आजकल देश में ‘असहिष्णुता’ कुछ अधिक ही चर्चा में है। ‘असहिष्णुता’ को लेकर यदि बात राजनीति की की जाए, तो यहां भी ‘असहिष्णुता’ का अपना ही इतिहास है। 1980 के बाद राजनीतिक ‘असहिष्णुता’ अधिक बढ़ी। कभी-कभी तो यह राजनीतिक अस्पृश्यता के रूप में भी देखी गयी। 1980 इंदिरा गांधी जब दोबारा प्रधानमंत्री बनीं तो विपक्ष […]
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राजनीतिक बयानबाजियों का गिरता स्तर
राजनीति में वर्तमान दौर सचमुच गिरावट का दौर है, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी राजनीतिक बयानबाजियों को एक गरिमा तक बांधे रखने में असफल रहे हैं। उन्होंने 2014 के लोकसभा चुनाव में ‘मां-बेटे की सरकार’ कहकर सोनिया और राहुल गांधी पर खूब व्यंग्य कसे थे, बाद में ऐसे व्यंग्य कसना और भाषण में कड़वाहट घोलना उनकी स्वयं […]
पारदर्शिता से भागते राजनीतिक दल
पीयूष द्विवेदी यूँ तो देश के सभी राजनीतिक दल पारदर्शिता की बातें करने में एक से बढक़र एक हैं, लेकिन जब उनके खुद पारदर्शी होने की बात आती है तो वे तरह-तरह के कुतर्क गढक़र इससे बचने की कवायद करने लगते हैं। गौर करें तो आज से लगभग दो वर्ष पहले केन्द्रीय सूचना आयोग द्वारा […]
बाज आएं राजनीतिक दल जातिवाद की सियासत से
जातिगत जनगणना के आंकड़ों की आड़ में हो रही राजनीति के बीच केंद्रीय वित्तमंत्री ने यह स्पष्ट करके अच्छा किया कि राज्यों को ये आंकड़े पहले ही भेजे जा चुके हैं और वे जातियों-उपजातियों, गोत्रों आदि के असमंजस को दूर कर दें तो फिर तर्कसंगत वर्गीकरण का काम शुरू हो। यह काम ‘नीति आयोग की […]