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भारतीय संस्कृति

सत्यार्थ प्रकाश में इतिहास विर्मश ( एक से सातवें समुल्लास के आधार पर) अध्याय – 25 क

धर्म और निष्पक्ष न्याय व्यवस्था

प्राचीन काल में भारत में जिन सूत्रों या मानदंडों के आधार पर न्याय व्यवस्था संचालित होती थी उन्हें धर्मसूत्र कहा जाता था। प्रारंभ में धर्मसूत्र इंग्लैंड के संविधान की भांति अलिखित संविधान के रूप में काम करते थे। कालांतर में धर्मसूत्र लिखित रूप में आ गए और धर्मसूत्र तथा अर्थशास्त्र के आधार पर न्यायपालिका का संचालन होने लगा। इनकी व्यवस्थाओं के अनुसार उस समय राजा सर्वोच्च न्यायाधीश था। राजा उस समय अपनी न्याय पूर्ण कार्यशैली और बुद्धि का प्रयोग करते हुए देश विरोधी व समाज विरोधी लोगों को दंड दिया करता था। यही उसका सर्वोपरि राजधर्म था। उस समय ऐसी धारणा थी कि यदि राजा अपने राज धर्म का सम्यक निर्वाह नहीं करेगा तो वह भी परलोक में इसका दंड भोगेगा। राजा उस समय कहने के लिए तो सब प्रकार के वादों को सुन सकता था परंतु कुल मिलाकर उसकी स्थिति आज के सर्वोच्च न्यायालय जैसी होती थी। जिसमें कुछ चुने हुए प्रकरण ही राजा के समक्ष जाते थे। छोटे-मोटे विवादों का निर्णय निम्न न्यायालय में हो जाता था। इसका अभिप्राय है कि उस समय न्याय और न्यायालयों का शक्ति पृथक्करण के आधार पर कार्य विभाजन सुचारू रूप से हो चुका था। न्यायालयों में कुछ अधिकारी और शासन वर्ग के लोग इस प्रकार के न्यायिक कार्यो को निपटाते थे। स्थानीय विवादों को सुलझाने के लिए नगर परिषदों और ग्राम पंचायतों को भी प्रोत्साहित किया जाता था। न्यायालय के न्यायिक कार्यों के निस्तारण के समय राजा सहित उसके अधिकारियों और न्यायाधीशों से अपेक्षा की जाती थी कि वह निष्पक्षता के साथ अपने कार्यों का संपादन करेंगे। स्वामी दयानंद जी महाराज भारत की इसी प्रकार की न्यायिक व्यवस्था के पक्षधर थे।

न्यायिक व्यवस्था और धर्म

भारत की वैदिक संस्कृति धर्म प्रेमी संस्कृति है। धर्म की रक्षा हो और धर्म से लोग रक्षित हों, ऐसा प्रयास राजकीय स्तर पर किया जाना आवश्यक है। संपूर्ण राजनीति अपना राजधर्म निर्वाह करते हुए धर्म की रक्षा के लिए ही कार्य करेगी ,ऐसी सोच और ऐसा चिंतन हमारे राजनीति शास्त्रियों का प्राचीन काल से रहा है। यदि धर्म अर्थात नैतिकता अथवा जीवन के सभी पवित्र कर्तव्यों को विस्मृत कर हम जीवन को रूखा सूखा बना लेंगे तो ऐसा जीवन जीवन ना होकर नरक बन जाएगा। धर्म की पवित्रता से ही जीवन की पवित्रता बनती है। जीवन को उत्कृष्टता में ढालने के लिए धर्म का अनुगामी होना पड़ेगा। यदि धर्म को मार दिया अथवा धर्म से मुंह फेर लिया अथवा धर्म को जीवन से निकाल दिया तो समझ लेना कि ऐसी स्थिति हमारे लिए अत्यंत खतरनाक होगी। स्वामी दयानंद जी महाराज इस बात का समर्थन करते हुए सत्यार्थ प्रकाश में लिखते हैं कि “मारा हुआ धर्म मारने वाले का नाश और रक्षित किया हुआ धर्म रक्षक की रक्षा करता है, इसलिये धर्म का हनन कभी न करना इस डर से कि मारा हुआ धर्म कभी हम को न मार डाले।”

