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विश्वगुरू के रूप में भारत

अध्यात्म ही नहीं, विज्ञान की भी भाषा है संस्कृत

श्रीश देवपुजारी

(लेखक संस्कृत भारती के प्रचार प्रमुख हैं।)

केन्द्रीय विद्यालयों में संस्कृत तथा अन्यान्य भारतीय क्षेत्रीय भाषाओं की जगह पर जर्मन का पढ़ाया जाना असंवैधानिक ही नहीं अपितु भारत की स्वतन्त्र चेतना के भी विरुद्ध कदम है। चूँकि इस निर्णय से सर्वाधिक दुष्प्रभाव संस्कृत पर पड़ रहा था और इसे पुन: संशोधित करने से संस्कृत को लाभ होगा अत: सरकार द्वारा उपर्युक्त निर्णय को बरतरफ़ करने को कुछ लोगों द्वारा राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ अथवा भाजपा का छापा एजेंडा मानकर विरोध किया जा रहा है। वस्तुत: ऐसे विचार वालों को डर है कि संस्कृत का प्रचार कहीं उग्र राष्ट्रवाद अथवा साम्प्रदायिकता को बढ़ावा देने वाला न हो जाये। अथवा वर्तमान सरकार इसका अनुचित लाभ न उठाने लग जाये। वस्तुत: इस प्रकार की आशङ्काओं का कोई आधार नहीं है। अगर हम संस्कृत के द्वारा पोषित भारतीय परम्पराओं का अवलोकन करें तो हमें ज्ञात होगा कि संस्कृत ने कभी भी किसी एक स्वर को एकाङ्गी रूप से बुलन्द नहीं किया तथा उसने कभी भी संकीर्णता को बढ़ावा नहीं दिया। संस्कृत ने जिस भारतीय चरित्र का निर्माण किया वह सर्वसमावेशी, सहिष्णु तथा विज्ञानोन्मुख रहा है। और यही कारण है कि आज भी भारतीय मनोवृत्ति सामान्यत: प्रगतिशील और सहिष्णु है। राजनैतिक तथा अन्य विचित्र कारणों से संस्कृत का भ्रान्तिपूर्ण विरोध करने वाले लोगों ने संस्कृत के विपक्ष में कुछ प्रमाणों को प्रस्तुत किया जो बहुत सारे कारणों से प्रचलित तथा स्थापित हो गये। उनके विषय में वास्तविकता का ज्ञान अत्यन्त आवश्यक है।

पिछले डेढ़-दो सौ वर्ष के शासनकाल में औपनिवेशिक तन्त्र ने हमारे राष्ट्रीय पहचानों को मिटाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। संस्कृत की छवि को धूमिल करने का उनका प्रचार बहुत ही सफल रहा। कहा गया कि संस्कृत तो आमजन की भाषा कभी रही ही नहीं है। जबकि 2500 साल पहले रचित पाणिनि की अष्टाध्यायी से पता चलता है कि संस्कृत उस समय गली, कूचों और बाज़ारों तक की भाषा थी। सामाजिक आवश्यकताओं के चलते उसका मानकीकरण हुआ और वह सम्पूर्ण भारत की योजक भाषा बनी। यह कार्य उसने हज़ारों वर्षों तक किया। उस समय भी जब वह लोक भाषा नहीं रही। विविध संस्कृति तथा भाषा वाले देश को शताब्दियों तक एक आत्मिक सूत्र में बाँधे रखने का श्रेय संस्कृत भाषा को ही है। संस्कृत ने यह कार्य किसी औपनिवेशिक मनोवृत्ति के तहत नहीं किया तथा किसी भी अन्य भारतीय भाषा का अंग्रेज़ी आदि की तरह शोषण करके नहीं किया अपितु संस्कृत का अन्यान्य भाषाओं के साथ हमेशा पोष्य पोषक का भाव रहा। अन्यथा भारतीय भाषाओं के विकास के इतने पहलू हमें दिखायी नहीं पड़ते- पालि-प्राकृत-अपभ्रंश-अवह_ तथा आधुनिक भारतीय भाषायें।

