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सत्यार्थ प्रकाश में इतिहास विर्मश ( एक से सातवें समुल्लास के आधार पर) अध्याय 27 ( ख ) तैंतीस कोटि देव

तैंतीस कोटि देव जो ‘त्रयसिंत्रशतिंत्रशता०’ इत्यादि वेदों में प्रमाण हैं इस की व्याख्या शतपथ में की है कि तेंतीस देव अर्थात् पृथिवी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, चन्द्रमा, सूर्य्य और नक्षत्र सब सृष्टि के निवास स्थान होने से आठ वसु। प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान, नाग, कूर्म्म, कृकल, देवदत्त, धनञ्जय और जीवात्मा ये ग्यारह रुद्र इसलिये कहाते हैं […]

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सत्यार्थ प्रकाश में इतिहास विर्मश ( एक से सातवें समुल्लास के आधार पर) अध्याय 27 ( क ) ईश्वर की प्रार्थना और हमारा जीवन

ईश्वर की प्रार्थना और हमारा जीवन स्वामी दयानंद जी महाराज ने ईश्वर जीव और प्रकृति के अस्तित्व को अजर और अमर स्वीकार किया। ऐसा करके उन्होंने वैदिक ऋषियों के साथ हमारा तारतम्य स्थापित किया। बीच में पौराणिक काल में आई विभिन्न मान्यताओं को स्वामी जी महाराज ने क्रांतिकारी ढंग से चुनौती देते हुए दूर करने […]

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कहनी है एक बात हमें!!!!

युगों युगों से आर्य समाज ने समस्त भूमंडल को एवं भारत राष्ट्र को वैदिक शिक्षा प्रदान करते हुए मार्गदर्शन किया है। आर्य समाज की महत्वपूर्ण और अग्रणी भूमिका इस राष्ट्र की स्वतंत्रता प्राप्ति में भी रही है। यदि वेद की विद्या आर्यावर्त में और भारत राष्ट्र में विद्यमान न होती तो भारत कभी विश्व गुरु […]

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सत्यार्थ प्रकाश में इतिहास विर्मश ( एक से सातवें समुल्लास के आधार पर) अध्याय – 26 ( ख ) कानून की असभ्यता

कानून की असभ्यता यह कितना रोचक तथ्य है कि आज का कानून दंड देते समय सबको समान समझने की डींगें तो मारता है पर दंड देते समय ऊंची पहुंच वाले या शक्ति संपन्न व्यक्ति को कम दंड देता है और जिसके पास कानून को समझने की शक्ति नहीं, उसे दंड अधिक देता है। आज का […]

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सत्यार्थ प्रकाश में इतिहास विर्मश ( एक से सातवें समुल्लास के आधार पर) अध्याय – 26 ( क ) कड़े दंड का प्रावधान

कड़े दंड का प्रावधान मुसलमानों की शरिया में कई प्रावधान ऐसे हैं जो अपराधी को दंड देने में भारत की न्यायिक प्रक्रिया की नकल करते देखे जाते हैं । यदि नाबालिग के साथ बलात्कार किया जाता है तो ऐसे अपराध को बहुत संगीन अपराध के रूप में शरीयत मान्यता देता है। शरीयत में प्रावधान है […]

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भारतीय शाक्त विचार और आधुनिक विज्ञान

आप जब इस लेख को पढ़ रहे होंगे, तब स्क्रीन को स्क्रॉल करने के लिए भी आपको शक्ति की आवश्यकता होगी। आश्चर्य नहीं कि हम भारतीय सदैव से ही शक्ति के प्रति आकर्षित होते रहे हैं। छान्दोग्य के ऋषि नारद को संकेत करते हुए अष्टम खंड में कहते हैं “बलं वाव विज्ञानाद्भूयोपि ह शतं..”। हे […]

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सत्यार्थ प्रकाश में इतिहास विर्मश ( एक से सातवें समुल्लास के आधार पर) अध्याय – 25 ( ख )

देश की वर्तमान लोकतांत्रिक व्यवस्था राजनीति को इतना शुद्ध और पवित्र होना चाहिए कि वह दंड के योग्य को दंड दे सके और प्रशंसा के योग्य की प्रशंसा कर सके। इसके लिए वर्तमान समय में देश में जिस प्रकार की लोकतांत्रिक व्यवस्था काम कर रही है वह भी विकारग्रस्त है। देश की बहुदलीय संसदीय व्यवस्था […]

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सत्यार्थ प्रकाश में इतिहास विर्मश ( एक से सातवें समुल्लास के आधार पर) अध्याय – 25 क

धर्म और निष्पक्ष न्याय व्यवस्था प्राचीन काल में भारत में जिन सूत्रों या मानदंडों के आधार पर न्याय व्यवस्था संचालित होती थी उन्हें धर्मसूत्र कहा जाता था। प्रारंभ में धर्मसूत्र इंग्लैंड के संविधान की भांति अलिखित संविधान के रूप में काम करते थे। कालांतर में धर्मसूत्र लिखित रूप में आ गए और धर्मसूत्र तथा अर्थशास्त्र […]

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18 विवादास्पद मार्ग और राजा

सत्यार्थ प्रकाश में इतिहास विर्मश ( एक से सातवें समुल्लास के आधार पर) अध्याय- 24 ख 18 विवादास्पद मार्ग और राजा संध्या आदि के पश्चात राजा के लिए अनिवार्य किया गया है कि :- “सभा राजा और राजपुरुष सब लोग सदाचार और शास्त्रव्यवहार हेतुओं से निम्नलिखित अठारह विवादास्पद मार्गों में विवादयुक्त कर्मों का निर्णय प्रतिदिन […]

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सत्यार्थ प्रकाश में इतिहास विर्मश ( एक से सातवें समुल्लास के आधार पर) अध्याय – 24 क सभा और सभासद

सभा और सभासद स्वामी दयानंद जी महाराज जी द्वारा स्थापित आर्य समाज की राजनीति की विचारधारा पर विचार व्यक्त करते हुए क्षीतिश वेदालंकार जी अपनी पुस्तक “चयनिका” के पृष्ठ संख्या 65 पर लिखते हैं कि -“आर्य समाज स्पष्टत: न तो एकतंत्र का न बहुतंत्र का, न ही दल तंत्र का, प्रत्युत लोकतंत्र का पक्षपाती है। […]

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