्रकार गोमूत्र का अपना वैज्ञानिक स्वरूप है हमें यह औषधि प्राचीन काल में तो मुफ्त ही मिल जाया करती थी परंतु अब मनुष्य ने गोवंश को काट-काटकर बहुत कम कर दिया है तो इसलिए अब गोमूत्र हमें पैसे से ही मिलता है। परंतु फिर भी अन्य औषधियों से यह अब भी सस्ता है। पर जब बात स्वास्थ्य एवं सौंदर्य की रक्षा की हो तो कुछ धन खर्च कराके भी इन्हें प्राप्त कर लेना चाहिए। गौमाता की जय में ही हमारी जय है, इसलिए गोरक्षा के लिए पहले से अधिक पुरूषार्थ करने का समय आ गया है।

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