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भारतीय संस्कृति

यज्ञ से रोग चिकित्सा तथा रोगकारी विषैले कीटाणु व वायरसों का नाश

ओ३म्

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वेदों में ईश्वर ने संसार के सभी मनुष्यों को यज्ञ करने की प्रेरणा की है। यज्ञ से रोगों व विषैले किटाणुओं का नाश होता है इसकी प्रेरणा भी ईश्वर ने की है। यज्ञ में आम्र की तथा कुछ अन्य वृक्षों की समिधाओं वा काष्ठों को जलाकर उसमें वेदमन्त्रों की जीवनोपयोगी प्रार्थनाओं को बोलकर गोघृत, देशी शक्कर, वनस्पति व ओषधियों सहित सुगन्धित एवं पोषण प्रदान करने वाले पदार्थों की आहुतियां दी जाती हैं। इसका प्रभाव भी नासिका से प्रत्यक्ष अनुभव किया जाता है। यज्ञ से दुर्गन्ध का नाश होता है एवं सुगन्ध का वायुमण्डल के बहुत बड़े भाग में प्रसार होता है। यज्ञ से वायु सहित वर्षा जल की शुद्धि होती है। यज्ञ से रोगकारक किटाणु, वैक्टिरियाओं तथा वायरसों का नाश भी होता है। यह बातें वेदों में कहीं गई हैं। हमारे देश में अंग्रेजी चिकित्सा पद्धति को अनेक कारणों से स्थापित किया गया तथा आयुर्वेद को समाप्त करने के षडयन्त्र किये गये हैं। इसके पीछे एक विशेष सोच रही है। यदि आयुर्वेद को महत्व दिया जाता, आयुर्वेद पर अंग्रेजी चिकित्सा पद्धति के समान ही अनुसंधान व शोध कार्य होता तो आज आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति अग्रणीय चिकित्सा पद्धति हो सकती थी। स्वामी रामदेव एवं पतंजलि योगपीठ का धन्यवाद है जिन्होंने आयुर्वेद को पुनर्जीवित व पुनस्र्थापित किया जिससे आज आयुर्वेद का भी डंका देश विदेश में बज रहा है। आज पतंजलि के आयुर्वेदिक दंतमंजन दन्तकान्ति तथा रक्तचाप की दवा मुक्ता वटी सहित अनेक ओषधियां का सेवन देश व विश्व के लोग करते हैं। देश के लोग पतंजलि योगपीठ द्वारा प्रसारित गोघृत का विश्वासपूर्वक प्रयोग करते हैं। कपाल भाति, अनुलोम-विलोम आदि प्राणायामों सहित योगासनों ने तो पूरे विश्व में एक क्रान्ति उत्पन्न की है। इसका श्रेय स्वामी रामदेव जी सहित भारत के प्रधानमंत्री जी को भी है।

यज्ञ करने से रोग होते नहीं हैं और किसी को हो जाये तो वह दूर हो जाते हैं। वेदों के ऋषितुल्य शीर्ष विद्वान आचार्य डा. रामनाथ वेदालंकार जी का वैदिक यज्ञ-चिकित्सा विषय पर एक विस्तृत लेख है। उनकी पुस्तक यज्ञ-मीमांसा भी अपने विषय का उत्तम ग्रन्थ है। अपने लेख में आचार्य जी ने लिखा है ‘भारतीय विचारधारा के राम-रोम में ओतप्रोत यह यज्ञ दो दृष्टियों से अपनी महत्ता रखता है-एक तो भावना की दृष्टि से, दूसरे बाह्य लाभों की दृष्टि से। भावना की दृष्टि से यज्ञ मनुष्य के अन्दर त्याग, समर्पण, परोपकार, उध्र्वगामिता, आन्तरिक शत्रुओं का दमन, तेजस्विता, देव-पूजा, शान्ति, संगठन आदि भावनाओं को उद्बुद्ध करता है। बाह्य लाभों की दृष्टि से यह वायुमण्डल को शुद्ध करता है और रोगों तथा महामारियों को दूर करता है।’ इसके आगे उन्होंने यज्ञ के अनेक लाभों का वर्णन किया है जो पढ़ने योग्य है।

