वैदिक संपत्ति 278 – वेदमंत्रों के उपदेश

वैदिक सम्पत्ति

(ये लेखमाला हम पं. रघुनंदन शर्मा जी की ‘वैदिक सम्पत्ति’ नामक पुस्तक के आधार पर सुधि पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहें हैं )

प्रस्तुतिः देवेन्द्र सिंह आर्य
(चेयरमैन ‘उगता भारत’)

खेत, खाद, खदान और यंत्र

गत पृष्ठों में वर्तमान सम्पत्ति की आवश्यकता पर विचार करने से ज्ञात हुआ कि मनुष्यजाति को इस प्रकार की सम्पत्ति की आवश्यकता नहीं है। अब देखना चाहते हैं कि क्या उस सम्पत्ति का स्वरूप सही है ? वर्तमान सम्पत्ति का स्वरूप वर्णन करते हुए अर्थशास्त्रियों ने पृथिवी, श्रम और पूंजी को सम्पत्ति का स्वरूप माना है। पृथिवी में खदान और खेत प्रधान हैं तथा श्रम और पूजी में यन्त्र और खाद प्रधान हैं। वैज्ञानिक खाद डालकर और यन्त्रों से जीत कर खेतों से अन्न, रुई, तेल और फल आदि उत्पन्न किये जाते हैं और फिर यन्त्रों के ही सहारे उनसे नाना प्रकार के अन्य पदार्थ तैयार होते हैं। इसी तरह खदानों से खनिज पदार्थों को निकाल कर यन्त्रों के द्वारा ही नाना प्रकार के पदार्थ तैयार किये जाते हैं और यन्त्रों से ही इधर उधर भेजे जाते हैं। इसीलिए सम्पत्ति के उपर्युक्त चार विमाग वेत, खाद, खदान और यन्त्र ही सम्पति का स्वरूप समझे जाते हैं। हम यहाँ क्रम से इन चारों स्वरूपों की आलोचना करते हैं।

हम मनुष्य के आहारप्रकरण में लिख आये हैं कि मनुष्य की असली खूराक फल, फूल और दूध दधि है। ये पदार्थ पशुओं और फलदार दरख्तों तथा फलदार बेलों से उत्पन्न होते हैं। इसलिए मनुष्य को इन्हीं की खेती करना चाहिये, अन्न की नहीं। अन्न की खेती से जंगलों, वाटिकाओं और बाड़ियों का नाश हो जाता है और पशुओं के चरागाह कम हो जाते हैं जिससे दूध और घी में कमी हो जाती है। इसके अतिरिक्त जंगलों, वाटिकाओं और चरागाहों के नष्ट होने से अवर्षण भी हो जाता है और नाना प्रकार की बीमारियाँ भी पैदा हो जाती हैं। इसलिए खेती करना अर्थात् अन्न के लिए जमीन का अधिक भाग रोकना सृष्टिनियम के विरुद्ध है। किन्तु वाटिका लगाना, चरागाह बनाना और जंगल बढ़ाना सृष्टिनियम के अनुकूल है। जंगलों में मनुष्यों के खाने के लिये फल मिलते हैं वहाँ अन्न भी उत्पन्न होता है। आरम्भ में समस्त अन्न जंगलों में ही उत्पन्न होते थे और अब भी अनेक देशों में कई प्रकार के अन्न जंगलों में ही घास की तरह उत्पन्न होते हैं। इसलिए केवल जंगलों की वृद्धि से ही फल फूल, दूध घी और अनेक प्रकार के अन्नों की प्राप्ति हो सकती है। किन्तु खेत अकेला अन्न ही देते हैं, शेष फल फूल, घी दूध, वर्षा और आरोग्य का नाश कर देते हैं। इसलिये खेती करना उचित नहीं है। मनु भगवान् स्पष्ट शब्दों से मना करते है कि ‘ हिंसाप्रायों पराधीनां कृषि यत्नेन वर्जयेत्’ इस हिंसामय दैवाधीन खेती को कभी न करना चाहिये ।

जब खेती ही सृष्टिनियम के विरुद्ध है तब खेतों में अपवित्र और रासायनिक खाद का डालना कब अनुकूल हो सकता है ? हाँ जंगलों में और बाग बगीचों में जो स्वाभाविक खाद पत्तों और पशुश्रों के गोबर मूत्र से बनकर पहुँचता है वही वृक्षों के लिए हितकर होता है। किन्तु जो खाद मनुष्यों के पेशाब पैखाना और मछली आदि से तैयार किया जाता है वह बड़ा ही हानिकारक होता है। मलिन खाद से खाद्य पदार्थों का असली गुण नष्ट हो जाता है। अमेरिका से निकलनेवाले ‘मेफ्लावर’ नामक अखबार में एक लम्बा लेख छपा है जिसमें वैज्ञानिक रीति से सिद्ध किया गया है कि कृत्रिम और मलिन खाद अन्न को दूषित कर देता है और वह दूषित अन्न खानेवाले को हानि पहुँचाता है। मलिन खाद से उत्पन्न हुआ अन्न योरपनिवासी भी पसन्द नहीं करते। इसीलिये मनु भगवान् कहते हैं कि ‘ अमेध्यप्रभवाणि च’ अर्थात् अपवित्र स्थानों में उत्पन्न होनेवाले अन्न न खाना चाहिये। तात्पर्य यह कि इस सम्पत्तिशास्त्र में जिस प्रकार की खाद का महत्व बतलाया गया है वह भी अस्वाभाविक है।

