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आज का चिंतन

ओ३म् “पापों में वृद्धि का कारण ईश्वर द्वारा जीवों को प्राप्त स्वतन्त्रता का दुरुपयोग”

============= संसार में मनुष्य पाप व पुण्य दोनों करते हैं। पुण्य कर्म सच्चे धार्मिक ज्ञानी व विवेकवान् लोग अधिक करते हैं तथा पाप कर्म छद्म धार्मिक, अज्ञानी, व्यस्नी, स्वार्थी, मूर्ख व ईश्वर के सत्यस्वरूप से अनभिज्ञ लोग अधिक करते हैं। इसका एक कारण यह है कि अज्ञानी लोगों को कोई भी बहका फुसला सकता है। […]

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ओ३म् “स्वस्थ मन सभी भौतिक एवं आध्यात्मिक उन्नतियों का आधार है”

=========== सामान्य मनुष्य आज तक अपनी आत्मा के अन्तःकरण में विद्यमान एवं कार्यरत मन, बुद्धि, चित्त एवं अहंकार उपकरणों को यथावत् रूप में नहीं जान पाया है। मनुष्य को मनुष्य उसमें मन नाम का एक करण होने के कारण कहते हैं जो संकल्प विकल्प व चिन्तन-मनन करता है। मनुष्य का मन आत्मा का करण है […]

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हमें दिव्य संगति कैसे प्राप्त हो सकती है?

हमें दिव्य संगति कैसे प्राप्त हो सकती है? हमें दिव्य संगति क्यों प्राप्त करनी चाहिए? होतारं सप्त जुह््वो३ यजिष्ठं यं वाघतो वृृणते अध्वरेषु। अग्निं विश्वेषामरतिं वसूनां सपर्यामि प्रयसा यामि रत्नम््।। ऋग्वेद मन्त्र 1.58.7 (कुल मंत्र 680) (होतारम्) पदार्थों का लाने वाला और स्वीकार करने वाला (सप्त) सात (जुह््वः) ज्ञान की आहुतियाँ देता है (यजिष्ठम्) आह्वान […]

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ईश्वर की सबसे बड़ी कृपा क्या हैं?

ईसाई- पाप क्षमा करना मुस्लमान- जन्नत और हूरें प्रदान करना पौराणिक हिन्दू- अवतार लेकर दुःख दूर करना वैदिक धर्मी- पुरुषार्थ के लिए बुद्धि प्रदान करना प्रिय मित्रों ईश्वर हमारे ऊपर अनेक उपकार करते हैं। विभिन्न विभिन्न मत मतान्तर अपनी अपनी मान्यता के अनुसार ईश्वर की कृपा का होना मानते हैं। वैसे तो सत्कर्म करने के […]

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सर्वोच्च चेतना में जीवन कैसे जीयें?

एक अग्नि पुरुष की तरह किसको दिव्य जीवन प्राप्त होता है? दधुष्द्वा भृृगवो मानुषेष्वा रयिं न चारुं सुहवं जनेभ्यः। होतारमग्ने अतिथिं वरेण्यं मित्रं न शेवं दिव्याय जन्मने ।। ऋग्वेद मन्त्र 1.58.6 (Total verse 679) (दधुः – आ दधुः) पूर्ण रूप से धारण करता है (त्वा) आपको (भृृगवः) ज्ञान में परिपक्व (मानुषेषु) मनुष्यों में (आ – […]

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ओ३म् “पापों में वृद्धि का कारण ईश्वर द्वारा जीवों को प्राप्त स्वतन्त्रता का दुरुपयोग”

============= संसार में मनुष्य पाप व पुण्य दोनों करते हैं। पुण्य कर्म सच्चे धार्मिक ज्ञानी व विवेकवान् लोग अधिक करते हैं तथा पाप कर्म छद्म धार्मिक, अज्ञानी, व्यस्नी, स्वार्थी, मूर्ख व ईश्वर के सत्यस्वरूप से अनभिज्ञ लोग अधिक करते हैं। इसका एक कारण यह है कि अज्ञानी लोगों को कोई भी बहका फुसला सकता है। […]

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ओ३म् “पापों में वृद्धि का कारण ईश्वर द्वारा जीवों को प्राप्त स्वतन्त्रता का दुरुपयोग”

============= संसार में मनुष्य पाप व पुण्य दोनों करते हैं। पुण्य कर्म सच्चे धार्मिक ज्ञानी व विवेकवान् लोग अधिक करते हैं तथा पाप कर्म छद्म धार्मिक, अज्ञानी, व्यस्नी, स्वार्थी, मूर्ख व ईश्वर के सत्यस्वरूप से अनभिज्ञ लोग अधिक करते हैं। इसका एक कारण यह है कि अज्ञानी लोगों को कोई भी बहका फुसला सकता है। […]

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ओ३म् “परम दयालु, कृपालु और हमारा हितैषी परमेश्वर”

============ यदि हम विचार करें कि संसार में हमारे प्रति सर्वाधिक प्रेम, दया, सहानुभूति कौन रखता है, कौन हमारे प्रति सर्वाधिक सम्वेदनशील, हमारे सुख में सुखी व दुःख आने पर उसे दूर करने वाला, हमारे प्रति दया, कृपा व हित की कामना करने वाला है, तो हम इसके उत्तर में अपने माता-पिता, आचार्य और परमेश्वर […]

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🌿🌹ईश्वरोपासना🌹🌿

🌿🌿🌿🌿ओ३म्🌿🌿🌿🌿 🌺🌼🌹🌿🌻🌺🌼🌹🌻🌺 क्या शरीर की पुष्टि ही जीवन का लक्ष्य है? पौष्टिक आहार, व्यायाम और संयम द्वारा मनुष्य को अपना शरीर तो पुष्ट करना ही चाहिए, परन्तु इसी की पुष्टि मात्र ही जीवन का लक्ष्य नहीं है। भर्तृहरि जी महाराज ने शरीर की स्थिति का बहुत सुन्दर शब्दों में चित्रण किया है― यदा मेरु: श्रीमान्निपतति […]

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ओ३म् “जीवात्मा के भीतर व बाहर व्यापक परमात्मा को जानना हमारा मुख्य कर्तव्य”

=========== संसार में अनेक आश्चर्य हैं। कोई ताजमहल को आश्चर्य कहता है तो कोई लोगों को मरते हुए देख कर भी विचलित न होने और यह समझने कि वह कभी नहीं मरेगा, इस प्रकार के विचारों को आश्चर्य मानते हैं। हमें इनसे भी बड़ा आश्चर्य यह प्रतीत होता है कि मनुष्य स्वयं को यथार्थ रूप […]

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