आचार्य जी के उपर्युक्त लेख में प्रथम ‘‘रोगोत्पादक कृमियों का विनाश” शीर्षक देकर इनसे सम्बन्धित वेद प्रमाण दिये हैं और उन वेद प्रमाणों की व्याख्या की है। हम समझते हैं किरोगोत्पादक कृमियों में सभी प्रकार के सूक्ष्म किटाणु, बैक्टिरिया एवं वायरस आदि आते हैं। आचार्य जी लिखते हैं कि अथर्ववेद 1.2.31-32, 4.37 तथा 5.23, 29 में अनेक प्रकार के रोगोत्पादक कृमियों का वर्णन आता है। वहां उन्हें यातुधान, क्रव्याद्, पिचाश, रक्षः आदि नामों से स्मरण किया गया है। ये श्वास-वायु, भोजन, जल आदि द्वारा मनुष्य के शरीर में प्रविष्ट होकर या मनुष्य को काटकर शरीर में रोग उत्पन्न करके उसे यातना पहुंचाते हैं, अतः ये ‘यातुधान’ हैं। शरीर के मांस को खा जाने के कारण यह ‘क्रव्याद्’ या ‘पिशाच’ कहलाते हैं। इनसे मनुष्य को अपनी रक्षा करनी आवश्यक होती है, इसलिए ये ‘रक्षः’ या ‘राक्षस’ हैं।

यज्ञ द्वारा अग्नि में कृमि-विनाशक ओषधियों की आहुति देकर इन रोगकृमियों को विनष्ट कर रोगों से बचा जा सकता है। अथर्व 1.8 में कहा है-

‘इदं हविर्यातुधानान् नदी फेनमिवावहत्। य इदं स्त्री पुमानक इह स स्तुवतां जनः।।

यत्रैषामग्ने जनिमानि वेत्थ गुहा सतामत्त्रिणां जातवेदः। तांस्त्वं ब्रह्णा वावृधानो जह्येषां शततर्हमग्ने।।

‘अग्नि में डाली हुई यह हवि रोगकृमियों को उसी प्रकार दूर बहा ले जाती है, जिस प्रकार नदी पानी के झागों को। जो कोई स्त्री या पुरुष इस यज्ञ को करे, उसे चाहिए कि वह हवि डालने के साथ मन्त्रोच्चारण द्वारा अग्नि का स्तवन भी करे।। हे प्रकाशक अग्ने, गुप्त से गुप्त स्थानों में छिपे बैठे हुए भक्षक रोगकृमियों के जन्मों को तू जानता है। वेदमन्त्रों के साथ बढ़ता हुआ तू उन योगकृमियों को सैकड़ों वधों का पात्र बना।।’

इस वर्णन से स्पष्ट है कि मकान के अन्धकारपूर्ण कोनों में, सन्दूक-पीपे आदि सामान के पीछे, दीवार की दरारों में तथा गुप्त से गुप्त स्थानों में जो रोग कृमि छिपे बैठे रहते हैं, वे कृमिहर ओषधियों के यज्ञिय धूम से विनष्ट हो जाते हैं।

अथर्ववेद 5.29 से इस विषय पर और भी अच्छा प्रकाश पड़ता है-

अक्ष्यौ निविध्य हृदयं निविध्य जिह्वां नितृन्द्धि प्र दतो मृणीहि। पिशाचो अस्य यतमो जघास अग्ने यविष्ठ प्रति तं शृणीहि।।

हे यज्ञ, जिस मांस भक्षक रोगकृमि ने इस मनुष्य को अपना ग्रास बनाया है, उसे तू विनष्ट कर दे। उसकी आंखें फोड़ दे, हृदय चीर दे, दांत तोड़ दे।

आमे सुपक्वे शबले विपक्वे, यो मा पिशाचो अशने ददम्भ0।।

क्षीरे मा मन्थे यतमो ददम्भ अकृष्टपच्ये अशने धान्ये यः0।।

अपां मा पाने यतमो ददम्भ क्रव्याद् यातूनां शयने शयानम्0।।

दिवा मा नक्तं यतमो ददम्भ क्रव्याद् यातूनां शयने शयानम्।
तदात्मना प्रजया पिशाचा, वियातयन्तामगदोऽयमस्तु।।

