वैदिक सम्पत्ति -269 चतुर्थ खंड वेदों की शिक्षा

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यह लेख माला हम पंडित रघुनंदन शर्मा जी की वैदिक सम्पत्ति नामक पुस्तक के आधार पर सुधि पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं।

प्रस्तुति देवेंद्र सिंह आर्य
चैयरमेन – ‘उगता भारत’

क्योंकि श्रृङ्गार का स्थायीभाव रति है। ‘रस-गङ्गाधर’ नामी ग्रन्थ में पण्डितराज जग जगन्नाथ लिखते हैं कि-

शृङ्गारी करुणः शान्तो रौद्रो वीरोऽजू तस्तथा ।
हास्यो भयानकश्रच्वै व बीभत्सतिश्रवेति नव ।।
रतिः शोकव्श्र निर्वेदः क्रोधोत्साहव्श्र विस्मयः ।
हासो भयं जुगुप्सा च स्थायीभावः कमादमी ।।

अर्थात् श्रृङ्गार, करुण, शान्त, रौद्र, वीर, अद्भुत, हास्य, भयानक और बीभत्स ये नौ रस हैं। इनमें श्रृङ्गार का रति, करुणा का शोक, शान्त का निर्वेद, रौद्र का क्रोध, वीर का उत्साह, अद्भुत का विस्मय, हास्य का हंसी, भयानक का भय और बीभत्स का घृणा स्थायीभाव है। यहाँ श्रृङ्गार का स्थायीभाव रति माना गया है। बनाव चुनाव और शोभा श्रृङ्गार का परिणाम रति ही है। साहित्यदर्पण में लिखा है कि-

राज्ये सारं वसुधा वसुधायामपि पुरं पुरे सौधम् ।
सौधे तल्पं तल्पे वराङ्गनाङ्गसर्वस्वम् ।।

अर्थात् राज्य का सार पृथिवी है, पृथिवी का सार नगर है, नगर का सार महल है, महल का सार पलङ्ग है और पलङ्ग का सर्वस्व स्त्री के अङ्ग हैं। यहाँ स्पष्ट कर दिया गया है कि एक श्रृङ्गारप्रिय की मनोभावना किस प्रकार रति में समाप्त होती है। इसी प्रकार काम चेष्टा के उत्पन्न करनेवाले श्रृङ्गारों का वर्णन करते हुए चरकाचार्य कहते हैं कि-

अभ्यङ्गोत्सादनस्नानगन्धमाल्यविभूषणैः ।
गृहशय्यासनसुखैर्थासोभिरहतैः प्रियैः ।।

विहङ्गानां रुतैरिष्टः स्त्रीणाञ्चाभरणस्वनैः ।
संवाहनैर्वरस्त्रीणामिष्टानाञ्च वृषायते ।।

अर्थात् तैल, उबटन, स्नान, इत्र, माला, आभूषण, अट्टालिका, रंगमहल, शय्या, पोशाक, बाग, पक्षियों का कल-रव, स्त्रियों के आभूषणों की झनकार और स्त्रियों से हाथ पैर मलबाना आदि समस्त कामचेष्ठा के उत्पन्न करनेवाले सामान हैं, अतः इस प्रकार के श्रृङ्गारमय पदार्थों से निर्वीर्य भी कामातुर हो जाता है। इस वर्णन से स्पष्ट हो गया कि श्रृङ्गार मनुष्य को कामी बनाकर रतिप्रिय बना देता है। पञ्चतन्त्र में विष्णु शर्मा ने ठीक ही कहा है कि-

निःस्पृहो नाधिकारी स्यान्नाकामी मण्डनप्रियः ।
नाविदग्धः प्रियं ब्रूयात्स्फुटवक्ता न वञ्चरुः ।।

अर्थात् निःस्पृह मनुष्य अधिकारी नहीं होता, बनाव चुनाव और शोभा श्वङ्गारप्रिय मनुष्य अकामी नहीं होता, मूर्ख कभी प्रिय बोलनेवाला नहीं होता और स्पष्ट बोलनेवाला कभी ठग नहीं होता। सत्य है, श्रृङ्गारप्रिय छैल गुन्ड़ा कभी अकामी हो ही नहीं सकता । उसे निश्चय ही कामी होना चाहिये। वह बनाव चुनाव करता ही इसलिए है कि उसे रति प्राप्त हो। यह बात हम संसार के अनुभव से भी कह सकते हैं कि श्रृङ्गार रति के ही लिए किया जाता है। क्योंकि हम देखते हैं कि रत्ति के पश्चात् तो श्रृङ्गारभङ्ग हो जाता है। इस भङ्ग श्रृङ्गार पर खण्डिताओं ने न जाने कितने व्यङ्ग कहे हैं जो श्रृङ्गाररस के ज्ञाताओं से छिपे नही हैं। कहने का मतलब यह कि ठाट बाट, शोभा श्रृङ्गार और विलास तथा आमोद प्रमोद से कामुकता बढ़ती है और उस कामुकता से श्रृङ्गार की और भी उन्नति होती है और दूने परिमाण से कामुकता का विस्तार होता है। फल यह होता है कि अमर्यादित सन्तति से संसार भर जाता है और भूख, दुष्काल आदि से संसार के प्राणी अकाल ही में मरने लगते हैं।

क्रमशः

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