गतांक से आगे….
उनकी भौतिक प्रवृत्ति से यही प्रतीत होता है कि न उनका कोई पशु है न पक्षी। जो है वह मारकर खाने के ही लिये हैं। इसी तरह न उनका कोई इष्टमित्र है न नौकर चाकर। जो है वह अपना स्वार्थ साधन करने के लिए अथवा अपना काम कराने के लिए। इसी तरह न उनकी कोई पत्नी है न संतान। पत्नी है पशुवृत्ति की निवृत्ति के लिए और संतान हैं युद्घों में लड़कर दूसरों का सर्वस्व छीनने के लिए।
इस प्रकार से थोड़ा चेतन जगत से जो उनका संबंध दिखलाई पड़ता है वह भी उस चेतना को नुकसान पहुंचाने के लिए है। इस से सहज ही अनुमान कर लेना चाहिए कि जड़वादियों की भौतिक उन्नति ने उनको किस प्रकार भीरू बनाकर चेतन जगत का विरोधी बना दिया है।
किंतु स्मरण रखना चाहिए कि चेतन जगत परमात्मा का समीपी प्यारा मित्र है। उसको जितना ही सताया जाता है उतना ही उसमें क्षोभ उत्पन्न होता है और जितना ही क्षोभ उत्पन्न होता है उतना ही लौटकर वह सतानेवालों का अपकार करता है। आज संसार में जो अशांति हो रही है कलह, लड़ाई बीमारी और दुष्काल हो रहे हैं इन सबका कारण उक्त चेतनक्षोभ ही है। इसीलिए इस जड़ उपासना और चेतन अवहेलना की इस बढ़ती हुई बाढ़ से अब सहृदय पुरूष घबराने लगे हैं। योरप देश ही से इस बाढ़ का प्रारंभ हुआ है और वहीं पर इसके ताडऩे वाले भी उत्पन्न हो गये हैं। यही कारण है कि वहां के विद्वानों ने इस भौतिक उन्नति की अनिष्टता पर प्रकाश डालने के लिए अनेकों ग्रंथ और लेख लिखे हैं। उनमें से जर्मन निवासी एडॉल्फ जस्ट नामी विद्वान की ‘रिटर्न टु नेचर’ नामी पुस्तक से हम कुछ उद्घरण उद्धृत करके दिखलाते हैं कि किस प्रकार अब योरप के विद्वान भौतिक उन्नति से घबराते हैं और किस प्रकार वे मनुष्य की आरंभिक रहन सहन की खोज कर रहे हैं? उद्घरणों के भावार्थ मूल में और ज्यों के त्यों वाक्य फुटनोट में हैं।
दु:खों के कारण
-आरंभ में मनुष्य राग-द्वेष, दुख दरिद्र से मुक्त था। न वह पापी था न रोगी। वह विशुद्घ था और ईश्वरीय तेज उसमें विद्यमान था।
-वह अपने आपके कुसूर से स्वच्छन्दता और आज्ञा भंग से पतित हुआ और संसार का स्वर्गीय सुख खो बैठा।
-उसकी अपने आपकी योग्यता और उन्नति ने न राज्य किया और न हुकूमत परंतु अपराधों की वृद्घि की, जिससे रोग, दोष, दुख-दरिद्रों ने आ घेरा। विषय-वासना से उत्पन्न हुई गुलामी से सारी दुर्गति हो गयी।
-वर्तमान वैज्ञानिक ढूंढ तलाश ने जिंदा पशुओं के शरीर काट काटकर आंख, कान, हृदय, पेट आदि को निकाला। इन बेदर्द अपराधों के लिए वर्तमान सायंस जबावदार है।
-विज्ञान बेदम है। भूकंप आने के पहले पशु पक्षी भाग जाते हैं, पर मनुष्य को खबर नही होती। विज्ञान वासियों का कमीशन भी एक बार कुछ खबर न पा सका और भूकंप आ गया।
-बीमारी पाप है यदि संसार में पाप न हो, तो बीमारी भी न हो। यह मानी हुई बात है कि मानसिक विकार खुदगरजी, अभियान, ईष्र्या, द्वेष अनुदारता और क्रोध आदि का भयंकर असर शरीर पर पड़ता है।
-मनुष्य के पापों का असर समस्त नेचर को दूषित कर देता है। मनुष्य ने उन्नति के नाम से नेचर को बिगाड़ दिया है। जंगलों को काटकर वायु को दुर्गन्धित करके और शिकार खेलकर सृष्टि को अस्वाभाविक बना दिया है।
-संसार में समस्त मनुष्य अनेक प्रकार के रोगों से पीडि़त है। पागलपन बढ़ रहा है और आत्महत्या दिन प्रतिदिन बढ़ती जाती है। यदि सायंस की उन्नति एकदम बंद कर दी जाए तो फिर परमेश्वर सहायता करे।
-क्या कभी किसी ने विचार किया कि हम क्यों जीते हैं? हमारे जीवन का क्या उद्देश्य है, हम क्यों मरते हैं, संसार का मुख्य प्रयोजन क्या है और परलोक क्या है?