‘कच्चे, पक्के, अधपके या तले हुए भोजन में प्रविष्ट होकर जिन मांसभक्षक रोगकृमियों ने इस मनुष्य को हानि पहुंचायी है, वे सब रोगकृमि हे यज्ञाग्नि, तेरे द्वारा सन्तति-सहित विनष्ट हो जायें, जिससे कि यह नीरोग हो। दूध में, मठे में, बिना खेती के पैदा हुए जंगली धान्य में, कृषिजन्य धान्य में, पानी में, बिस्तर पर सोते हुए, दिन में या रात में जिन रोगकृमियों ने इसे हानि पहुंचायी है, वे सब हे यज्ञाग्नि, तेरे द्वारा सन्तति-सहित विनष्ट हो जावें, जिससे यह हमारा देह नीरोग हो।’

इसके पश्चात आचार्य रामनाथ वेदालंकार जी ने ज्वर-चिकित्सा, उन्माद-चिकित्सा, गण्डमाला-चिकित्सा, क्षयरोग या राजयक्ष्मा की चिकित्सा, गर्भदोष निवारण सहित अन्य अनेक रोगों के निवारण पर वेदमन्त्र प्रस्तुत कर उनके हिन्दी में अर्थ दिये हैं। आचार्य जी ने अपने इस लेख में यज्ञ द्वारा रोग-निवारण की प्रक्रिया पर भी प्रकाश डाला गया है। आयुर्वेद के ग्रन्थों से भी उन्होंने यज्ञ-चिकित्सा तथा रोग के कृमियों के नाश पर प्रकाश डाला है।

आचार्य जी ने लेख का जो उपसंहार दिया है उसे भी हम यहां प्रस्तुत कर रहे हैं। संस्कृत के अथर्ववेद एवं गोपथ ब्राह्मण के प्रमाण हम छोड़ रहे हैं। पाठक पुस्तक में देख सकते हैं। आचार्य जी लिखते हैं कि शास्त्रीय प्रमाणों से हमने यह प्रतिपादित करने का यत्न किया है कि यज्ञ द्वारा समस्त रोगों का निवारण सम्भव है। किस रोग में किन पदार्थों की हवि हितकर होगी इसका वैद्य-विद्वन्मंडली को अधिकाधिक अनुसंधान करना चाहिये। अथर्ववेद मे गूगल, कुष्ठ, पिप्ली, पृश्निपर्णी, सहदेवी, लाक्षा, अजश्रृंगी आदि कतिपय ओषधियों का माहात्म्य-वर्णन मिलता है। हवन सामग्री में गूगल का प्रयोग प्रायः किया जाता है। उसके विषय में अथर्ववेद के मन्त्र 19.38 में कहा गया है कि जिस मनुष्य को गूगल औषध की उत्तम गन्ध प्राप्त होती है, उसे रोग पीड़ित नहीं करते, और आक्रोश उसे नहीं घेरता।

यज्ञ द्वारा रोग-निवारण शास्त्रकारों की कोरी कल्पना नहीं है। प्राचीनकाल में रोग फैलने के समयों में बड़े-बड़े यज्ञ किए जाते थे और जनता उनसे आरोग्य लाभ करती थी। इन्हें भैषज्ययज्ञ कहते थे। गोपथ ब्राह्मण उ0 1.19 में लिखा है कि जो चातुर्मास्य यज्ञ हैं, वे भैषज्य-यज्ञ कहलाते हैं, क्योंकि रोगों को दूर करने के लिए होते हैं। ये ऋतुसन्धियों में किए जाते हैं, क्योंकि ऋतुसन्धियों में ही रोग फैलते हैं।