भारतीय भाषाओं के विकास के हर क्रम में संस्कृत ने उनका साथ दिया और उन्हें पुष्ट किया। प्राकृत या अपभ्रंश आदि भाषाओं के व्याकरण को संस्कृत माध्यम से लिखा गया। आज भी प्राकृत का साहित्य संस्कृत अनुवाद से ही पढ़ा जाता है। संस्कृत के भाषाविदों ने जब भी भाषा का विभाजन किया तो संस्कृत तथा प्राकृत दो वर्गों में किया। संस्कृत के काव्यशास्त्रीय ग्रन्थों में जब भी उत्तम काव्य का उदाहरण दिया जाता है तो वह प्राकृत से ही दिया जाता है। संस्कृत के नाटक में लगभग आधे पात्र तो प्राकृत में ही बोलते हैं। द्रविड भाषाओं के साथ भी संस्कृत का सह-अवस्थान उसके साहित्य में विकसित मणि-प्रवाल शैली में देखा जा सकता है जिसमें आधी रचना द्रविड भाषाओं में तथा आधी संस्कृत में होती है। यह भाषिक सह-अस्तित्व की भावना संस्कृत द्वारा पोषित परम्परा में गुँथा हुआ है जिसमें औपनिवेशिक शोषण का कोई गन्ध नहीं रहा है। संस्कृत की अखिल भारतीय लोकप्रियता तथा प्रसार का सबसे बड़ा कारण भी यही है कि उसने क्षेत्रीय भाषाओं के साथ प्रेमपूर्ण भाव रखा।

इस प्रकार संस्कृत ने उस सूत्र की भाँति कार्य किया है जिसने सारे भारत को भावनात्मक तथा आत्मिक रूप से एक तथा अखण्ड रखा। विश्व में इस प्रकार का उदाहरण हमें बहुत ही कम मिलता है। मिस्र की प्राचीन सभ्यता तथा मिस्री भाषा को अरब उपनिवेशवाद ने इस तरह समाप्त किया कि अब उसे जानने वाला वहाँ नहीं है। कहने की आवश्यकता नहीं कि अंग्रेजी आधुनिक युग में यहीं कार्य कर रही है। प्रसिद्ध भाषावैज्ञानिक डेविड क्रिस्टल के अनुसार एक सप्ताह में बहुत सारी भाषाएं दम तोड़ दे रही हैं। संस्कृत ने प्राचीन काल से ही इस प्रवृत्ति का विरोध किया। उसने जो मॉडल सामने रखा वह है- शोषण विहीन बहुभाषिकता। हर भारतीय बहुभाषी होता है- भारतीयों के लिये प्रयुक्त यह कथन संस्कृत के द्वारा पोषित परम्परा का ही प्रतिबिम्बन है। संस्कृत के शास्त्रकारों ने बहुभाषाविद् होने की प्रवृत्ति को हमेशा से प्रोत्साहित किया।

