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भारतीय संस्कृति

भारत के शिक्षित ही उजाड़ रहे हैं भारत को

 

जो पढ़ा हुआ है उसके विषय में माना जाता है कि वह ‘बढ़ा’ हुआ देशप्रेमी है। वह ‘बढ़ा’ तो है, किंतु विचारणीय बात यह है कि वह किस क्षेत्र में बढ़ गया ? जो उसके लिए सर्वथा वर्जित और त्याज्य था वह उसकी ओर क्यों और कैसे चला गया ? क्या हमने कभी इस पर सोचा है। आज अशिक्षितों से अधिक शिक्षितों से इस देश की निजता को संकट उत्पन्न हो गया है। जी हां , मैं जो कह रहा हूं , बहुत सोच समझकर कह रहा हूं । आप तनिक ध्यान दें ; इस देश की भाषा को बिगाड़ रहा है तो शिक्षित बिगड़ रहा है । जिसमें उसने अनेकों विदेशी भाषाओं के शब्दों का की भरमार कर डाली है और अपनी संस्कृत व हिंदी को बोलने में उसे लज्जा आती है । इसी शिक्षित वर्ग ने ही देश की संस्कृति को पश्चिमी संस्कृति में रंगने का काम किया है । भारत का पहनावा , भारत की सभ्यता , भारत के संस्कार मिटाने का काम इसी शिक्षित वर्ग ने किया है । भारत के भोजन को इसने भुलाया है । भारत के घी , दूध , दही , छाछ लेने व खाने की परंपरा को इसने भुलाया है । हमारे भोजन की थाली में यह सारी चीजें हुआ करती थीं , जिससे हम स्वस्थ रहते थे । चेहरे पर कांति दमकती थी। आज इसके स्थान पर अंडा और गाय का मांस आ गया है , उसे लाने में भी इसी शिक्षित वर्ग ने अहम भूमिका निभाई है।
बड़ों का सम्मान छोड़कर अपने आपको ‘सेल्फ मेड’ दिखाने का दुस्साहस इसी शिक्षित वर्ग ने किया है । कोर्ट कचहरी में जाकर समस्याओं का समाधान करने की परंपरा इसी शिक्षित वर्ग ने चलाई है , गांवों की पंचायतों व बड़े बुजुर्गों की बातों को मानने की भारत की प्राचीन परंपरा का सत्यानाश इसी वर्ग ने किया है । देश में इनकम टैक्स कैसे बचाया जाए उसे भी इसी शिक्षित वर्ग में से निकला हुआ एक व्यक्ति हमें बताता है , इसी शिक्षित वर्ग में से निकले हुए कुछ लोगों ने चिकित्सा को एक व्यवसाय बना कर रख दिया है , जिस देश में नि:शुल्क चिकित्सा करने के लिए वैद्य जी का अत्यधिक सम्मान हुआ करता था उसी देश में डॉक्टर नाम का एक डकैत इसी शिक्षित वर्ग ने देश को दिया है । यहां तक कि आतंकवाद की फैक्ट्री लगाने का काम भी इसी शिक्षित वर्ग ने किया है । आप तनिक देखें , जितने भी आतंकवादी सरगना हैं , वे सारे के सारे विदेशों में पढ़े हैं , उनकी टीम के लोग विदेशों में पढ़े हैं या उच्च शिक्षा लिए हुए हैं , यह अलग बात है कि मोहरा किसी अशिक्षित को बनाया जाए , परंतु बात तो देखने वाली यह है कि आतंकवाद की फैक्ट्री लगाने वाला कौन है ? वहां भी इसी शिक्षित वर्ग के हिस्से में ही यह अपयश आता है।
देश के इतिहास का सत्यानाश करने वाला भी यह शिक्षित वर्ग ही है । जिसने अपनी कलम को बेचकर इस देश का सम्मान बेच दिया । देश की गंगा को प्रदूषित करने वाला भी यह शिक्षित वर्ग ही है। जिसने बड़ी-बड़ी कंपनियां गंगा के किनारे लगाईं और उनका गंदा पानी ले जाकर गंगा में डाला है । उन्हें चंद चांदी के सिक्कों से अलग देश के भविष्य की कोई चिंता नहीं है ? जबकि देश का आम आदमी तो अभी भी गंगा जी के सामने से सिर झुका कर निकलता है। उसमें थूकना तक पाप समझता है ।
निशुल्क शिक्षा देकर अपने जीवन को धन्य करने वाले पुराने आचार्य और ‘मास्टर जी’ को भी यह शिक्षित वर्ग ही खा गया, धोती कुर्ता वाले वे मास्टर जी या मुंशी जी आज कहां मिलते हैं जो बच्चों को घर जाकर भी बिना किसी शुल्क के पढ़ाया करते थे ? उनके स्थान पर आज शिफ्ट लगा लगाकर ट्यूशन के माध्यम से पैसे कमाने वाले तथाकथित पढ़े लिखे सभ्य लोग आ गए हैं । जिन्हें केवल पैसा कमाने की चिंता है । उनके लिए संस्कार नाम की कोई चीज नहीं है ।पैसा जितना लूटा जाए लूट लिया जाए , यही उनके जीवन का व्रत बन गया है।
