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डॉ राकेश कुमार आर्य की लेखनी से

राजनीतिक असहिष्णुता

आजकल देश में ‘असहिष्णुता’ कुछ अधिक ही चर्चा में है। ‘असहिष्णुता’ को लेकर यदि बात राजनीति की की जाए, तो यहां भी ‘असहिष्णुता’ का अपना ही इतिहास है। 1980 के बाद राजनीतिक ‘असहिष्णुता’ अधिक बढ़ी। कभी-कभी तो यह राजनीतिक अस्पृश्यता के रूप में भी देखी गयी। 1980 इंदिरा गांधी जब दोबारा प्रधानमंत्री बनीं तो विपक्ष ने उनके प्रति और उन्होंने विपक्ष के प्रति असहिष्णुतापूर्ण अस्पृश्यता का प्रदर्शन किया। उनकी हत्या के पश्चात जब राजीव गांधी देश के प्रधानमंत्री बने तो उनके पास राजनीतिक अनुभव की कमी थी, इसलिए अच्छे व्यक्ति होकर भी वह अच्छे राजनीतिज्ञ नही बन पाए, उन्हें अभी कुछ सीखना था लेकिन विधि के विधान ने उन्हें देश का प्रधानमंत्री बना दिया।

राजीव गांधी के पश्चात 1989 में राष्ट्रीय मोर्चे की सरकार बनी, इस सरकार के प्रति इसके सहयोगी दलों ने ही ‘असहिष्णुता’ का प्रदर्शन किया। प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह ने इसी समय मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने का निर्णय ले लिया था जिससे लोगों ने भी उनके प्रति ‘असहिष्णुता’ का प्रदर्शन किया। भाजपा इसी समय ‘कमंडल’ की राजनीति पर आ गयी थी, उसकी इस राजनीति के प्रति देश के एक वर्ग में और राजनीति ने भी ‘असहिष्णुता’ का वातावरण बनता देखा गया। वी.पी. सिंह के पश्चात चंद्रशेखर देश के प्रधानमंत्री बने, लेकिन उन्हें जिस कांग्रेस ने प्रधानमंत्री बनाया था उसी ने उनके प्रति ‘असहिष्णुता’ का प्रदर्शन आरंभ कर दिया। 1991 में नरसिंहाराव देश के प्रधानमंत्री बने तो उन्हें भी कांग्रेस ने उन्हें ‘असहिष्णुता’ पूर्ण सहयोग प्रदान किया। वह कांग्रेसियों के लिए अस्पृश्य भी बने रहे। कांग्रेसियों को उनके साथ बैठना बुरा लगता था और मैडम सोनिया से बात करके उन्हें अधिक संतुष्टि मिलती थी। 1996 में गठित संयुक्त मोर्चे की सरकार ने पहले देवेगोड़ा प्रधानमंत्री बने और अप्रैल 1997 में आई.के. गुजराल को प्रधानमंत्री बनाया गया। जब देवेगोड़ा को कुर्सी से खींच-खींचकर उन्हीं के साथी उन्हें सत्ता से हटा रहे थे, तो वह संसद में बड़ी असहाय मुद्रा में अपने प्रति ‘असहिष्णुता’ दिखा रहे अपने ही साथियों से पूछते जा रहे थे कि आखिर उनका दोष क्या है? उन्हें सत्ता से क्यों हटाया जा रहा है? राजनैतिक ‘असहिष्णुता’ का शिकार आई. के. गुजराल भी बने और उन्हें भी समय से पूर्व ही चलता कर दिया गया, इसके पश्चात अटल बिहारी वाजपेयी देश के प्रधानमंत्री बने, उन्हें पहली बार तेरह दिन के लिए और फिर तेरह महीने के लिए जब सरकार बनाते देखा गया तो यह सबको पता है कि उनके प्रति किस स्तर की राजनैतिक ‘असहिष्णुता’ का प्रदर्शन किया गया था। जो लोग आज उन्हें ‘भीष्म पितामह’ कहते हैं उन्होंने ही उस समय उनके प्रति ‘असहिष्णुता’ और अस्पृश्यता का घृणास्पद प्रदर्शन किया था। यह ठीक है कि वह अपने बुद्घि कौशल से अपना तीसरा कार्यकाल पूर्ण कर गये, परंतु अकारण ही उन्हें परेशान करने के कई अवसर ऐसे आए जब राजनीतिज्ञों को देखकर यह कहा जा सकता था कि ये लोग राजनीतिज्ञ न होकर एक दूसरे के शत्रु हो गये हैं।