संस्कृत के बारे में प्रचलित अवधारणाओं में से एक अवधारणा यह भी है कि यह एक वर्ग विशेष की भाषा है तथा इसने एक प्रकार की विचारधारा को प्रोत्साहित किया। संस्कृत के प्रति सम्पूर्ण दृष्टि के अभाव ने इस प्रवाद को हवा दी है। अगर हम संस्कृत में लिखी विचार परम्परा का अध्ययन करें तो हमें पता चलेगा कि संस्कृत ने हमेशा विभिन्नता तथा पारस्परिक विरोधी मतों को समान रूप से स्वर दिया है। इसमें अगर वेदों को परम प्रमाण मानने वाला मीमांसा दर्शन यहाँ है तो वेदों को धूर्तों की रचना कहने वाला चार्वाक दर्शन भी यहीं है। छह आस्तिक दर्शनों में से भी केवल तीन ही अपनी दार्शनिक प्रणाली में ईश्वर की आवश्यकता का अनुभव करते हैं। विभिन्न स्मृतियों में परस्पर भिन्न रीति रिवाज तथा धार्मिक नियमों का वर्णन मिलता है। पुराणों का पारस्परिक विरोधी दीखने वाले वर्णन प्रसिद्ध ही हैं। यह उक्ति अत्यन्त ही प्रचलित है – नैको मुनिर्यस्य मतं न भिन्नम् यानी कोई भी ऐसा विद्वान् नहीं है जिसका मत भिन्न नहीं है। भारत में जो अनेकता में एकता है उसका प्रतिबिम्बन संस्कृत में बहुत ही सच्ची रीति से हुआ है। संस्कृत को अखण्डता में देखने से उसका पन्थनिरपेक्ष पहलू प्रकट होकर सामने आता है जो स्वतन्त्र भारत में हमारे संविधान की आत्मा है। अगर संस्कृत द्वारा परिपोषित मुख्य भारतीय विचार धारा की प्रकृति मत-निरपेक्ष न होती तो भारत की स्थिति भी विश्व के बहुत सारे उन देशों की तरह हो जाती जिनके नाम में तो गणतन्त्र या लोकतन्त्र तो लगा है परन्तु उनकी स्थिति घोर साम्प्रदायिक है।

संस्कृत सम्पूर्ण भारत में कनेक्टिंग लैंग्वेज की तरह तथा वैज्ञानिक चर्चाओं की भाषा के रूप में फैली होने के कारण ज्ञान के ग्रहण अथवा प्रसार के लिये एक आवश्यकता की तरह भी थी। प्रारम्भिक बौद्ध दर्शन की भाषा यद्यपि पालि थी परन्तु उसके व्यापक प्रसार तथा बौद्धिक स्वीकृति तो संस्कृत ने ही दिलायी। त्रिपिटकों के अलावा बौद्धों के गम्भीर दार्शनिक ग्रन्थों तथा लोकप्रिय काव्यों को भी संस्कृत ने उसी शिद्दत के साथ सहयोग दिया। जैनों ने भी इसी तरह अर्धमागधी प्राकृत के अलावा संस्कृत से सहायता ली तथा उसे अभूतपूर्व ढंग से समृद्ध किया। इन अवैदिक दर्शनों के मूल स्वरूप के पुनर्निर्माण में संस्कृत का महान् योगदान रहा है। यहाँ तक कि जब मुस्लिम आक्रमणों से त्रस्त पारसी भारत में आये और उन्होंने अपने धर्मग्रन्थों के अनुवाद की बात सोची तो उन्हें 14वीं सदी में भी उन्हें संस्कृत ही ऐसी भाषा प्रतीत हुई जिसमें वह अपनी बात कह सकते थे और जो उनके विचारधारा को ससम्मान अनन्त काल तक सुरक्षित रख सकती थी। और ऐसा बिल्कुल नहीं है कि केवल संस्कृत ने ही इन्हें सहारा दिया, संस्कृत को भी इन परम्पराओं से भरपूर समृद्धि मिली। किसी एकाङ्गी दृष्टिकोण को लेकर चलने वाले किसी माध्यम का इस तरह हजारों वर्षों तक टिक पाना असम्भव है। इस प्रकार संस्कृत ने तर्क तथा स्वतन्त्र चर्चा पर आधारित एक स्वस्थ भारतीय मानसिकता का पोषण हजारों वर्षों तक किया।

इसमें कोई संदेह नहीं कि संस्कृत का विरोध या तो अज्ञान की उपज है या फिर संकुचित पूर्वाग्रह से युक्त दृष्टि की। संस्कृत भारत की शक्ति है अगर आप शोषित वर्ग से हैं और मानते हैं कि संस्कृत के नाते आपका शोषण हुआ है तो संस्कृत की उपेक्षा करके आप नये शोषणों के शिकार होंगे। इसलिए आवश्यकता संस्कृत को नकारने की नहीं, वरन् उसको अपनाने की है।

