माननीय विधायक अगर वाकआउट करें, तो खर्च का हिसाब लगाना वाजिब है, लेकिन सदन में सत्र के दिन बढ़ें तो लोकतांत्रिक प्रासंगिकता बढ़ती है। अत: तपोवन में विधानसभा का ताप बढ़ाने के लिए सत्र की अवधि में विस्तार की गुंजाइश हमेशा रहेगी। विधानसभा का तपोवन में होना या शीतकालीन सत्र के दौरान होने की आशा […]
Category: राजनीति
मासूमियत से यह कैसा खिलवाड़
मोनिका शर्मा इतिहास के पन्नों पर हो रही वर्तमान की सियासत में हमारा भविष्य भी अंधकारमय हो रहा है। ऐसा ही कुछ लगता है सोशल मीडिया में वायरल हुए बच्चे का वीडियो देख कर, जो हाथ में पत्थर उठाए वही बोल रहा है जो उससे बोलवाया जा रहा है। यह मासूम वही समझ रहा है […]
असम क्यों सुलग रहा है
बहुप्रतीक्षित राष्ट्रीय नागरिक पंजी यानी एनआरसी का पहला प्रारूप आते ही सीमावर्ती राज्य असम में तनाव बढ़ गया है। सूची में घोषित आतंकी व लंबे समय से विदेश में रहे परेश बरुआ, अरुणोदय दहोटिया के नाम तो हैं लेकिन दो सांसदों व कई विधायकों के नाम इसमें नहीं हैं। अपना नाम देखने के लिए केंद्रों […]
भारत की लाचार संसदीय प्रणाली
नोटबंदी का फैसला हो, जीएसटी लागू करने की बात हो या फिर तीन तलाक का मामला, सब जगह संसद की अवहेलना की गई। कानून बनाने में विपक्ष की भूमिका सिर्फ आलोचना करने तक सीमित है। वह न कोई कानून बनवा सकता है और न रुकवा सकता है। ऐसे में यह धारणा कि संसद कानून बनाती […]
हास्यास्पद है नैतिक जीत का दावा
कांग्रेस की ओर से दावा किया गया कि उसकी नैतिक जीत हुई है। यह दावा झुठलाया जा सकता है, क्योंकि उसने नैतिकता के सभी मापदंडों का उल्लंघन किया। समकालीन परिदृश्य की बात करें तो गुजरात चुनाव में नैतिकता के प्रश्न को भुला दिया गया। कांग्रेस ने चुनाव के दौरान नारेबाजी के बाद परिणाम सामने आने […]
सुस्त शासन से मोदी के मिशन को खतरा
इस बात में कोई संदेह नहीं है कि नोटबंदी तथा जीएसटी अर्थव्यवस्था में बड़े सुधार हैं, लेकिन इन पर अमल सुचारू ढंग से होना चाहिए। अव्यवस्थित तरीके से इन्हें लागू करने से जनता को असुविधा ही होगी। सबसे बड़ी कष्टप्रद समस्या यह है कि जीएसटी को कुछ लोग ही जानते-समझते हैं, जबकि व्यापारी, जिन पर […]
भाजपा को चेतावनी, कांग्रेस को सबक
गुजरात के चुनाव परिणामों ने जहां भारतीय जनता पार्टी के कान खड़े कर दिए हैं, वहीं बर्फीले प्रदेश हिमाचल में कांग्रेस को बहुत बड़ा सबक दिया है। इन दोनों चुनावों के परिणामों के नेपथ्य से कुल मिलाकर यह संदेश तो प्रवाहित हो रहा है कि कांग्रेस धीरे-धीरे ही सही, परंतु सत्ता मुक्त पार्टी की ओर […]
देश की पहली लोकसभा 13 मई 1952 को अस्तित्व में आयी थी। देश में स्वतन्त्रता के उपरान्त अपने संविधान के अनुसार तब पहली बार चुनाव सम्पन्न हुए थे। लोगों में चुनाव में मतदान के प्रति अतिउत्साह था। उन्हें लग रहा था कि मतदान के माध्यम से सही प्रतिनिधि चुनकर वह बहुत बड़ा कार्य करने के […]
ऋषभ कुमार मिश्र ‘असफल विद्यालय’ का तर्क देकर सरकार अपने दायित्व से पीछा नहीं छुड़ा सकती। विद्यालयों की स्वायत्तता निजी हाथों में सौंपने से पहले अपनी विरासत को याद करना जरूरी है। महात्मा गांधी एक आत्मनिर्भर और स्वायत्त विद्यालय की परिकल्पना में विश्वास करते थे। एक ऐसा विद्यालय जिसका प्रबंधन स्थानीय समुदाय के पास हो […]
हिमालय और गुजरात के चुनावों में हमने नेताओं की कुछ हल्की बातें देखी हैं। जब ‘हल्के’ लोगों को बड़ी जिम्मेदारी दी जाती है या वे हमारे द्वारा अपने नेता मान लिये जाते हैं तो उनसे ऐसी हल्की बातों की अपेक्षा की जा सकती है। हमारे नेताओं को कौन समझाये कि विकास कभी ‘पागल’ या ‘बदतमीज’ […]