Categories
विशेष संपादकीय वैदिक संपत्ति

मनुष्य का आदिम ज्ञान भाषा-1

आर्यसभ्यता का उज्जवल स्वरूप
आर्यसभ्यता का उज्ज्वल स्वरूप तो आश्रमों में ही दिखलाई पड़ता है, जहां कि आर्यों का तीन चतुर्थांश भाग सादे और तपस्वी जीवन के साथ विचरता है और एकचतुर्थांश भाग उसी तीन चतुर्थांश भाग की सेवा में लगा रहता है। इसी तरह आर्य सभ्यता का आपत्कालिक रूप वर्णों में दिखलाई पड़ता है जो आपत्ति के समय शिक्षा, रक्षा, जीविका और कारीगरी के द्वारा सेवा करके अपने समाज की रक्षा करता है। यही असली आर्यसभ्यता है। इसका यदि उज्ज्वल रूप देखना हो तोवह केवल वेदों की संहिताओं में ही दिखलाई पड़ सकता है, किसी लौकिक साहित्य अथवा लौकिक साहित्य से प्रभावित किसी वेदभाष्य में नही। इसलिए संप्रदायों का चश्मा उतारकर उस वर्णारमव्यवस्था का जो अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष में ओतप्रोत है निरीक्षण करने ही से ज्ञात हो सकता है कि आर्यों की वास्तविक सभ्यता क्या है। आर्यों की असली सभ्यता के नमूने उपनिषदों में श्रेय और प्रेय का वर्णन करते हुए और गीता में दैवी तथा आसुरी संपत्ति का वर्णन करते हुए स्पष्ट कर दिये गये हैं। अतएव हमने उसी श्रेय और दैवी संपत्ति से संबंध रखने वाली वास्तविक आर्यसभ्यता का स्वरूप इस पुस्तक में दिखलाया है। ऐसी दशा में यह न तो आर्य समाज से विरोध रखती है न सनातन धर्म से, न हिंदुओं से न मुसलमानों से, न ईसाइयों से न पारसियों से, और न जैनों से न बौद्घों से। यह सभ्यता तो मनुष्य मात्र की है और मनुष्यमात्र को एक समान ही लाभ पहुंचाने वाली है। यही कारण है कि इसमें स्थिरता का गुण विद्यमान है। यह अपने इस स्थिर गुण के ही कारण लाखों वर्ष तक अपने असली रूप में रह चुकी है और आगे भी यह अपने शुद्घ रूप के साथ हमेशा तक रह सकती है इसमें जरा भी संदेह नही।
आर्यसभ्यता का असली स्वरूप प्रकट करने के लिए हम को इस ग्रंथ के तृतीय खण्ड में कई जातियों का इतिहास लिखना पड़ा है और कई स्थानों पर अपने आचार्यों, पूज्यों और मित्रों के मत की आलोचना भी करनी पड़ी है जिसके लिए हमें दुख है। हमारा कभी स्वप्न में भी खयाल नही है कि संसार की कोई भी जाति, चाहे वह द्रविड हों या चितपावन, मुसलमान हो या ईसाई और पारसी हो या बौद्घ, असली मौलिक आर्यों के खून से संबंध नही रखती। हम संसार भर के मनुष्यों को आर्यों के ही वंशज समझते हैं। इसी तरह यह भी ख्याल नही है कि आर्यों के साहित्य को केवल द्रविड़ों, चितपावनों, मुसलमानों और ईसाईयों ने ही दूषित किया है और उत्तरी, पश्चिमी और पूर्वी ब्राह्मïणों, क्षत्रियों और अन्यों ने न हीं। प्रत्युत हमारा यह विश्वास है कि जिस प्रकार उपर्युक्त जातियों ने आर्यों के साहित्य को बिगाड़ा है उसी तरह अन्य जातियों को बिगाड़ा है। इस बात को हमने तृतीय खण्ड ही में लिख भी दिया है। पर स्मरण रहे कि हमने जो कुछ लिखा है कि वह किसी को बदनाम करने या नीचा दिखलाने के लिए ही लिखा है। इसलिए हम उन महानुभावों के समक्ष सजा के प्रार्थी हैं जो हमारी समालोचना से असंतुष्टï हों। इसी तरह हम अपने पूज्यों और मित्रों से भी क्षमा प्रार्थना करते हैं, जिनके मत की आलोचना हमने विवश होकर की है। इसके सिवा हमको यह बात अच्छी तरह ज्ञात है कि वैदिक राजमार्ग में जमाई हुई जिन दुर्गम और दुर्जेय को हमने काटकर प्राचीन मौलिक आर्यों के घण्टापय को विस्तृत किया है, उन सिद्घांतरूपी शिलाखों से प्रभावित हुए, विद्वानों की दृष्टिï से हमने अनेक शास्त्रीय बारिकियों को न समझा होगा। पर इसमें हमको कुछ भी नही है। हम खूब जानते हैं कि शास्त्रों का मत समझने में हमसे गलती हुई होगी। किंतु इतना हमें विश्वास है कि हमने आर्यसाहित्य और आर्य