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हमारा दिव्य लक्ष्य क्या होना चाहिए?

जब कोई व्यक्ति अपनी गौरवशाली सम्पदा का प्रयोग उचित प्रकार से करता है और उपभोक्तावाद से ऊपर उठ जाता है तो क्या होता है? हमारा दिव्य लक्ष्य क्या होना चाहिए? क्या सर्वोच्च दिव्यता हमारे दिव्य लक्ष्यों में हमारी सहायता करती है? अध ते विश्वमनु हासदिष्टय आपो निम्नेव सवना हविष्मतः। यत्पर्वते न समशीत हर्यत इन्द्रस्य वज्रः […]

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ओ३म् “वेद और आर्यसमाज देश व समाज की प्रमुख सम्पत्ति व शक्ति हैं”

============= आर्यसमाज का अस्तित्व वेद पर आधारित है। वेद ईश्वरीय ज्ञान और सब सत्य विद्याओं का पुस्तक है। वेद ज्ञान व विज्ञान से युक्त व इनके सर्वथा अनुकूल है। वेद विद्या के ग्रन्थ हैं। वेद में अन्य ग्रन्थों के समान, कहानी किस्से व किसी आचार्य व मत प्रवर्तक के उपदेश नहीं हैं अपितु वेदों में […]

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धर्म का उद्गम स्थल क्या है?

#डॉविवेकआर्य स्वामी रामतीर्थ के इस कथन की भारत में गंगा पवित्र नदी है से प्रभावित होकर एक अमेरिकी महिला भारत जब कोलकाता आई तो गंगा की हालत को देखकर उसे स्वामी जी के कथन पर विश्वास न हुआ। उसने स्वामी जी से इस शंका का समाधान पूछा तो स्वामी जी ने बताया की गंगा के […]

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● यह सब गड़बड़ घोटाला प्रभु के स्वरूप को ठीक से न समझने के कारण ही हुआ है ●

पण्डित शिवकुमार शास्त्री (भूतपूर्व संसद्-सदस्य) परमात्मा सर्वशक्तिमान्, सर्वव्यापी और अन्तर्यामी है, अतएव यह निराकार है। हेतु यह है कि साकार वस्तु सीमाबद्ध रहेगी और जो चीज सीमित होगी उसके गुण और कर्म भी सीमित ही रहेंगे । जिसकी शक्ति सीमा में होगी वह सर्वशक्तिमान् कैसे हो सकता है? यह ठीक है कि प्रत्येक निराकार सर्वशक्तिमान् […]

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वैदिक विवेक के साथ जीने वाला व्यक्ति समाज के लिए क्या कर सकता है?

जीवन का अन्तिम लक्ष्य क्या है? एष प्र पूर्वीरव तस्य चम्रिषोऽत्यो न योषामुदयंस्त भुर्वणिः। दक्षं महे पाययते हिरण्ययं रथमावृत्या हरियोगमृभ्वसम्।। ऋग्वेद मन्त्र 1.56.1 (एषः) वह, दाता तथा इन्द्रियों का नियंत्रक (प्र – उदयंस्त से पूर्व लगाकर) (पूर्वीः) पूर्ण रूप से (अव – उदयंस्त से पूर्व लगाकर) (तस्य) उसके लिए (परमात्मा की अनुभूति के लिए) (चम्रिषः) […]

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🌷ओ३म् जप से एकाग्रता और विघ्नों का नाश🌷

‘योगदर्शन’ में तो अतिशीघ्र मन की एकाग्रता प्राप्त करने का सरल सीधा साधन ओ३म् का जप और ओ३म् के अर्थ का चिन्तन बतलाया है। ‘योगदर्शन’ के समाधिपाद में लिखा है: तज्जपस्तदर्थभावनम् । ―(योगदर्शन १ । २८ ) ‘उस ओ३म् का जप और उस ओ३म् के अर्थभूत ईश्वर का पुन:-पुन: चिन्तन करना चाहिये।’ इस ओ३म् का […]

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वैदिक विवेक से परिपूर्ण जीवन के आधारभूत लक्षण क्या होते हैं?

कलियुगी जीवन का विनाशकारी उपभोक्तावाद क्या है? दानाय मनः सोमपावन्नस्तु तेऽर्वांचा हरी वन्दनश्रुदा कृधि।। यमिष्ठासः सारथयो य इन्द्र ते न त्वा केता आ दभ्नुवन्ति भूर्णयः।। ऋग्वेद मन्त्र 1.55.7 (दानाय) दान देने के लिए, कल्याण के लिए (मनः) मन (सोम पावन) शुभ गुणों, महान् दिव्य ज्ञान का पान करने वाला (अस्तु) हो (ते) आपका (अर्वांचा) अन्तर्मुखी […]

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वैदिक विवेक धारण करने वाला व्यक्ति किस प्रकार के जीवन का आनन्द लेता है?

वैदिक विवेक धारण करने वाला व्यक्ति किस प्रकार के जीवन का आनन्द लेता है? कलियुग में अपनी सम्पदा और ज्ञान का प्रयोग कैसे करें? अप्रक्षितं वसु बिभर्षि हस्तयोरषाळहं सहस्तन्वि श्रुतो दधे। आवृतासोऽ वतासो न कतृभिस्तनूषु ते क्रतव इन्द्र भूरयः।। ऋग्वेद मन्त्र 1.55.8 (अप्रक्षितम्) क्षय रहित, नाश न होने योग्य (वसु) सम्पदा (बिभर्षि) धारण करता है […]

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हमें सुनने के योग्य कौन बना सकता है? परमात्मा के विस्तृत ज्ञान और गतिविधियों को अनुसरण करने का क्या उद्देश्य है?

हमें सुनने के योग्य कौन बना सकता है? परमात्मा के विस्तृत ज्ञान और गतिविधियों को अनुसरण करने का क्या उद्देश्य है? ज्ञान, कर्म और उपासना का दिव्य पथ क्या है? स हि श्रवस्युः सदनानि कृत्रिमा क्ष्मया वृधान ओजसा विनाशयन्। ज्योतींषि कृण्वन्नवृकाणि यज्यवेऽव सुक्रतुः सर्तवा अपः सृजत्।। ऋग्वेद मन्त्र 1.55.6 (सः) वह (हि) केवल (श्रवस्युः) हमें […]

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भिक्षा फलीभूत*

स्टोरी -डॉ डी के गर्ग –५। ५ । २०२४ * चुनाव का बिगुल बज चुका है, नेताओं ने अपनी अपनी तरह से शतरंज की बिसात बिछा दी है,मुद्दे गर्म है, जनता और देश के विकास के लिए नेता अपने बिलों से निकलकर सड़क पर आ गए हैं और घर घर जाकर हाथ जोड़कर सेवा का […]

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