1961 में ही स्पष्ट कर दिया था सावरकर जी ने , हमारा गणतंत्र हमारे क्रांतिकारी आंदोलन की देन है : रंजीत सावरकर

हिंदू महासभा के प्रेरणा स्त्रोत और स्वतंत्रता आंदोलन के महानायक क्रांति वीर सावरकर जी के पौत्र रंजीत सावरकर का कहना है कि गांधीजी की अहिंसा को लेकर कांग्रेस ने देश में यह भ्रम फैलाने का काम किया है कि देश को स्वतंत्र कराने में और इसके शासन को गणतंत्र का स्वरूप देने में केवल कांग्रेस का ही योगदान रहा है । उन्होंने कहा कि इस पर 1961 ई. में वीर सावरकर जी ने एक लेख लिखा-‘क्या स्वराज्य का श्रेय केवल कांग्रेस को ही है’? उसमें वह लिखते हैं :-

‘‘अपनी पाठ्य पुस्तकों द्वारा सरकार विद्यार्थियों को सिखाती है कि गांधीजी की कांग्रेस ने भारत का शासन अंग्रेजों के हाथों से नि:शस्त्र क्रांति द्वारा लिया। किंतु असल में हुआ यह कि हमारे क्रांतिकारियों की प्रेरणा से हमारी शक्तिशाली सेना ने जब तलवार म्यान से निकालकर भारत की स्वतंत्रता के उद्देश्य से अंग्रेजों पर वार करना आरंभ किया और साथ ही अपने दूसरे साथियों को भी इसके लिए उकसाने लगे तो अंग्रेज घबरा गये और उन्होंने स्वतंत्रता प्रदान करने की बात आरंभ कर दी। यह ऐतिहासिक तथ्य स्वयं ब्रिटिश प्रधानमंत्री ने भरी पार्लियामेंट में स्वीकार किया है।

इधर 1954 ई. में अगस्त माह में एक प्रसिद्घ जापानी ग्रंथ कार श्री जे.जी. आहसावा ने ‘दि टू ग्रेट इंडियंस इन जापान’ नामक पुस्तक प्रकाशित की है। जिसमें उन्होंने रास बिहारी बोस का चरित्र चित्रण करते हुए उनके जापान में दिये गये अभूतपूर्व क्रांतिकारी कार्यों का वर्णन किया है।

दूसरे महायुद्घ के अवसर पर जब जापानी सेना ने सिंगापुर पर चढ़ाई की और अंग्रेज एवं अंग्रेजों की भारतीय सेना से उनका युद्घ छिड़ गया तब सेनापति रास बिहारी बोस की आजाद हिंद सेना अंग्रेजी सेना से लड़ी थी। स्वतंत्रता के लिए लड़े पचास हजार सैनिकों में से करीब 25 हजार खेत रहे।

श्री रंजीत सावरकर का कहना है कि इस प्रसंग में उक्त पुस्तक में स्पष्ट लिखा है कि कैसे सिंगापुर में जापान के खिलाफ लडऩे वाली ब्रिटिश सेना के भारतीय सिपाही और अफसर रास बिहारी बोस के स्फूर्तिजन्य वक्तव्य के पश्चात आईएनए में हजारों की संख्या में सम्मिलित हो गये थे। दि इंडिपेंडेंस ऑफ इंडिया एक्ट पास करते समय तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री सर क्लीमेंट एटली ने जो कुछ कहा था उस पर हम गंभीरता से विचार करें।

जब ब्रिटिश संसद में यह बिल प्रस्तुत हुआ तब हिंदुस्तान पर अपने साम्राज्य को हटाने की बात से दुखी होकर साम्राज्यवादी सर विसेंट चर्चिल ने पूछा-‘‘क्या यह ऐक्ट पास कर लेने की अपेक्षा दूसरा कोई मार्ग नही जिसमें भारतवर्ष को स्वतंत्र न करके अपने अधीन ही रखा जा सके।’’ इसका उत्तर प्रधानमंत्री ने दो तीन वाक्यों में इस प्रकार दिया-‘‘भारतवर्ष को स्वतंत्रता देने का कारण है कि वहां की सेना अब अंग्रेजों के प्रति केवल रोटी के लिए वफादार नही रही और ब्रिटेन के पास अब उतनी शक्ति भी नही रही कि हिंदुस्तानी सेना को दबाये रखा जा सके।’’

न तो ब्रिटेन के प्रधानमंत्री एटली ने ही और न ही किसी संसद सदस्य ने यह कहा कि अहिंसा के तत्वों से हमारा हृदय परिवर्तन हो गया है।

किसी भी व्यक्ति ने या संसद ने भारत स्वतंत्रता अधिनियम को पारित कराते समय साम्राज्यवाद एक अन्याय है और औपनिवेशिक व्यवस्था को विश्व से समाप्त किया ही जाना चाहिए, ऐसा कोई शब्द नही बोला। इसका अभिप्राय था कि उस दिन भी वे लोग साम्राज्यवाद और औपनिवेशिक व्यवस्था के समर्थक थे पर किसी विवशता के कारण उन्हें भारत को स्वतंत्र करना पड़ रहा था। वह ना तो गांधीजी और ना ही किसी अहिंसात्मक गांधीवाद से तनिक भी विचलित थे और ना ही उसके कारण भारत को स्वतंत्र कराना चाहते थे। 1857 से लेकर 1947 तक के 90 वर्षों में वह भारत के क्रांतिकारी आंदोलन की लपटों को बुझाते-2 दुखी हो चुके थे।….और अब जब इन लपटों को और भी बलवती करने के लिए भारतीय सेना भी अपने देशवासियों के साथ आ खड़ी हुई तो उनके लिए देश को स्वतंत्र करना ही एकमात्र उपाय रह गया था।

सावरकर जी के पौत्र ने ‘उगता भारत’ को बताया कि सावरकर जी ने गांधीजी की अहिंसा पर करारा प्रहार करते हुए कहा था कि-‘‘सज्जनों के साथ सज्जनता से व्यवहार करना पुण्यकारक है। लेकिन जो अपने देश पर आक्रमण करने के लिए आता है उसको शस्त्र से कड़ा उत्तर देने में हिंदू संस्कृति पाप नही बताती, पुण्य बताती है। गांधीजी कहते हैं-हम किसी से द्वेष नही करेंगे तो हिंसा करने की आवश्यकता ही नही रहेगी।’’ उन्होंने कहा कि इस प्रकार सावरकर माने एक सिद्धांत है , सावरकर माने एक नीति है , सावरकर माने एक तर्क है , सावरकर माने एक अतीत का स्वर्णिम पृष्ठ और भविष्य की उज्जवल आशा है । जिसे वर्तमान नेतृत्व को अपनाकर राष्ट्र की समस्याओं का समाधान करना चाहिए।

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