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राजनीति

हास्यास्पद है नैतिक जीत का दावा

कांग्रेस की ओर से दावा किया गया कि उसकी नैतिक जीत हुई है। यह दावा झुठलाया जा सकता है, क्योंकि उसने नैतिकता के सभी मापदंडों का उल्लंघन किया। समकालीन परिदृश्य की बात करें तो गुजरात चुनाव में नैतिकता के प्रश्न को भुला दिया गया। कांग्रेस ने चुनाव के दौरान नारेबाजी के बाद परिणाम सामने आने पर इसे अपनी नैतिक जीत बताया। सवाल उठता है कि गुजरात में नैतिकता जैसी क्या चीज थी। 
हिमाचल में हाल में चुनाव के लिए साफ-सुथरा प्रचार अभियान चला। सरकार का परिवर्तन सुचारू रूप से हो गया और प्रचार अभियान भी सादगी की सीमाओं के भीतर रहा। यह अजीब बात है कि हिमाचल व गुजरात चुनाव के परिणाम आने के बाद किसी ने भी हिमाचल की बात नहीं की। कांग्रेस निर्णायक रूप से यहां हार गई और पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व ने राज्य में पार्टी की स्थिति का कोई जायजा नहीं लिया। यहां पर मात्र वीरभद्र सिंह पार्टी के प्रचार में जुटे थे। यह इसी तरह था जैसे जलते जहाज में कोई अकेला लडक़ा छटपटा रहा हो। अगर उन्हें संगठन की ओर से पर्याप्त मदद मिली होती, तो वह इससे बढिय़ा परिणाम पार्टी के लिए दे सकते थे।
इस चुनाव में नैतिकता से कम कुछ भी नहीं था। वास्तव में चुनाव प्रचार के दौरान भी शांति बनी रही तथा दोनों पार्टियों ने चुनाव आयोग की ओर से तय किए गए आचार-व्यवहार के नियमों का अनुसरण करते हुए अपनी लड़ाई लड़ी। भाजपा के लिए सबसे बड़ी क्षति यह हुई कि मुख्यमंत्री पद के लिए घोषित उसके उम्मीदवार प्रेम कुमार ूमल तथा पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष सतपाल सत्ती भी चुनाव हार गए। पार्टी की पूरी रणनीति मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार ने ही सुनियोजित ढंग से बनाई। उसी रणनीति के मार्गदर्शन में चुनावी लड़ाई लड़ी भी गई, पर वह अपनी ही सीट को जीत नहीं पाए। इसके बावजूद सत्ता परिवर्तन लोकतांत्रिक भावना के अनुरूप सुचारू ढंग से हुआ। गुजरात की तुलना में हिमाचल का चुनावी परिदृश्य उलट था। गुजरात में तो नैतिकता नाम की कोई चीज देखने को नहीं मिली, हालांकि बाद में नैतिकता की दुहाई दी गई। गुजरात एक अलग प्रकार का चुनाव प्रचार अभियान देखने को मिला, जहां सब प्रकार के साम, दाम, दंड, भेद अपनाए गए। कांग्रेस ने यहां भाजपा को कड़ी टक्कर दी, जिसने जीत के लिए सभी तरीके अपनाए, फिर भी वह बहुमत से पीछे रह गई।
कांग्रेस की ओर से दावा किया गया कि उसकी नैतिक जीत हुई है। यह दावा झुठलाया जा सकता है, क्योंकि उसने नैतिकता के सभी मापदंडों का उल्लंघन किया। नैतिकता के प्रश्न पर राजनीति के इतिहास में दशकों से चर्चा होती रही है। प्राचीन काल में भी युद्ध और शांति के दौरान आचरण में नैतिकता एक मुख्य विषय बना रहता था, जैसा कि रामायण व महाभारत में उल्लेख मिलता है। कई महान बुद्धिजीवियों ने इस विषय पर मनन किया। इनमें चाणक्य का नाम भी आता है, जिन्होंने अर्थशास्त्र की रचना की। इसमें चंद्र गुप्त मौर्य के लिए साम्राज्य जीतने के चाणक्य के अनुभव दिए गए हैं। समकालीन परिदृश्य की बात करें तो गुजरात चुनाव में नैतिकता के प्रश्न को भुला दिया गया। कांग्रेस ने चुनाव के दौरान नारेबाजी के बाद परिणाम सामने आने पर इसे अपनी नैतिक जीत बताया। सवाल