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डॉ राकेश कुमार आर्य की लेखनी से

भारतीय साम्यवाद और कम्युनिस्ट विचार धारा में मौलिक अंतर है

पिछले अंक का शेष …

सारे संसार को एक विश्व संस्था के रूप में शासित करके चक्रवर्ती राज्य स्थापित करने की भावना में इसके लिए कोई स्थान नही है। यहां व्यष्टि से समष्टिï की ओर दृष्टिïपात करना है। समष्टिï में प्राणिमात्र का भला करना है। अपने विचार में बाधक लोगों को सही रास्ते पर लाना होता है। जहां आर्यत्व या श्रेष्ठतत्व के मार्ग में अवरोध बनकर दुष्टï लोग खड़े हो जायें वहां युद्घ एक अंतिम विकल्प के रूप में अपनाया जाता है। जबकि स्टालिनवादी युद्घ को पहला और सर्वोत्तम उपाय अपने लिए मानते हैं। पिछले सौ वर्ष के इतिहास में ही कम्युनिस्टों ने 1917 की रूसी क्रांति से लेकर आज तक करोड़ों लोगों की हत्या कर डाली है। जबकि भारत की वैदिक संस्कृति का साम्यवाद करोड़ों वर्ष में भी ऐसा नहीं कर पाया। यही कारण है कि हिंदुत्व अर्थात आर्यत्व को लोग आज भी सम्मान की दृष्टिï से देखते हैं जबकि कम्युनिस्ट आंदोलन जिस गति से बढ़ा है उस गति को वह बनाये नहीं रख पाया और उससे बहुत से देशों ने तौबा कर ली।
भारतीय ऋषियों ने समाज में शांति स्थापित करने के लिए तथा मानवमात्र को उसकी प्रत्येक प्रकार की उन्नति का मार्ग उपलब्ध कराने के लिए राज्य की खोज की। हमारी मान्यता में असामाजिक लोगों से भद्र पुरूषों के सम्मान की रक्षा कराने के लिए राज्य की उत्पत्ति हुई। अन्यथा प्रारंभ में नैतिक और धार्मिक व्यवस्था के अनुसार मानव समाज का संचालन होता था। लेकिन जब असामाजिक तत्वों ने उस व्यवस्था में बाधा पहुंचानी आरंभ की तो ऋषियों ने राज्य की स्थापना की।
कम्युनिस्टों की मान्यता है कि राज्य मनुष्य के विकास में बाधक है। इसलिए उनका मानना है कि अराजकतावाद की स्थिति ही मनुष्य के लिए उपयोगी है। पर वे संक्रान्ति काल के लिए राज्य की उपयोगिता को अवश्य ही स्वीकार करते हैं। वह राज्य की शक्ति को, कम्युनिस्ट व्यवस्था को स्थापित करने के लिए एक साधन के रूप में प्रयोग करने के पक्ष में है। कम्युनिस्टों का यह चिंतन भी लगभग एक शताब्दी पुराना है। सौ वर्ष कम्युनिस्टों को संक्रान्ति काल से गुजरते हुए हो गये हैं। लेकिन उनका संक्रांति काल पूर्ण होने को नहीं आता है। हमारा मानना है कि आएगा भी नही। अराजकतावाद की जिस अवस्था को कम्युनिस्ट मनुष्य के लिए उत्तमोत्तम स्वीकार करते हैं, वह मनुष्य के लिए ही नही अपितु प्राणिमात्र के लिए भी घातक है। क्योंकि उस अवस्था में नैतिक व्यवस्था का सर्वथा लोप होता है। जैसा कि हम आज देख भी रहे हैं। हम कानून के शासन में जी रहे हैं, लेकिन कानून के रहते हुए भी कानून की ही धज्जियां उड़ रही हैं। पशुवध निषेध कानून है लेकिन पशुवध निषेध कानून के रहते हुए भी पशुवध कैसे किया जा सकता है, समाज के दुष्ट लोग इसी चिंतन में लगे रहते हैं और जन साधारण को बताते रहते हैं कि तुम अवैध कार्य कैसे कर सकते हो? हर कानून के विषय में यही स्थिति है। फलस्वरूप अराजकतावाद को बढ़ावा मिल रहा है। जिससे