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इतिहास के पन्नों से विश्वगुरू के रूप में भारत

प्राचीन भारत में होते थे गांव पूर्ण आत्मनिर्भर और एक स्वाधीन संस्था

राजशेखर व्यास भारतर्वा में ग्राम सभा का विकास बहुत पुराने जमाने में हो गया था। देश के अधिकांश भाग पर यही सभा अपना वर्चस्व रखती थी। इसकी शासन पद्धति बड़ी सुव्यवस्थित थी। वेद, ब्राह्मण और उपनिाद काल में गा्रम-सभा, उसके प्रमुख और अधिठाता का सम्मानपूर्वक उल्लेख है। ग्रामाध्यक्ष को वैदिक काल में ग्रामजी कहा जाता […]

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इतिहास के पन्नों से विश्वगुरू के रूप में भारत

भारतीय धातु परंपरा और लोक कल्याण की भावना

    आर.के.त्रिवेदी विश्व के कल्याण का भाव लेकर ही भारत में धातुकर्म विकसित हुआ था। धातुकर्म के कारण ही भारत में बड़ी संख्या में विभिन्न धातुओं के बर्तन बना करते थे जो पूरी दुनिया में निर्यात किए जाते थे। धातुकर्म विशेषकर लोहे पर भारत में काफी काम हुआ था। उस परम्परा के अवशेष आज […]

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इतिहास के पन्नों से विश्वगुरू के रूप में भारत

खेल खेल में ही सिखा दी जाती थी भारतीय परंपरा में युद्ध की विधाएं

  आनंद कुमार सन 1850 के दौर में जब अंग्रेजों को भयानक भारतीय प्रतिरोध का सामना करना पड़ा तो धीरे से उन्होंने एक आर्म्स एक्ट लागु कर दिया। इसका उन्हें फायदा ये हुआ कि भारतीय हथियार रखेंगे नहीं तो यहाँ कि शास्त्रों की परंपरा जाती रहेगी। फिर एक प्रशिक्षित सिपाही भी बिना प्रशिक्षण वाली सौ-दो […]

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आयुर्वेद में शल्य चिकित्सा के स्पष्ट प्रमाण मिलते हैं

मनोज ज्वाला     भारत के पुनरुत्थान की ओर सरकार के बढते कदम खबर है कि भारत सरकार अब स्वास्थ्य-चिकित्सा विषयक उच्च-शिक्षा  को युरोपियन मेडिकल साइंस की गिरफ्त से मुक्त करने और प्राचीन भारतीय ज्ञान-विज्ञान के विस्तार का मार्ग प्रशस्त करने की दिशा में भी एक बहुत बडा कदम उठा चुकी है । देश में […]

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भारत का गौरवपूर्ण अतीत : वेदों में वर्णित जल और नौका विज्ञान

  कृपाशंकर सिंह ऋग्वेद मे कुएँ का उल्लेख अनेक ऋचाओं में हुआ है। इससे पता चलता है कि ऋग्वेदिक काल में सिंचाई के साधनों में कुआँ का उपयोग भी होता रहा होगा। इसकी प्रप्ति कई़ ऋचायों मे चरस का नाम आने से भी होती है। सम्भवतः पीने के लिये भी कुएँ के पानी का उपयोग […]

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विश्वगुरू के रूप में भारत

संसार के पहले समुद्र यात्री महर्षि अगस्त्य

  महावीर प्रसाद द्विवेदी (लेखक सुप्रसिद्ध हिंदी साहित्यकार हैं।) कूपमण्डूकता बड़ी ही अनिष्टकारिणी क्या एक प्रकार से, विनाशकारिणी होती है। मनुष्य यदि अपने ही घर, ग्राम या नगर में आमरण पड़ा रहे तो उसकी बुद्धि का विकास नहीं होता, उसके ज्ञान की वृद्धि नही होती, उसकी दृष्टि को दूरगामिनी गति नहीं प्राप्त होती। देश—विदेश जाने, […]

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विश्वगुरू के रूप में भारत

सभ्यता की शक्ति में ही बसती है भारत की आत्मा

  भारत के राजनेताओं का यह कत्र्तव्य है कि वे चुनाव से पहले मतदाताओं को अर्थात् राष्ट्र को यह बतलाएँ कि उनकी दृष्टि में भारत का बल क्या है और भारत की निर्बलता या कमजोरी क्या है? साथ ही बल को बढ़ाने के लिए और कमजोरी को खत्म करने के लिए कौन से प्रभावकारी और […]

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विश्वगुरू के रूप में भारत

भारतीय विज्ञान की पहुंच वर्तमान विज्ञान से कम नहीं

गुरूदत्त विज्ञान और विज्ञान से हमारा अभिप्राय है भारतीय विज्ञान और पाश्चात्य विज्ञान। इसका अर्थ प्राचीन विज्ञान और अर्वाचीन विज्ञान भी है। क्या प्राचीन काल में भी किसी प्रकार का विज्ञान था? अन्य देशों की बात तो हम नहीं जानते, किन्तु भारतवर्ष में विज्ञान नाम प्रचलित था और उसमें बहुत उन्नति भी हुई थी। भगवद्गीता […]

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विश्वगुरू के रूप में भारत

अध्यात्म ही नहीं, विज्ञान की भी भाषा है संस्कृत

श्रीश देवपुजारी (लेखक संस्कृत भारती के प्रचार प्रमुख हैं।) केन्द्रीय विद्यालयों में संस्कृत तथा अन्यान्य भारतीय क्षेत्रीय भाषाओं की जगह पर जर्मन का पढ़ाया जाना असंवैधानिक ही नहीं अपितु भारत की स्वतन्त्र चेतना के भी विरुद्ध कदम है। चूँकि इस निर्णय से सर्वाधिक दुष्प्रभाव संस्कृत पर पड़ रहा था और इसे पुन: संशोधित करने से […]

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विश्वगुरू के रूप में भारत

चरक संहिता अौर आधुनिक विज्ञान

डॉ. दीप नारायण पाण्डेय (लेखक आयुर्वेद के जानकार और पूर्व आईएएस अधिकारी हैं।) सोशल मीडिया में स्वयंभू विशेषज्ञों का बहुत बड़ा जमावड़ा लगा रहता है। आयुर्वेद भी इससे अछूता नहीं है। इन्टरनेट में आयुर्वेद के एक्सपट्र्स और उनके नुस्खों का बोलबाला है। जन-सामान्य भी इन्टरनेट में खोजबीन कर इसी ज्ञान से अपना काम चलाने की […]

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