2004 में यूपीए की सरकार बनी। उसके पश्चात 2009 में यूपीए द्वितीय की सरकार बनी। इस दौरान भला हो बेचारे मनमोहन सिंह का जिन्हेांने मौन रहकर अपने दस वर्ष काट दिये। अन्यथा उनकी टांग खींचने में भी लोगों ने लगभग शत्रुता की सीमा तक जाकर जोर लगाया। जिन लोगों को मनमोहन सिंह के सत्ता से हटने केे पश्चात अपने अच्छे दिन आने की आशा थी उनकी अपेक्षाओं के विपरीत मैदान मोदी के हाथों चला गया। सिरों की गिनती का आंकड़ा भी ऐसा बना कि उसे भी बिगाड़ नही सकते थे, इसलिए अब राजनैतिक ‘असहिष्णुता’ का प्रदर्शन संसद और संसद के बाहर दोनों स्थानों पर हो रहा है। 1980 के दशक के पश्चात भारतीय राजनीति और संसदीय लोकतंत्र के मूल्यों में निरंतर हृास की प्रक्रिया इस समय अपने निम्नतम बिंदु पर है। राष्ट्रीय मूल्य क्या हो सकते हैं, राष्ट्र के प्रति हमारे दायित्व क्या हो सकते हैं, राष्ट्रीय मुद्दों के दृष्टिगत किसी भी प्रकार के तुष्टिकरण और जातीय या साम्प्रदायिक आरक्षण को किसलिए हाशिये पर धकेल दिया जाए? इन जैसे सभी बिंदुओं पर हम एक मत होते राजनीतिज्ञों को न देखकर उनकी ‘श्वानवृत्ति’ को ही देख रहे हैं। जिससे उनके हर कार्य में निज बंधुद्रोह स्पष्ट झलक रहा है। इसे भी लोग राजनीतिक विवशताएं और आवश्यकताएं बताकर उपेक्षित करने का प्रयास कर रहे हैं। जबकि यह प्रवृत्ति राष्ट्र की एकता और अखण्डता के दृष्टिगत हमारे लिए बहुत ही खतरनाक है। हमें इससे सावधान रहने की आवश्यकता है।

जब देश की ऐसी परिस्थितियां बनी हों तो उस समय हमारे लेखकों, राष्ट्रचिंतकों और राष्ट्र प्रचेताओं का विशेष दायित्व बन जाता है कि वह सक्रिय हों और भटकती हुई राजनीति और खटकती हुई ‘असहिष्णुता’ को सही मार्ग पर लाने के लिए विशेष कार्य करके दिखाएं। लेकिन यहां दूसरा कार्य हो रहा है-‘केवल वाहवाही लेने के लिए कुछ लोग साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटा रहे हैं। आरएसएस ने यह सही कहा है कि ऐसे लोग स्वयं ‘असहिष्णुता’ की बीमारी से ग्रस्त हैं। किसी प्रकार का आंदोलन खड़ा करना और प्रत्येक व्यक्ति के लिए समान नागरिक संहिता को लागू कराने के लिए पूरे देश में जन-जागरण अभियान चलाना साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने से बड़ी बात हो सकती है। परंतु इस ‘बड़ी बात’ के लिए बड़े साहस और बड़े पुरूषार्थ की आवश्यकता है। उससे बचकर केवल विरोध के लिए विरोध व्यक्त कर देना कहां की समझदारी है? देश इस समय विरोध के लिए विरोध को झेलने के लिए तैयार नही है, देश चाहता है कि उसकी सामासिक संस्कृति और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की लोकोपकारी संस्कृति की रक्षा कैसे हो? जितने लोग साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटा रहे हैं, उन्हें देखकर किसी के लिए यह नही कहा जा सकता कि वह भारत की सामासिक संस्कृति और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की लोकोपकारी संस्कृति की भावना की रक्षा के लिए आगे आएगा। वैसे हमारा मानना है कि हम आज गिरावट के जिस बिंदु पर खड़े हैं उसके लिए देश में बढ़ी राजनैतिक असहिष्णुता ही सबसे अधिक उत्तरदायी है।

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