खेत और खाद के बाद खदान और यन्त्रों का नम्बर है। खदान और यन्त्रों का प्रश्न बड़ा भयङ्कर है। खदानों में परमात्मा ने न मालूम किस उपयोग के लिये खनिज पदार्थों को सुरक्षित रक्खा है। परन्तु आजकल सम्पत्तिशास्त्रो उस घरोहर को निकला निकलाकर इधर का उधर कर रहे हैं। कौन जानता है कि ये खनिज पदार्थ पृथिवी में भीतर ही भीतर क्या असर कर रहे हैं और निकल जाने पर क्या असर होगा ? बिना समझे बुझे, बिना किसी प्रमाण और दलील के मनुष्य को क्या अधिकार है कि वह इन पदार्थों में हाथ लगावे ? हम देखते हैं कि करोड़ों मन कोयला खदानों से निकाला जा रहा है। लोग कहते हैं कि कोयले में प्राणनाशक वायु अधिक होती है जो वृक्षों की खुराक है। किन्तु वृक्षों को कोयले से मिला हुआ जो रस या वायु मिलती थी वह कोयला निकल आने से अब नहीं मिलती। ऐसी दशा में सम्भव है कि वृक्षों के फलों में और धन्नों के गुणों में कमी हुई हो। आज जो सैकड़ों बीमारियों फैल रही हैं सम्भव है कि वे इसी उपद्रव का फल हों। कहने का मतलब यह कि जिस बात को हम जानते ही नहीं और न त्रिकाल में कभी जान ही सकते हैं उस बात में हाथ डालना धोर प्रकृति के रक्षित पदार्थों को निकालकर नष्ट करना कहाँ की बुद्धिमत्ता है ? सोना, चाँदी, हीरा, पन्ना, मैनसिल, हरताल और पारा आदि को सभी लोग जानते हैं कि इनमें स्वास्थ्यसम्बन्धी बड़ा से बड़ा असर मौजूद है। ऐसी हालत में हम कैसे मान लें कि उनकी टालटूल से सृष्टि में महान् परिवर्तन न हुआ होगा ? हमें तो विश्वास है कि ये हर वर्ष के अवर्षण, बीमारी और बड़े बड़े क्रूर स्वभाव वाले कार्य सृष्टि में सब इन्हीं पदार्थों के फेरफार- टालटूल से होते हैं। इसके सिवा खदानों से निकले हुए अपरिमित सोना, चाँदी, हीरा, मोती आदि पदार्थों ने संसार में बेहद असमानता पैदा कर दी है जिससे कोई बेहद धनी और कोई बेहद गरीब कहलाने लगा है।

इसलिए ऐसे निरर्थक पदार्थों को कीमती बनाकर लोगों की रुचि उसी तरफ लगाना क्या कोई कम पाप की बात है ? एक व्यक्ति जिसको सोने, चाँदी आदि के आभूषणों को पहिने ने का कभी ध्यान भी नहीं था उसे सोना, चाँदी और हीरा मोती दिखलाकर उस ओर लालायित करना क्या कम अत्याचार है? आज संसार में जो आभूषणसम्बन्धी काल्प निक दुःख से मनुष्य दुःखी हो रहे हैं, आज जो संसार में हाय हाय मची है कि हमारे कण्ठा नहीं, हमारे जड़ाऊ चेन नहीं और हमारे अगूंठी नहीं, यह क्या कम शोक की बात है? जिन मनुष्यों ने इन व्यर्थ पदार्थों को कीमती बनाकर सादे सीधे मनुष्यों को इस कल्पना के दुःख में फंसाया है क्या उन्होंने कम पाप किया है? हम तो दावे से कहते हैं कि जिन्होंने पहिले और इस समय ऐसे पदार्थों का रिवाज पैदा करके मनुष्यों को उस ओर प्रवृत किया है वे मनुष्पजाति के ही नहीं प्रत्युत प्राणिमात्र के शत्रु हैं। इसलिए खेती और खदान दोनों ही व्यर्थ हैं और मनुष्यसमाज में पाप के बढ़ानेवाले हैं ।

क्रमशः

Comment:

Latest Posts

hititbet giriş
hititbet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
hititbet giriş
hititbet güncel giriş
hititbet giriş
vdcasino giriş
vdcasino güncel giriş
vdcasino giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
hitit medya
Hititbet Giriş
Hititbet Giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
tuzla cilt bakım merkezi
Tuzla İpek Kirpik
Hititbet
hititbet güncel adres
hititbet 2026
hititbet giriş
hititbet giriş
Tuzla Cilt Bakım
Tuzla Cilt Bakım Merkezi
Tuzla İpek Kirpik
solobet giriş
hititbet giriş
kralbet
otobet giriş
xslot giriş
otobet giriş
otobet giriş
otobet giriş
betyap giriş
betyap giriş
maksibet giriş
maksibet giriş
maksibet giriş
maksibet giriş
maksibet giriş
maksibet giriş
betnano
betnano
betnano
kralbet
kralbet
kralbet
setrabet
setrabet
kralbet
betpark giriş
hititbet
hititbet
Tuzla Cilt Bakım
İstanbul Cilt Bakım
Tuzla Cilt Bakım Merkezi
Tuzla İpek Kirpik
Hititbet Giriş
Hititbet Giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
Tuzla Cilt Bakım
Tuzla İpek Kirpik
Tuzla Lenf Drenaj
Kolaybet Giriş
Betgaranti Giriş
xslot giriş
xslot giriş
xslot
xslot
hititbet