वर्तमान काल में भी वर्षा, शरद् और वसंत के आरम्भ में बड़े व्यापक रूप में रोग और महामारियां फैलती हैं, जिनके निवारण के लिए जनता और सरकार का करोड़ों रुपया व्यय हो जाता है, तो भी वे बीमारियां पूर्णतः नहीं रुक पाती। यज्ञ एक ऐसा उपाय है जिससे स्वल्प व्यय में महान् लाभ प्राप्त किया जा सकता है। जब सर्दी-जुकाम, मलेरिया, चेचक आदि रोग फैलने का समय हो, तब यदि घर-घर में उन रोगों के निवारण के लिए आयुर्वेदज्ञों द्वारा निर्दिष्ट उपयोगी ओषधियों से प्रतिदिन यज्ञ किए जाया करें तो सारा वायुमंडल उन रोगों के प्रतिकूल हो जाए और कहीं वे रोग न फैलें। भिन्न-भिन्न ऋृतओं में भिन्न-भिन्न रोग उद्भूत होते हैं। किसी ऋतु में वात प्रकुपित होता है, किसी में पित्त, किसी में कफ। उन-उन प्रकोपों के शमन के अनुकूल हवन-सामग्री का प्रयोग करना उचित है। वेद में भी ऋत्वनुकूल हवन-सामग्री का विधान है- ‘‘देवानां पाथ ऋतुथा हवींषि।।” (अथर्ववेद 5.12.10)। यहां पर आचार्य जी का लेख समाप्त होता है।

रोग का कारण कृमि, किटाणु, बैक्टिरिया या वायरस आदि होते हैं। रोग न हो इसके लिये मांसाहार का सर्वथा त्याग किया जाना चाहिये। मनुष्य का शरीर वनस्पतियों, गोदुग्ध आदि पदार्थों सहित फलों व मेवों के सेवन के लिये बना है, मांसाहार करने के लिये नहीं। यदि हम मांसाहार नहीं करेंगे तो हम रोगों से बचे रह सकते हैं। सरकार तथा मैडीकल साइंस के वैज्ञानिकों को देखना चाहिये कि मांसाहारी अधिक बीमार होते हैं या शाकाहारी? शाकाहारियों की आयु अधिक होती या मांसाहारियों की? तीव्र बुद्धि, बल व स्फूर्ति शाकाहारियों में अधिक होती है या मांसाहारियों में? घोड़ा शाकाहारी है। इसका गुण तेज दौड़ना है। पूर्व काल में अश्वों पर राजा व सेना शत्रुओं से युद्ध करती थी। घोड़ों का रथों में भी प्रयोग किया जाता था। आज भी दुल्हा घोड़ी पर अपनी बारात लेकर जाता है। पूर्व काल में हाथी का भी युद्धों व अनेक प्रयोजनों में प्रयोग किया जाता था। हार्स पावर घोड़े के नाम पर ही है। हाथी भी शाकाहारी पशु है। इसमें अन्य पशुओं, यहां तक की सिंह से भी अधिक बल होता है। शेर डरपोक जानवर होता है। वह हाथी के पीछे से आक्रमण करता है। इससे बहुत से उत्तर मिल जाते हैं। हमें शाकाहारी बनने का प्रण लेना चाहिये। इसी से मानवता जीवित रह सकेगी और सबको सुख प्राप्त होगा।

वर्तमान समय में कोरोना नाम का वायरस सारे संसार को कुपित कर रहा है। इससे अब तक विश्व में 11.50 लाख लोग संक्रमित हुए हैं तथा 61 हजार से अधिक लोग कल दिनांक 4-4-2020 तक मर चुके हैं। भारत में संक्रमित लोग 3700 से अधिक हैं तथा अब तक 105 लोग मर चुके हैं। विश्व के डाक्टर बता रहे हैं कि इस कोरोना संक्रमण का अभी तक कोई उपचार ज्ञात नहीं है। विश्व भर में अनुसंधान चल रहे हैं। इसका लाभ कब मिलेगा कहा नहीं जा सकता? पूरा भारत विगत 12 दिनों से लाकडाउन में है। सोशल डिस्टेन्सिंग का पालन किया जा रहा है। ऐसी स्थिति में भारत सरकार को स्वामी रामदेव जैसे यज्ञ के मनीषियों तथा कोरोना की ओषधियों पर शोध करने वाले वैज्ञानिकों को यज्ञ के कोरोना व अन्य रोगों पर प्रभाव पर शोध करने को कहना चाहिये। सम्भव है कि यज्ञ से कोरोना वाइरस को नष्ट किया जा सके। अनुसंधान करने में तो कोई बुराई नहीं है। पूर्वाग्रह उचित नहीं है। हम आशा करते हैं कि यदि यज्ञ पर वैदिक विद्वानों व पश्चिमी चिकित्सों द्वारा मिलकर अनुसंधान व अध्ययन किया जायेगा तो इसके सार्थक परिणाम होंगे। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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