जिन्हें प्रभु लोक-कल्याण के विचार देते हैं:- साधक ध्यान निमग्न हो, साधना में खो जाया। रचना कोई होती नई, श्रेय उसी को जाय ॥ 2298 ।। मन कहाँ भाव-विभोर होता है- जो खुशबू माँ-गोद में, मिलती नहीं कहीं और। प्रभु तेरी आगोश में, मन हो भाव-विभोर ॥2299॥ तत्त्वार्थ:- शिशु जब जन्म लेता है, तो चार […]