सभ्यता के अनुशीलन से आर्यों के वास्तविक उद्देश्य और वास्तविक आचार व्यवहार प्रकट करने में गलती नही की। यदि यह सत्य हो तो यह बात निर्विवाद है कि हमने उसी उद्देश्य और उसी रहन प्राचारार्थ यह पुस्तक लिखी है, शास्त्रीय बारीकियों को समझाने के लिए नही। यही कारण है कि इस पुस्तक वेदों के ही सिद्घांत लिये गये हैं और साम्प्रदायिक मतमतांतरों से संबंध रखने वाले शास्त्रों के सिद्घांतों तक ध्यान नही दिया गया। वेदों के सिद्घांत संग्रह करने में भी वेदभाष्यों से बहुत ही कम सहायता ली गयी कि वेदों के भाष्य की सांप्रदायिक रंग में रंगे हुए हैं और मनमानी कल्पनाओं से परिपूर्ण है। हमारा तो मतमतांतरों और साम्प्रदायिक सिद्घांतों और शास्ज्ञ विद्वानों से भी क्षमा की याचना करते हैं और करते हैं कि वे केवल हमारे शुद्घ उद्देश्य को ही देखें और अपने मन में जमे हुए भावों के वशीभूत होकर इसमें उद्देश्य को ढूंढ़ने का कष्ट न उठावें।
हम देखते हैं कि जहां एक ओर कुछ लोग वेदों से भौतिक विज्ञान और योरोपीय ढंग की बातें निकालते हैं और ऊपरी ओर कुछ लोग पशुहिंसा, मद्यपान, व्यभिचार, अश्लील पूजन जैसी ही अन्य अनेकों ऊलजलूल और वुद्घि साम्प्रदायिक बातें निकालते हैं, वहां तीसरी ओर से यह भी आवाज आती है कि वेदों में वर्तमान समयोपयोगी बिल्कुल ही अभाव है। ये लोग कहते हैं कि इस समय पाश्चाताप विज्ञान ने जो उन्नति की है और विद्वानों ने ज्ञान संग्रह किया है उसको देखते हुए वेदों में कुछ दभी उन्नत विचार नही पाए जाते। इसलिए वेदों के पीछे और उनके और उनके अध्ययन में समय नष्टï करना उचित नही है। जहां तक हमारा अनुभव है, हम देखते हैं कि सारे दल की बातों का असर देश के साधारण लोगों पर तो पड़ा ही है पर बड़े से बड़े नेता भी इन बातों के नही बचे। यही कारण है कि हिंदू धर्म को मानते हुए भी वेदों के पठन पाठन का वैदिक विज्ञान के विचार वैदिक व्यवस्था के प्रचार का सारे भारतवर्ष में कहीं पर भी किसी भी पाठशाला, गुरूकुल ऋषिकुल और प्रलय-प्रबंध नही है। इन संस्थाओं के संचालकों को वेदों में समपयोगी शिक्षा की कोई भी विधि नही पड़ती। कुछ तो उनमें रेल तारका वर्णन न पाकर हताश हो ागये हैं, कुछ साम्प्रदायिक बातों को न देखती साध गये और कुछ समय कर उपेक्षा कर बैठे हैं कि वेदों में वर्तमान युग के अनुकूल शिक्षा नही है समयोपयोगी शिक्षा मिल रही है, इसलिए वेदों में शिर मारने की आवश्यकता नही है। वेदों की ही शिक्षा इस समय में भी समयोपयोगी हैं योरप की नहीं।
वेदों में जो समयोपयोगी शिक्षा का अभाव दिखलाई पड़ता है। उसका कारण वेद नही है किंतु वेदों के भाष्यकार हैं। अधिकांश भाष्यकारों ने वेदों से वेदों की वास्तविक शिक्षा के प्राप्त करने का यत्न नही किया, प्रत्युत उन्होंने वेदों से उन बातों के निकालने का यत्न किया है जो उनकी प्रिय थीं, जिनमें उनका मनोरंजन था जिनसे वे थे। यही कारण है कि लोगों को वेदों के असली स्वरूप का दर्शन नही हो पाता। बहुत दिन से देशी और विदेशी वेदों को चक्कर में डाले हुए हैं। ऐसी दशा में लोगों की जो वेदों से उपेक्षा दिखलाई पड़ती है। परंतु हम देखते हैं कि अब समय फिरा है। संसार में वेदानुकूल वायुमंडल तैयार है और अब एक प्रकार से संसार स्वयं वेदों की वास्तविक शिक्षा की ओर आने लगा है। इसलिए हमने वेदों की वास्तविक शिक्षा को ही संसार के सामने उपस्थित करने का यत्न किया है, अपनी ओर से नमक मिर्च लगाने का नही। हम नही जानते कि हमें इसमें कहां तक सफलता हुई है पर इतना तो हम कह सकते हैं कि जब हम जैसे वैथ्दक ज्ञानविहीन क्षुद्र व्यक्ति भी वेदों से एक साव्रभौम योजना की सामग्री प्राप्त कर सकते हैं, तो वे विद्वान जो ज्ञानविज्ञान, भाषा शास्त्र, इतिहास, धर्म