154 पांच कोश का पींजड़ा , जा में पंछी बंद। पांच प्राण और इंद्रियां, भवन चाक-चौबंद।। भवन चाक- चौबंद, इंद्रिय संख्या ग्यारह। संचालक बन आत्मा, इनको बैठ निहारै।। सतोगुणी बुद्धि रहै , तब इंद्रियां हों निर्दोष। समझ खेल का खेल है, देह के पांचों कोश।। 155 भ्राता की दशा देखकै , मन में उठे उमंग। […]
अध्याय … 52 भाई ऐसा होत……