समाज की स्थिति बड़ी ही दयनीय होती जा रही है। इस दयनीय अवस्था में हम जितना फंसते जा रहे हैं उतनी ही हमें राज्य की आवश्यकता अनुभव हो रही है। कम्युनिस्टों का मानना है कि आर्थिक उत्पादन के सब साधनों पर किसी व्यक्ति का स्वत्व न होकर समाज का स्वत्व होना चाहिए। जमीन कल कारखाने आदि उत्पादन के विविध साधन व्यक्तियों की मिल्कियत में न रहें अपितु समाज उनका स्वामी हो। लगता है कि घूम फिरकर कम्युनिस्ट राज्य को व्यक्ति के लिए अनंत काल तक के लिए एक अनिवार्यता मानते हैं। क्योंकि जिसे वह समाज कहते हैं। वह समाज मानव की दानवता को नियंत्रित करने के लिए ही अस्तित्व में आता है। वही मनुष्य एक सामाजिक प्राणी कहा जा सकता है जो दानवता का परित्याग कर चुका हो। दानवी वृत्ति बनाये रखने वाले किसी भी व्यक्ति को आप कभी भी सामाजिक नहीं कह सकते हैं, लेकिन एक ओर अराजकतावाद को व्यक्ति के लिए आदर्श मानना और दूसरी ओर समाज की उपयोगिता को स्वीकार करना दोनों ऐसी बातें हैं जो कम्युनिस्ट विचारधारा में व्याप्त द्वंद्व भाव को स्पष्टत: परिलक्षित करतीं हैं।
भारत के ऋषियों ने अपरिग्रहवादी विचारधारा को मानव समाज को शासित और शासक या शोषित और शोषक में विभाजित करने से रोकने के लिए एक अमोघ शस्त्र के रूप में खोजा था। इस अवस्था में यदि समाज को ढाल दिया जाए तो समाज में नैतिक व्यवस्था लागू हो जाएगी और समाज में लूट, हत्या और डकैती आदि के अपराधों में अप्रत्याशित कमी आ जाएगी। इस अवस्था तक पहुंचने के लिए भारत के ऋषियों ने योग मार्ग की खोज की थी। उन्होंने मन नाम के महाव्याघ्र को नियंत्रित करने के लिए व्यक्ति को आत्मविजयी से विश्व विजयी बनने की ओर अग्रसरित किया था। इसके लिए महर्षि पतंजलि का अष्टांग योग आज भी संसार के लिए एक महौषधि के रूप में उपलब्ध है। जहां-जहां तक इस महौषधि का प्रभाव हमारे बाबा रामदेव जैसी दिव्य विभूतियों के प्रयास से होता जा रहा है वहीं से रोग शोक और भोग मिटता जा रहा है लेकिन कम्युनिस्टों के पास ऐसी कोई औषधि नहीं है जो संसार में व्याप्त कलह, कटुता, ईष्र्या और द्वेष की अग्नि में जलते मानव का उपचार करने में समर्थ हो सकें। संसार में युद्घों का कारण हिंदुत्व की दृष्टि में उन लोगों की मानसिकता है, अथवा सोच है या उनकी गतिविधियां या कार्य हैं जो मनुष्य समाज की मुख्यधारा में बाधा डालते हैं और लोगों को अपने झंडे तले लाने का अनुचित प्रयास करते हैं। ये अराजकतावादी लोग आतंकवादी होते हैं। इनका कार्य समाज में आतंक फेलाना होता है। वैदिक संस्कृति में इन आतंकियों का सफाया करना राज्य का प्रमुख कार्य है, जबकि कम्युनिस्ट स्वयं ही आतंक फेेलाने की बात कहते हैं। एंजल्स के अनुसार क्रांति में जो पक्ष विजयी होता है, उसे अपने शासन को कायम रखने के लिए आतंक का प्रयोग करना पड़ता है और उसके अस्त्र शस्त्र प्रतिक्रियावादियों के हृदय में आतंक उत्पन्न करते हैं। भारतवर्ष में युद्घ को आपद्घर्म माना गया है। यहां आर्यों की सभ्यता में ब्रहमचर्य, सादगी पशुपालन, जंगलों की रक्षा, यज्ञ, सार्वभौमिक राज्य, युद्घ तथा धर्मप्रचार नामक आठ अंगों को स्वीकार किया गया है। आपद्घर्म युद्घ पर विचार करते हुए पं. रघुनंदन शर्मा लिखते हैं-जिस प्रकार अन्य आपत्तियों के समय अन्य आपद्वर्म की योजना होती है, उसी प्रकार असभ्य बर्बरों को शिक्षित करने के लिए युद्घ का प्रयोग भी स्वीकार किया गया है। युद्घ के द्वारा आर्यों ने सदैव आततायी बर्बरों को वश में किया है। यही कारण है कि आर्यसभ्यता में युद्घ निपुण योद्घा का बड़ा मान रहा है।