कहां तक गिनाऊँ , बहुत लंबी सूची है।
कैसे होगी इस आदर्श की रक्षा – ‘वर्धस्व च वर्धय’ अर्थात स्वयं बढ़ो और दूसरों के बढऩे में सहायक बनो, परंतु आधुनिकता के नाम पर भारत को उजाड़ कर जिस इंडिया का निर्माण किया जा रहा है। उसके प्रति सरकारी दृष्टिकोण एकदम रूखा है। ईसाई मिशनरी देश में फैल रही हैं। उनके विचारों से भारतीय युवा वर्ग प्रभावित हो रहा है। भौतिकवाद की चमक-दमक और सरकारी उपेक्षावृत्ति उन्हें अपने देश, अपनी संस्कृति और अपने मूल्यों से काट रही है। ईसाईयत की बाढ़ से भारतीय धर्म की चट्टानें कट रही हैं और किसी के होठों पर उफ तक नही।
कौन से मुंह से कहें कि हम भारतीय हैं या हमारा हिंदुस्तान सारे जहां से अच्छा है ? इस शिक्षा प्रणाली के दोषों ने हमें किस स्थान पर पहुंचा दिया है ? इसका अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि- -आज विश्व हमारे वेदों, उपनिषदों, स्मृतियों, रामायण, गीता और महाभारत जैसे ग्रथों पर रिसर्च अर्थात शोध कर रहा है और हम उन्हें रूढि़वादिता की बातें मानकर पीछे छोडक़र आगे बढऩा चाहते हैं। जीवन मूल्यों की इतनी उपेक्षा क्यों ? -महर्षि पतंजलि का अष्टांगयोग जो आज पश्चिमी जगत के लिए तो आश्चर्य, कौतूहल, जिज्ञासा और शोध का विषय बना हुआ है किंतु भारतीयों के लिए नही । -संस्कृत भाषा व हिंदी भाषा भी आजकल विदेशियों के लिए पठनीय, ग्रहणीय भाषायें बनती जा रही हैं, जबकि भारत के असम क्षेत्र में आज भी भाषाई दंगे हो रहे हैं। अब तो कई लोग ऐसे भी हैं जो यह कहते हैं कि जो भाषा दूसरी भाषा के शब्दों को पकड़े , ग्रहण कर ले – वही समृद्ध भाषा होती है । उन्हें नहीं पता कि जो भाषा दूसरी भाषाओं के शब्दों को ग्रहण कर आगे बढ़ती है वह कंगाल भाषा होती है । साहूकार वही कहा जाता है जो अपने घर से न केवल अपना काम चलाये बल्कि दूसरों का भी काम चलाए । यह साहूकारी केवल संस्कृत कर सकती है। हिंदी कर सकती है। पर अब तो यहां पर उर्दू के पैरोकार खड़े हो रहे हैं । जिन्हें नहीं पता कि उर्दू अपने आप में कोई भाषा ही नहीं है । हमारा स्पष्ट मानना है कि संस्कृत से अलग संसार में कोई भाषा नहीं । इसके उपरांत भी अनेकों भाषाएं खड़ी कर ली गई हैं और उन सबकी पैरोकारी वही वर्ग करता है जो अपने आप को शिक्षित , सभ्य और आधुनिक कहता है ।
-आज की शिक्षा पद्घति ने हमसे यह सब कुछ छीन लिया है। राष्ट्र की आत्मा कुचल दी है। मानव को दानव बना दिया है। स्वाभिमान, राष्ट्रप्रेम और मानव प्रेम सब बीते दिनों की बातें हो गयीं हैं। इससे तो उत्तम था पूर्वजों का वह अशिक्षा का दौर या उन गरीबों और अशिक्षितों का वह वातावरण जो पुआल जलाकर उस पर बैठकर तापते हुए एक दूसरे के दुख दर्द की बातें पूछकर उसके काम आ जाया करते थे। सब कुछ लूटा जा रहा है और लुट रहा है , इतने पर भी पता नही क्यों कह दिया जाता है -इस निर्मम संसार को ‘सभ्य संसार’। जहां गरीब को अशिक्षा के भंवर में फंसाकर उत्पीडि़त कर चिकित्सा कराने में असमर्थ बनाकर मरने के लिए छोड़ दिया जाता है वह कैसा सभ्य समाज है ? ये कैसा सभ्य संसार है ? दलितों, शोषितों और उपेक्षितों की राजनीति करने वाले समस्या के इस मूल पर प्रहार क्यों नही करते ? दलन, शोषण व उपेक्षा के इन तरीकों को उखाड़ फेंकने के लिए कमर क्यों नही कसते ? भारत में दलित , शोषित , उपेक्षित – इन शब्दों के सहारे राजनीति की जा सकती है। राजनीति की फसल काटी जा सकती है, बोई जा सकती है, किंतु इन शब्दों की पूरी तरह समाप्ति भारतीय समाज से हो जाए- इस दिशा में कोई ठोस प्रगति नही की जा सकती, क्योंकि राजनीति के लिए विचार चाहिए , ‘बेचारों’ का समाधान नही। समस्या मुद्दा बना रहे और उससे राजनीति की फसल लहलहाती रहे, इसी व्यभिचार में सारी राजनीति और नेता फंसे पड़े हैं।