संस्कृत को केवल कर्मकाण्ड की भाषा मानकर उसके प्रति आजकल निकृष्ट दृष्टि रखी जाती है उसका बहुत बडा कारण यह है कि हमारी दृष्टि संस्कृत के प्रति विशद नहीं है। संस्कृत के वे क्षेत्र जो शुद्ध रूप से वैज्ञानिक हैं अचर्चित तथा उपेक्षित रह जाते हैं। हाल में ही मञ्जुल भार्गव ने गणित में नोबल प्राप्त किया। उसमें उन्होंने संस्कृत के छन्द:शास्त्रीय सिद्धान्तों को प्रमुख प्रेरक बताया। प्रश्न यह है कि हमारे छात्र उन सिद्धान्तों का प्रयोग क्यों नहीं कर पा रहे हैं। उत्तर आसान है, क्योंकि वे संस्कृत के वैज्ञानिक पहलुओं से विमुख हैं। हम केवल फलित ज्योतिष को देखकर उसकी निन्दा करते हैं, उसके मूल में विद्यमान गणित के अद्भुत सिद्धान्तों का मूल्यांकन नहीं कर पाते हैं। वस्तुत: संस्कृत में दर्शन तथा धार्मिक साहित्य के अतिरिक्त या उनके अन्तर्गत भी विज्ञान तथा गणित इत्यादि के बहुत सारे अनछुए सिद्धान्त यत्र तत्र बिखरे पड़े हैं संस्कृत भाषा के बिना उन तक स्वस्थ पहुँच सम्भव नहीं है। गणित के सभी प्रमुख क्षेत्रों में संस्कृत के शुद्ध सैद्धान्तिक ग्रन्थ मिलते हैं। वैदिक काल से ही गणना तथा रेखागणित के पेंचीदा सिद्धान्तों पर चर्चा होने लगी थी। बौधायन शुल्ब सूत्र में यज्ञवेदिका के प्रसङ्ग में बौधायन प्रमेय चर्चित है जिसे हम पाइथागोरस प्रमेय के नाम से जानकर कृतकृत्य हो जाते हैं। अङ्कगणित में भास्कर, ब्रह्मगुप्त तथा महावीर रेखागणित में बौधायन तथा परमेश्वर त्रिकोणमिति में माधव के योगदान उल्लेखनीय तथा अध्ययनसापेक्ष हैं। पाई के मूल्य के सम्बन्ध में सबसे पहले महावीर नामक गणितज्ञ ने 850 ई॰में प्रयत्न किया था। पृथ्वी के भ्रमण तथा गुरुत्वाकर्षण एवं प्रकाश की गति से सम्बन्धित वैज्ञानिक सिद्धान्तों की वेदों के मन्त्रों से लेकर आर्यभट्ट, वराहमिहिर आदि तक लम्बी तथा अटूट परम्परा है जो संस्कृत भाषा में ही निबद्ध है। इसके अतिरिक्त रसायन शास्त्र, धातु विज्ञान, स्थापत्य शास्त्र से सम्बन्धित ग्रन्थों की अविच्छिन्न श्रृंङ्खला है। इनमें अनेकानेक ग्रन्थ ऐसे हैं जिसे वैज्ञानिक मनोवृत्ति के ही विद्वान् समझ सकते हैं। जब संस्कृत में सभी क्षेत्रों के ज्ञान विज्ञान समाहित हैं तो आवश्यक है कि सभी प्रकार के लोगों की पहुँच संस्कृत तक हो तथा किसी स्तर पर उनका संस्कृत के साथ परिचय कराया जाये जिससे ज्ञान की इस सामग्री को उसके वास्तविक वारिस मिल पायें और उनकी सुरक्षा हो सके।

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