ओ३म्
Category: भारतीय संस्कृति
जो पढ़ा हुआ है उसके विषय में माना जाता है कि वह ‘बढ़ा’ हुआ देशप्रेमी है। वह ‘बढ़ा’ तो है, किंतु विचारणीय बात यह है कि वह किस क्षेत्र में बढ़ गया ? जो उसके लिए सर्वथा वर्जित और त्याज्य था वह उसकी ओर क्यों और कैसे चला गया ? क्या हमने कभी इस […]
अमित सिन्हा , बिहार मैं नारायण का अवतार मर्यादा_पुरुषोत्तम श्रीराम हूं. मानव निर्मित विश्व की प्रथम राजधानी अयोध्या का राजा. अजीब विडंबना है ना..! स्वतंत्र भारत में अपने ही शासकों द्वारा 14 वर्षों से भी अधिक वनवास देने के बाद भी आज अयोध्या सूनी रहेगी. मेरे जन्म स्थान पर चाह कर भी मेरे भक्त अपने […]
इस युद्ध से प्राचीन आर्य लोगों का वैभव सदा के लिए अस्त हो गया। ———————— [भूमिका : 31 जुलाई 1875 को पूना में इतिहास विषय पर दिए गए अपने भाषण में महर्षि दयानन्द जी ने महाभारत के समय की महत्त्वपूर्ण धटनाओं का उल्लेख करते हुए निम्नलिखित बातें अपने श्रोताओं को सुनाई थीं। स्रोत : उपदेश-मंजरी […]
ओ३म् ========== वेदों में ईश्वर ने संसार के सभी मनुष्यों को यज्ञ करने की प्रेरणा की है। यज्ञ से रोगों व विषैले किटाणुओं का नाश होता है इसकी प्रेरणा भी ईश्वर ने की है। यज्ञ में आम्र की तथा कुछ अन्य वृक्षों की समिधाओं वा काष्ठों को जलाकर उसमें वेदमन्त्रों की जीवनोपयोगी प्रार्थनाओं को बोलकर […]
ओ३म्===========मनुष्य को मनुष्य मननशील होने के कारण से कहते हैं। मनन का अर्थ है सत्य व असत्य का विचार करने वाला दो पैरों वाला प्राणी। जो मनुष्य शिक्षित नहीं है, ज्ञानी नहीं है, जिसने वेद, उपनिषद, दर्शन, रामायण एवं महाभारत सहित सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, संस्कारविधि, आर्याभिविनय आदि ग्रन्थों को नहीं पढ़ा है, वह मनुष्य कुछ-कुछ सभ्य […]
मानव जीवन में यज्ञोपवीत ( जनेऊ ) का अत्यधिक महत्त्व है। उपनयन संस्कार को सभी संस्कारों में महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया है । यज्ञोपवीत के तीन तार मनुष्यों उसके तीन ऋणों का निरन्तर स्मरण कराते रहते हैं। देव ऋण, आचार्य ऋण और मातृ-पितृ ऋण। उपनयन-संस्कार में यज्ञोपवीत धारण कराते हुए पुरोहित द्वारा वेद मंत्र का […]
रामायण कालीन वैदिक संस्कृति
🌷रामायणकालीन वैदिक संस्कृति🌷 (१) सन्ध्या और अग्निहोत्र: वाल्मीकि रामायण से विदित होता है कि उस काल में आर्यों की उपासना सन्ध्या के रुप में होती थी। जप, प्राणायाम तथा, अग्निहोत्र के भी विपुल उल्लेख मिलते हैं। पौराणिक मूर्तिपूजा, व्रत, तीर्थ, नामस्मरण या कीर्तन रुप में धार्मिक कृत्य का वर्णन मूलतः नहीं है। क्षणिक उल्लेख जो […]
गीता में पाखंड खंडन
हमारे कुछ हिन्दू भाइयों को स्वामी दयानंद से एक शिकायत रहती हैं कि स्वामी जी को हिन्दू समाज कि आस्था का खण्डन नहीं करना चाहिए था। स्वामी जी उद्देश्य किसी कि आलोचना अथवा विरोध नहीं था अपितु जो कुछ भी सत्य हैं उसका मंडन और जो कुछ भी असत्य हैं उसका खंडन था। स्वामी जी […]
उपनिषद् भारतीय वैदिक वांग्मय के महत्वपूर्ण ग्रंथ हैं । इनका प्रमुख विषय ब्रह्मविद्या तथा आत्मा और परमात्मा के संबंध के बारे में है । स्थूल से सूक्ष्म की ओर चलने की शिक्षा भी हमें उपनिषदों के माध्यम से ही प्राप्त होती है। ब्रह्म, जीव और जगत् का ज्ञान पाकर आत्मा का परिष्कार करना और अपने […]