और राजनीति के ज्ञाता है यदि वेदों का स्वास्थ्य करें तो वे वेदों से बहुत कुछ लोकोपयोगी शिक्षा का पता लगा सकते हैं यह हमारा दृढ़ विश्वास है। यही कारण है कि हमने इस ग्रंथ में मुख्य विषय को चतुर्थ खण्ड में और प्रथम, द्वितीय तथा तृतीय खण्ड में वेदों की महत्ता का ही वर्णन किया है। इस वर्णनक्रम का यही प्रयोजन है कि लोगों को अच्छी तरह विदित हो जाए कि वेद आदिमकालीन है अपौरूषेय है अतएव उनमें जो सार्वभौम शिक्षा दी गयी है वह निभ्रांत है और संसार के समस्त मनुष्यों के लिए उपयोगी तथा प्राणीमात्र के लिए कल्याणकारी है।
हमारी मूढ सेवा
हम जानते हैं कि जिन विषयों काा समावेश इस ग्रंथ में किया गया है उन पर ग्रंथ लिखने की योग्यता हम में नही है। हम ऐसे विषयों की ओर संकेत करने के भी अधिकारी नही हैं। इसलिए हमको उचित न था कि हम ऐसे महान विषयों पर कलम उठाते हैं। पर हम देखते हैं कि आज पचास साठ वर्ष से इस देश में धार्मिक, सामाजिक और राजनैतिक चर्चा हो रही है और इन सभी चर्चाओं में हस ग्रंथ से संबंध रखने वाली प्राय: सभी बातों की आवश्यकता भी पड़ती है। पर जहां तक हमें ज्ञान है आज तक किसी ने समस्त बातों का सामंजस्य करके कोई ग्रंथ तो क्या चार लाईनें भी लिखने की कृपा नही की। जिन बातों का उल्लेख इस ग्रंथ में किया गया है क्या बिना उन पर प्रकाश डाले, बिना उनको समझे और बिना उनकेा हम किये कोई भी धर्म कोई भी समाज और कोई भी राष्टï्र किसी प्रकार की पक्की, स्थिर और सुखदायी व्यवस्था कर सकता है? कभी नही हरगिज नही ऐसी दशा में ग्रंथ न ही, केवल एक प्रकार की विषयसूची उपस्थित करके यदि हमने विद्वानों के सामने घृष्टïता की है तो यह कहने में हर्ज नही कि हमारी यह मूढ सेवा क्षमा के योग्य है। हमारा विश्वास है कि जब तक भारतीय विद्वान हमारी इन सूचनाओं पर यथोचित ध्यान न देंगे, इस पुस्तक में दिये समस्त विषयों पर अच्छा प्रकाश न डालेंगे और उन समस्त वैज्ञानिक सामाजिक और राजनैतिक मार्गों में घूम न लेंगे जिनकी कि आर्य वैदिक सभ्यता के प्रचार में आवश्यकता पड़ना संभव है, तब तक संसार की सभ्य जातियों में वैदिक आर्यसभ्यता का प्रचार नही हो सकता और न संसार की जटिल समस्याओं की उलझन ही सुलझ सकती है। इसलिए यद्यपि यह सूची परिपूर्ण नही कही जा सकती तथापित त्याज्य की उपेक्षा भी नही है, यही हमारी विनय और प्रार्थना है।
क्रमश:

Comment:Cancel reply

Exit mobile version
betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
casinolevant giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti mobil giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betgaranti mobil giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
betgaranti giriş
betgaranti mobil giriş
betgaranti güncel giriş
Kolaybet Giriş
ngsbahis giriş
artemisbet güncel
bettilt giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
betgaranti giriş
betnano güncel giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
bettilt giriş
Betgaranti
sahabet giriş
betgaranti
betgaranti giriş
onwin giriş
onwin giriş
grandpashabet giriş
kolaybet
betgaranti giriş
sahabet
sahabet
marsbahis giriş
onwin
sahabet
sahabet
sahabet
sahabet
sahabet
sahabet
sahabet giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
betkanyon
betkanyon
sahabet giriş
betkanyon giriş
betkanyon giriş
marsbahis giriş
marsbahis giriş
onwin
onwin
bettilt giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
betkanyon
Betgaranti Giriş
holiganbet
holiganbet
sahabet
Kolaybet Giriş