आजकल लोग धर्म को निजी मामला कहकर उसे जीवन से निकालने के लिए उपदेश देते हुए दिखाई देते हैं। राजनीति को तो धर्म से नितांत दूरी बनाकर रहने की शिक्षा तथाकथित धर्मनिरपेक्षतावादी देते दिखाई देते हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में धर्म के विरुद्ध लेख लिखे जाते हैं। चारों ओर धर्म की उपेक्षा दिखाई देती है और धर्म के विरुद्ध आचरण होता हुआ दिखाई देता है। यही कारण है कि सर्वत्र अशांति और अराजकता का परिवेश व्याप्त हो गया है। हमारे देश में शूद्र इस समय एक ऐसे व्यक्ति को माना जाता है जो किन्ही विशिष्ट जातियों से संबंध रखता है। यद्यपि हमारे प्राचीन साहित्य में ऋषि मुनि उन लोगों को शूद्र कहते थे जो धर्म से मुंह फेर लेते थे और अधर्म के कार्यों में लग जाते थे। स्वामी जी महाराज ने इस संबंध में व्यवस्था दी है कि जो सब ऐश्वर्यों के देने और सुखों की वर्षा करने वाला धर्म है उस का लोप करता है उसी को विद्वान् लोग वृषल अर्थात् शूद्र और नीच जानते हैं। इसलिये किसी मनुष्य को धर्म का लोप करना उचित नहीं।

भारत नचिकेता का देश है

हमने नचिकेता और यम आचार्य का संवाद सुना है। जब नचिकेता आचार्य यम के द्वार पर पहुंचा तो उसने तीन वर अपने आचार्य से मांगे थे। नचिकेता ने तीसरे वर के माध्यम से आचार्य से प्रार्थना की कि वह आत्मा के स्वरूप को बताएं। जिसे वह जानना चाहता है। इस पर आचार्य यम न उसकी आत्मा की पवित्रता की परीक्षा लेने के दृष्टिकोण से पहले उसे कई प्रकार के प्रलोभन दिए । कहा कि नचिकेता ! तू कोई और वर मांग ले, पर इस प्रकार आत्मा को जानने के लिए आग्रह न कर। सैकड़ों वर्ष की आयु वाले पुत्र और पौत्र मांग ले । बहुत से हाथी, घोड़े, सोना, चांदी, लंबी चौड़ी भूमि और अपनी यथेचछ लंबी आयु मांग ले। पर इस प्रकार के आग्रह को छोड़ दे। इस पर नचिकेता ने कहा कि मुझे आप जैसा बताने वाला दूसरा आचार्य भला और कहां मिलेगा और न इसकी तुलना का कोई वर मेरे लिए हो सकता है। अतः यदि बताना ही चाहते हो तो मेरे इसी गूढ़ रहस्य को सुलझाइए और इसी के बारे में बताइए। संसार के जितने भर भी आकर्षण आपने गिनाए हैं यह सारे के सारे क्षणभंगुर हैं। यह सारे के सारे भोग समस्त इंद्रियों के तेज को नष्ट कर देते हैं । मैं यह भी जानता हूं कि यह जीवन भी बहुत छोटा है। अतः यह हाथी ,घोड़े और नृत्य संगीत अपने पास ही रखिए। मेरा मन इनसे ऊब चुका है।
कहने का अभिप्राय है कि हमें संसार के आकर्षणों से मुक्त होकर नचिकेता बनना पड़ेगा। जो नचिकेता बन गया वह संसार से मुक्त हो गया। तब संसार के आकर्षण और संसार के बंधन उस पर कोई प्रभाव नहीं डालते। भारत देश नचिकेता का देश है। यह उन नचकइयों का देश नहीं है जो चौबीसों घंटे शरीर नाश और इंद्रियों के तेज के नाश के कार्यों में लगे रहते हैं। यदि राजनीति में तेज के नाश करने वाले लोग प्रवेश करते रहेंगे तो जितेंद्रिय लोगों का वहां टिकना कठिन हो जाएगा।

