अटल बिहारी वाजपेई की विरासत संभालने वाला ‘लाल’ खुद ही विरासत बन गया

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– मुरली मनोहर श्रीवास्तव

जिंदगी एक सफर है, सफर करते करते एक दिन राहगीर भी थक जाता है मगर राहें कभी नहीं थकती। इस जहां में इंसानरुपी मुसाफिर आते हैं अपने जीवन के किरदार को दुनिया के रंगमंच पर निभाकर कूच कर जाते हैं। रह जाती हैं तो बस उनकी यादें और उनकी कृतियां। उन्हीं में से एक थे मध्य प्रदेश के राज्यपाल लाल जी टंडन। 12 वर्ष की उम्र में संघ से जुड़ने वाले टंडन आगे चलकर अटल बिहारी वाजपेयी की विरासत को संभालने लगे थे। मगर आज उस विरासत को संभालने वाला ‘लाल’ खुद ही एक विरासत बन गय़ा।

अपनी पुस्तक `अनकहा लखनऊ’ में उन्होंने अपने हर पहलुओं को विस्तार से लिखा है। लखनऊ के चौंक गांव के रहने वाले लालजी टंडन को देखने से लखनवी अंदाज और संघी विचारधारा की संगम का एहसास होता रहा। कभी वैमनस्य वाली बातों से इत्तेफाक नहीं रखने वाले टंडन जी एक बार अपने जन्मदिन पर साड़ी बांट रहे थे उसी दौरान एक दर्जन महिलाओं का भगदड़ की वजह से मौत हो गई थी, जिसे राजनीतिक गलियारे में किरकिरी मच गई थी। संघ के संघर्ष के दौर के एक कार्यकर्ता टंडन का वर्, 1960 में राजनीति में पदार्पण हुआ। उस समय से लेकर वर्ष 2020 यानि 60 वर्षों तक राजनीतिक पटल पर विराजमन रहकर अपनी उपस्थिति दर्ज कराते रहे।
मुझे याद है जब बिहार के राज्यपाल बनकर आए थे तो उस वक्त एक बड़ा परिवर्तन की रेखा को खींच दिया था। आने के साथ ही अपनी कार्यशैली से सबके जेहन में अपनी बड़ी लाइन खींच दिया था इन्होंने। अपने जीवन के हर पड़ाव पर नई इबारत लिखने वाले इस राजनीतिक योद्धा को उत्तर प्रदेश में पहली बार भाजपा की सरकार बनवाने का भी श्रेय दिया जाता है। संघ की परिपाटी- ‘जहां कम वहां हम’ के कायदे को आत्मसात कर कदम दर कदम आगे बढ़ते रहने वाले लालजी टंडन के जिंदगी का सफर हमेशा सुर्खियों में रहा है। मध्य प्रदेश के राज्यपाल और भारतीय जनता पार्टी के नेता लालजी टंडन का 85 वर्ष की आयु में 21 जुलाई 2020 को लखनऊ में हम से हमेशा-हमेशा के लिए विदा हो गए। 26 फरवरी 1958 को कृष्णा टंडन से परिणय सूत्र में बंधने वाले टंडन जी के तीन पुत्रों में आशुतोष टंडन वर्तमान में उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री हैं।
12 अप्रैल 1935 को चौक गांव, लखनऊ में शिवनारायण टंडन और अन्नपूर्णा देवी के घर जनमें लालजी टंडन ने कालीचरण डिग्री कॉलेज से स्नातक किया। इसके बाद राजनीतिक गलियारे में अपने कदम रख दिया। हलांकि संघ के सेवक ने जब अपने कदम दलगत राजनीति में रखी तो अपनी वाकपटूता के बूते इतिहास कायम कर दिया। इनके राजनीतिक सफर की बात करें तो लालजी टंडन दो बार (1978-84 तक) उत्तर प्रदेश विधान परिषद (विधान परिषद) के सदस्य रहे और 1990-96 तक परिषद के सदन के नेता बने रहे। वर्ष 1996 से लेकर 2009 तक उत्तर प्रदेश विधान सभा के लिए भी चुने गए और 2003–07 के बीच विधान सभा में विपक्ष के नेता भी रहे थे। कई अहम मंत्रालयों को उत्तर प्रदेश में संभालने वाले लालजी टंडन, मायावती (बसपा-भाजपा गठबंधन) के शासनकाल में उत्तर प्रदेश मंत्रिमंडल में शहरी विकास मंत्री भी रहे थे। हालाँकि इसके पहले भी वे कल्याण सिंह मंत्रिमंडल में भी मंत्री रह चुके थे।
मई 2009 में, वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की रीता बहुगुणा जोशी को 40,000 वोटों के अंतर से हराकर लखनऊ से 15वीं लोकसभा के लिए चुने गए थे। यह सीट 1991 के पूर्व भाजपा अध्यक्ष अटल बिहारी वाजपेयी के पास लगातार चार बार से थी। 20 जुलाई 2019 को टंडन को आनंदीबेन पटेल की जगह मध्य प्रदेश के 22 वें राज्यपाल के रूप में नियुक्त किया गया था और अब उनके देहांत के बाद आनंदीबेन पटेल को मध्य प्रदेश के राज्यपाल का कार्यभार फिर सौंप दिया गया था। तब किसे पता था कि जिस कार्यभार को सौंपी गई है वो फिर कभी वापस राज्यपाल भवन नहीं लौटेंगे, मगर ऐसा ही और उनके जीवन की सफर कई अहम किरदारों के साथ आखिरकार परम सत्य के साथ नश्वर शरीर पंचत्तव में विलिन हो गया।

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