उठता है कि गुजरात में नैतिकता जैसी क्या चीज थी? किसी ने इसकी व्याख्या नहीं की, सिवाय इसके कि एक पार्टी जो वहां अच्छी स्थिति में नहीं थी, उसने वहां कुछ हद तक वापसी की है। हालांकि वह बहुमत से दूर रही, फिर भी उसने भाजपा के लिए उसके ही गढ़ में एक जोरदार चुनौती पेश की है। अब वहां स्र्पा की रोचक स्थिति है और दोनों दल एक-दूसरे को कड़ी टक्कर दे रहे लगते हैं। इसके बावजूद परिणाम में कुछ भी नैतिकता जैसा नहीं है। यह राजनीतिक परिदृश्य में एक बदलाव है जिसमें कांग्रेस की स्थिति पहले से बेहतर जरूर हुई है। अब किसी को नैतिक जीत का श्रेय क्यों दिया जाए, जबकि वहां सभी दलों ने चुनाव आयोग की ओर से तय की गई आचार संहिता का अनुपालन नहीं किया। इनमें कांग्रेस व भाजपा के साथ दो स्थानीय संगठन भी शामिल हैं। चुनाव के दौरान दोनों ओर से एक-दूसरे के प्रति गाली-गलौज हुआ। ऐसी स्थिति में नैतिक जीत का दावा न तो हारने वाली पार्टी कर सकती है और न ही जीतने वाली पार्टी।
कई लोगों ने आारहीन आरोप लगाकर चुनाव आयोग की छवि तक को ूमिल किया। मिसाल के तौर पर अरविंद केजरीवाल ने कहा कि चुनाव आयोग को कमीशन इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह नरेंद्र मोदी से कमीशन वसूल करता है। इस तरह की आलोचना आारहीन व स्तरहीन ही कही जाएगी। यह गंदी मानसिकता की पहचान है। हैरानी यह कि जिस चुनाव आयोग द्वारा संचालित चुनाव प्रक्रिया के जरिए दिल्ली में उनकी पार्टी की सरकार बनी या वह खुद मुख्यमंत्री बने, आखिर वह किस आार पर उसी संस्था पर इस तरह के घटिया आरोप लगा सकते हैं? चाणक्य ने राज्य के हित में नियम बनाते समय नैतिक नियमों में कुछ हद तक छूट दी थी। उनकी तुलना 15वीं शताब्दी के इटली के विचारक निकोलो मैक्यावली से की जाती है, जिन्होंने राज्य के हित में सानों की पवित्रता को ज्यादा तूल नहीं दिया और नैतिक नियम राज्य के अीन बताए। युद्ध और शांति पर विचार प्रकट करते समय चाणक्य ने स्पष्ट रूप से कहा कि राज्य को र्म को सबसे ऊपर रखना चाहिए। चाणक्य ने नैतिक नियमों से कम मापदंडों की पैरवी कुछ स्थितियों में जरूर की, लेकिन यह सब राज्य के हित के लिए किया गया। निजी स्वार्थों की खातिर उन्होंने इस तरह की कोई छूट नहीं दी। उन्होंने निजी स्वार्थों पर नैतिकता को तरजीह दी। शब्दों का प्रयोग ीरे-ीरे अपने वास्तविक अर्थ खो रहा है। अब शब्दों के वे अर्थ नहीं लिए जाते, जो एक सही सोच वाले व्यक्ति के लिए होते हैं। अब जो नैतिक नहीं है, वह दूसरों के लिए नैतिक है। हमारे देश में जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी की मिसाल देखें तो देश को तोडऩे के नारे लगाकर तथा अफजल गुरू जैसे आतंकवादी के पक्ष में जिंदाबाद के नारे लगाकर भी कोई यह दावा कर सकता है कि वह राष्ट्रवादी है। हार्दिक पटेल व उसके साथी मराठाओं की आलोचना करते हैं जो अंगे्रजों से लड़े तथा उन अंगे्रजों की प्रशंसा करते हैं जिन्होंने मराठा से लडऩे के लिए दलित सैनिकों का प्रयोग किया। शहीदों व आतंकवादियों का कोई मापक अर्थ नहीं है और कुछ के लिए ये शब्द अंतरपरिवर्तनीय हैं। इस दृष्टि से देखें, तो गुजरात में हार के बाद कांग्रेस का नैतिक जीत का दावा हंसी योग्य है। यह दावा गुजरात चुनाव के परिणाम का सही अर्थों में प्रतिनित्वि नहीं करता है।

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