-कला कौशल और व्यापार ने उक्त स्थान छीन लिया है। नवीन आविष्कारों ने संसार को उलट दिया है। मनुष्य की दौड़ धूप इतनी बढ़ गयी है कि उसे हम चिंताजनक अशांति कह सकते हैं। व्यापार ने संसार में एक लड़ाई बरपा कर दी है, जैसी आज तक कभी नही हुई। व्यापारी रेलों, साइकिलों और मोटरों के द्वारा शहर-शहर, पहाड़-पहाड़ और दरिया-दरिया मारे फिरते हैं। जहां ये साधन काम नही देते, वहां हवाई जहाजों द्वारा जाते हैं। इनको सुख नही मिलता। कौन ऐसा व्यापारी है जो बीमार और अशक्त नही? स्नायु पीड़ा पृथिवी का नरक ही है।
-कुदरत और सभ्यता दोनों परस्पर विरोधी हैं, जो कभी एक नही हो सकते। प्राचीन काल में मिश्र, बैबिलोन, फिनीशिया, यूनान और रोम आदि ने सभ्यता का विस्तार किया, पर आज उनका कहीं पता नही है। आज अनेक श्रमजीवी, कारखानों के धुएं और खतरनाक यंत्रों से अपना आरोग्य और स्वतंत्रता खो रहे हैं।
-ऊंची जातियों, हाकिमों और पूंजीपतियों ने अपनी शक्ति से निर्बल जातियों को कुचल डाला है। मानसिक पाप से प्रकृति पर धक्का लगता है। जंगलों के काटने, हवा और पानी के बिगाडऩे से भीतर ही भीतर प्रकृति में विकृति उत्पन्न हो जाती है।
-यदि मनुष्य के लिए पृथिवी में चलने की अपेक्षा हवा में उडऩा उत्तम होता तो उसके पंख अवश्य होते।
-बहुतों का ख्याल है कि मनुष्य नेचर की ओर नही लौट सकता। वह बुद्घिबल से नेचर को पहुंच जाएगा। किंतु मालूम नही ये लोग बुद्घिबल किसको कहते हैं? इनका बुद्घिबल मनुष्य को कभी सुखी, नीरोग और मृत्युंजय नही बना सकता।
-सभ्यता ने इसके पूर्व ऐसी ्नति कभी नही की। इसका भी प्रत्याघात होगा जो या तो इस सभ्यता को नष्ट कर देगा या नेचर और परमेश्वर तक पहुंचाएगा।
-मनुष्य नेचर को अपना गुलाम बनाकर सुख चाहता है, परंतु वह इस मार्ग से दुखों की ही ओर जा रहा है क्योंकि उसने ईश्वरीय सृष्टि नियमों का भंग किया है।
-डारविन के विकासवाद से उच्छं्रखलता बढ़ी है और मनुष्य जाति की बड़ी हानि हुई है। इस सिद्घांत से मनुष्य की आबरू बहुत ही कम हो गयी है।
-भौतिक और आध्यात्मिक सिद्घांत में बड़ा अंतर है। दोनों परस्पर विरोधी हैं।
-जीवन-संग्राम धीरे-धीरे कम हो जाएगा। परंतु यह तब तक नष्ट न होगा जब तक भौतिक उन्नति का नाश न हो जाए और आध्यात्मिक जीवन फिर से आरंभ न हो।
-जिसे पुन: ईश्वर प्राप्ति पर विश्वास होता है वह भौतिक उन्नति के तंग मार्ग से निकलकर परमेश्वर के मार्ग में आता है। यही सच्चा विज्ञान है ऐसा करने से उसमें पुनर्जीवन तथा बल की वृद्घि होती है और उसका मोक्ष हो जाता है। इसलिए लौटो-लौटो नेचर की ओर लौटो। नीचे लिखे व्यवहारों से बर्तो तभी परमेश्वर तुम पर प्रसन्न होगा और बिगड़ा काम बन जाएगा।
दुखों से छूटने के उपाय
-मनुष्य फलाहारी है। मेवा और फल उसके लिए महान लाभकारी हैं। उसके पचाने वाले यंत्रों की बनावट फल पचाने के ही लिए है। फलाहार से ताजगी और ताकत मिलती है। दूध, दही और मक्खन खाना उत्तम है।
-यदि लोग फलों के लिए फलोत्पन्न करने वाले बगीचे लगाने शुरू कर दें, तो परिश्रम करने के लिए उत्तम फल हाथ लग जाए और बहुत सी जमीन अधिक फलोत्पन्न करने के लिए निकल आवे। शराब और तंबाकू उत्पन्न करने के लिए व्यर्थ ही जमीन का बहुत सा भाग रोका गया है। इसी तरह अन्य बहुत से अनावश्यक पदार्थ भी उत्पन्न, करके जमीन रोकी गयी है।
बगीचों से तथा उनमें काम करने से तंदुरूस्ती और आनंद मिलता है। शुद्घ वायु दृश्य पशु पक्षियों के बिहार से मन प्रसन्न होता है। अनेक प्रकार की अन्य कसरतों से बगीचे का श्रम करना ही लाभदायक है।
-यद्यपि हम हमेशा नंगे नही रह सकते, तो भी शरीर का बड़ा भाग खुला रह सकता है। खुले पैर बिना जूता पहने घर में और बाहर फिरना बहुत ही लाभकारी है। स्त्री और पुरूष दोनों को चाहिए कि नंगे सिर घूमने की आदत डालें।
क्रमश:

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