धर्मात्मा लोग ही बनें देश के प्रतिनिधि

इस व्यवस्था के आलोक में हमको अपनी राजनीति को भी धर्म संगत बनाना चाहिए। जब राजनीति सध जाएगी तो सारा संसार सध जाएगा। राजनीति में लगे लोग यदि धर्मानुरागी होंगे, धर्म प्रेमी धर्मात्मा होंगे तो वे संपूर्ण धरती को धारण करने की क्षमता प्राप्त कर लेंगे, जिससे सर्वत्र शांति और सद्भाव का वातावरण व्याप्त हो जाएगा। देश की राजसभा और न्याय सभाओं में धर्मात्मा, धर्म प्रेमी लोगों को ही स्थान मिलना चाहिए। ऐसे लोगों की उपस्थिति से ही धर्म और लोक की रक्षा होना संभव है।
स्वामी दयानंद जी महाराज इस संबंध में व्यवस्था देते हैं कि :-
“जब राजसभा में पक्षपात से अन्याय किया जाता है तो वहां अधर्म के चार विभाग हो जाते हैं ,उनमें एक अधर्म के कर्त्ता, दूसरा साक्षी, तीसरा सभासदों और चौथा पाद अधर्मी सभा के सभापति राजा को प्राप्त होता है।”
तनिक कल्पना कीजिए कि जब राजसभा में ,देश के विधान मंडलों में, संसद या प्रदेशों की विधानसभाओं में देश के हितों के विपरीत आचरण करने वाले जनप्रतिनिधि बैठे हों और धारा 370 जैसे संविधान के उन देश विरोधी प्रावधानों का समर्थन करते हों,जिनसे देश में आग लगती हो या वे किसी ऐसी ही व्यवस्था के समर्थन में नारे लगाते हों या काम करते हों, जिनसे देश के विभाजन की या टूटने की या देश की संप्रभुता की रक्षा सुरक्षा को खतरा पैदा हो तो ऐसा आचरण करने वाले जनप्रतिनिधि किस श्रेणी के होंगे ? और उनकी उपस्थिति में धर्म किस प्रकार कराहता होगा ? जो धर्म की रक्षा नहीं कर सकते या जिनकी उपस्थिति में धर्म रोने के लिए विवश हो जाता है जो कभी देश के रक्षक नहीं हो सकते। आजकल अनेक प्रकार की चर्चाओं में यह सुनने को अक्सर मिलता है कि हमें किसी से देशभक्ति का प्रमाण पत्र नहीं चाहिए। हम कह रहे हैं कि हमें किसी को देशभक्ति का प्रमाण पत्र देना भी नहीं चाहिए पर जो लोग धर्म को रुलाते हैं वे देश के भक्षक ही होते हैं, इसके अतिरिक्त कुछ भी नहीं। देश के भक्षकों को आप क्या कहेंगे ? यह निर्णय हमने आप पर ही छोड़ा।

डॉ राकेश कुमार आर्य


मेरी यह पुस्तक डायमंड बुक्स नई दिल्ली के द्वारा प्रकाशित हुई है । जिसका अभी हाल ही में 5 अक्टूबर 2000 22 को विमोचन कार्य संपन्न हुआ था। इस पुस्तक में सत्यार्थ प्रकाश के पहले 7 अध्यायों का इतिहास के दृष्टिकोण से विश्लेषण किया गया है। पुस्तक में कुल 245 स्पष्ट हैं। पुस्तक का मूल्य ₹300 है।
प्रकाशक का दूरभाष नंबर : 011 – 407122000।

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