अब हम भारत की सामाजिक व्यवस्था पर आते हैं। भारत की सामाजिक व्यवस्था आश्रम व्यवस्था तथा वर्ण व्यवस्था पर आधारित है। कम्युनिस्ट इतिहासकारों ने भारत की व्यवस्था को समझने का प्रयास ही नहीं किया है। उन्होंने भारतीय होकर भी अभारतीयता का परिचय दिया है। उनका इतिहास बोध भारत के संदर्भ में संकीर्ण और पूर्वाग्रह ग्रस्त रहा है। उन्हें भारत के विषय में जानकारी अपने विदेशी आकाओं से मिली हैं, इसलिए भारत को और भारत की परंपराओं को इन्होंने उसी दृष्टिकोण से देखने समझने और जानने का प्रयास किया है। जबकि आर.एस.एस. ने भारत की महान ऐतिहासिक परंपराओं को वर्तमान का गौरव और भविष्य की उज्जवल संभावनाओं से परिपूर्ण एक गौरवगाथा के रूप में प्रस्तुत करने का वंदनीय और अभिनंदनीय कार्य किया है।
भारत की आश्रम व्यवस्था वास्तविक साम्यवाद की उद्घोषिका है। आश्रम चार हैं-पहला ब्रहमचर्याश्रम, दूसरा ग्रहस्थाश्रम, तीसरा वानप्रस्थाश्रम तथा चौथा संन्यासाश्रम। पहला आश्रम शक्ति के संचय का, ज्ञानार्जन का और व्यक्तित्व के परिष्कार का आश्रम है।
ब्रहमचर्याश्रम में ज्ञानार्जन की अनिवार्यता है।
जिससे सिद्घ होता है कि भारत के प्राचीन समाज में शिक्षा सबके लिए अनिवार्य थी। क्योंकि वह जीवन की मूलभूत आवश्यकता थी। दूसरा आश्रम ग्रहस्थाश्रम है, जिसमें शक्ति का अपव्यय होता है। गृहस्थ एक व्यावहारिक आश्रम है। अत: वहां गलतियां भी हो सकती हैं। इसलिए गृहस्थी के लिए अनिवार्य किया गया कि वो ब्रहमचर्याश्रम वालों का पालन पोषण वृद्घि और विकास तो करेंगे ही साथ ही वानप्रस्थी और संन्यासी भी उन्हीं के ऊपर निर्भर रहेंगे। गुरूकुलों में नियुक्त आचार्यों के लिए हमारे यहां वेतन नहीं होता था। उनकी सारी आवश्यकताओं की पूर्ति ग्रहस्थी लोग तथा राजा दानादि देकर करते थे।
यह दानादि की व्यवस्था राजा को जहां नागरिक विषयों में कम से कम हस्तक्षेप करने की ओर प्रेरित करती थी वहीं नागरिकों को कत्र्तव्यों के प्रति समर्पित करती थी। उससे एक बहुत ही सुरूचिपूर्ण परिवेश समाज में विनिर्मित होता था। आधुनिक काल में कम्युनिस्टों ने नागरिकों की कत्र्तव्य भावना को मारकर उसे अधिकार समर्थक बनाया है। कम्युनिस्ट विचार धारा ने लोगों के साथ इमोशनल ब्लैकमेलिंग करते हुए गाना सिखाया है कि हमारी मांगें पूरी करो, हमारी मांगें पूरी करो। उसने व्यक्ति को अधिकार प्रेमी को बनाया पर कहीं ये नहीं बताया कि हमें अपने ये ये कर्तव्य पूरे करने दो। इसका परिणाम ये आया है कि भारत में भी लोगों ने श्रमदान की वास्तविक साम्यवादी भावना को विस्मृत कर दिया है।

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