इस लेखनी के दर्द को सुनिये-

“किसी ने पूछा कि तेरा व्यापार कितना है?
किसी ने पूछा कि तेरा कारोबार कितना है?
किसी ने पूछा कि तेरा परिवार कितना है?
किसी ने न पूछा कि तेरा गरीब से प्यार कितना है?”

किसके पास समय है, असहाय के आंसू पोंछने और उसके हालचाल पूछने का ? उसकी आह को प्रारब्ध का खेल और अपनी मौज मस्ती को भाग्य का फल मान लिया जाता है। अब ये खेल बंद होना चाहिए। जिस शिक्षा ने दिलों में गांठ लगाने का काम किया है उसमें ‘आमूलचूल परिवर्तन’ की आवश्यकता है। देखिये रहीम की ये पंक्तियां कितनी सार्थक हैं-

रहिमन खोजो आम में, जहां रसन की खान।
जहां गांठ तहां रस नही यही प्रीति की हान।।

अत: यह व्यवस्था भी जले और इसके व्यवस्थापक भी जलें और कोई नया राग या नई धुन छेड़ी जाए। पंडित ब्रजनारायण चकबस्त जी की ये पंक्तियां इस नये राग को नई धुन दे सकती हैं-

गूंचे हमारे दिल के इस बाग में खिलेंगे।
इस खाक से उठे हैं इस खाक में मिलेंगे।।
गर्दों गुबार मां का, खिलअत है अपने तन को।
मरकर भी चाहते हैं, खाके वतन कफन को।।

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत

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