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कविता

श्रम करो – पुरुषार्थ करो

– डॉ॰ राकेश कुमार आर्य संघर्ष करो – संघर्ष करो, जीवन ज्योति प्रदीप्त करो। संग्राम क्षेत्र यह जीवन है, यहां अपने को उद्दीप्त करो ।। रुक जाना नहीं जीवन होता, जीवन चलते जाना है। काम पथिक का चलते रहना, रुकना ही मिट जाना है ।। श्रम करो – पुरुषार्थ करो , यही सनातन कहता है। […]

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नाम अनेक – वह ‘एक’ है

तारक है, निस्तारक है, वाहक है , संवाहक है । वह जगत नियंता परमेश्वर, नायक और नियामक है।। वही पालन कर्ता ,सुखकर्ता , दु:ख हर्ता भी कहा जाता, सृष्टि कर्ता परमेश्वर ही , न्यायाधीश कहा जाता।। ब्रह्मा विष्णु महेश वही है, गायत्री हमें बताती है। भू: भुव: स्व:- कहकर, सही अर्थ हमें समझाती है।। वरणीय […]

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‘होता’ भाव जीवन में धारो

बनकर हंस रहो जग में, मत भीगो जग के पानी में। हीरे के सम रहो चमकते, कुछ कर लो काम जवानी में।। वसु – भाव से जीना सीखो, वृद्धि करो, मुझे भी करने दो। ऐश्वर्यसंपन्न बन जीवन जिओ, सुखी रहो, मुझे भी रहने दो।। ‘होता’ भाव जीवन में धारो, सर्वस्व समर्पित कर डालो। सद्भाव – […]

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शमशानों के सन्नाटे ही

ना रूप बचे , ना भूप बचे, काल के ग्रास बने सब ही। ना योगी बचे,ना तपसी बचे, नामशेष रह गए सब ही।। जिनसे कभी धरती हिलती थी, वह भी मिट्टी की भेंट चढ़े। जिनसे कभी अंबर डरता था, वह भी मिट्टी में दबे पड़े।। अप्रतिम जिनका बाहुबल था, विराट बने – सम्राट बने। शमशानों […]

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सत्व – भाव में जीते रहना

जब नभ में सूरज चढ़ता हो, मौन रह , करते सब वंदन। भूमंडल की सभी शक्तियां, शीश झुकाए करें अभिनंदन।। उत्थान काल में बढ़ती गर्मी, विस्तार दिलाती है तुमको। जैसे नभ में चढ़ा सूर्य, हर लेता है सारे तम को।। उत्थान काल में बढ़ते रहना, विनम्र और सहज बनकर। सत्व – भाव में जीते रहना, […]

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कविता पर्व – त्यौहार

वसंत हृदय में धार ले, कहती है नव भोर

मधुमय यह वसंत है शुभ हो मंगल मूल। उल्लसित हैं सब दिशा खिल रहे प्यारे फूल।। सरसों फूली खेत में, बिखर गया है रंग। प्रकृति बतला रही, जीने का नया ढंग।। सरस रस हृदय पीओ, करो सदा आनंद। ओ३म नाम सिमरा करो कट जाएंगे फंद।। घृणा की ठिठुरन गई, प्रेम है भावविभोर। वसंत हृदय में […]

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काम भयंकर विषधर है

काम भयंकर विषधर है, नहीं बचा दंश से कोई भी। काम कुचाली भूचाली के, ना बचा वेग से कोई भी।। बहुत भयंकर डकैत देह में, बैठा हुआ है छुप करके। जागृत करता पापवासना, विवेक का दीप बुझा करके।। जितने भर भी पाप जगत में, होता सबका मुखिया काम। देह जलाता – गेह जलाता, अपयश – […]

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किए का फल मिलना निश्चय

हर वृक्ष लता से पूछा मैंने, तुम किस कारण यहां खड़े ? किस कारण तुम भोग रहे हो, फल कर्मों के बहुत कड़े ? वृक्ष लता एक सुर से बोले – नियम भंग के दोषी हैं हम। कठोर मिली है कारा हमको, दूर-दूर तक छाया है तम।। पाप रहा होगा छोटा सा, फल भयंकर विषधर […]

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डटकर संघर्ष किया हमने

मिला है जीवन लड़ने को, तूफान जगत के जितने भी। ‘अर्जुन’ ! तुझको लड़ना होगा, महारथी खड़े हों कितने भी।। तूफानों से पीठ फेरना, ना रहा हमारी रीति में। डटकर संघर्ष किया हमने, यही लिखा हमारी नीति में।। जब ललकारे कोई ‘ दुर्योधन’, करे चीरहरण किसी नारी का। कभी तेज तुम्हारा झुके नहीं, करो अंत […]

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वसुधा उसका घर होता है…

यह तेरा है – यह मेरा है, ये विचार बहुत ही छोटा है। जो फंसा हुआ इस द्वंद्व-भाव में, चिंतन उसका खोटा है।। बांहों को खोल बढ़ा जो आगे, बड़ा वही होता है। व्यापक विस्तृत चिंतन उसका, प्रेरक सबका होता है।। बड़ी सोच के स्वामी का, हृदय ही मंदिर होता है। हितार्थ समस्त जगती के, […]

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