विश्वनाथ सचदेव देश की विदेशमंत्री पर एक ‘भगोड़े अपराधी’ की सहायता का आरोप लगा है; एक राज्य की मुख्यमंत्री भी आरोपों के घेरे में है; एक पश्चिमी राज्य के चार मंत्री कथित घोटालों के विवादों में घिरे हैं; एक अन्य राज्य में परीक्षाओं को लेकर चल रहे विवाद की आंच से सरकार झुलस रही है- […]
Month: August 2015
वर्षा शर्मा लाल, पीला, हरा और न जाने कितने रंग, यह सभी हमारे जीवन का एक अटूट हिस्सा हैं। मानव जीवन में रंगों का विशेष महत्व होता है। हर रंग के साथ एक विश्वास जुड़ा होता है और प्रत्येक रंग किसी न किसी भाव-विशेष का सूचक होता है। हममें से बहुत से लोग ऐसे होते […]
मनमोहन सिंह आर्य जीवन में जानने योग्य कुछ प्रमुख सूत्रों की यदि चर्चा करें तो इनमें प्रथम ‘सब सत्य विद्या और जो पदार्थ विद्या से जाने जाते हैं, उनका सब का आदि मूल परमेश्वर है’ सिद्धान्त को सम्मलित किया जा सकता है। इस सिद्धान्त का संसार में जितना प्रचार अपेक्षित है, उतना नहीं हुआ। यह […]
प्रमोद भार्गव इसी साल जून माह में भारत और बांग्लादेश के बीच हुए भूमि समझौते पर शांतिपूर्ण अमल हो गया। दोनों देशों के 51 हजार नागरिकों को एक देश और उसकी नागरिक पहचान मिल गई है। इस दृष्टि से इन नागरिकों को शनिवार की सुबह उम्मीद की नई किरण के साथ फूटी है। शुक्रवार की […]
मृत्युंजय दीक्षित जैसी की संभावना व आशंका व्यक्त की जा रही थी कि संसद का मानसून सत्र हंगामें की भेंट चढ़ जायेगा ठीक वैसा ही हो रहा है। विदेश यात्रा से लौटकर आने के बाद कांग्रेसी युवराज राहुल गांधी ने कांग्रेस की राजनीति को पटरी पर लाने के लिए मोदी सरकार पर एक के बाद […]
जब आंधी आती है तो उसमें आम बहुत झड़ जाते हैं। इन ‘आंधी के आमों’ की बाजार में कीमत भी गिर जाती है। लोग उन्हें खरीदते नही हैं, अपितु दुकानदार कम से कम मूल्य करके उन्हें अपने ग्राहकों से खरीदवाता है। ऐसा ही हमारे सांसदों के अथवा जनप्रतिनिधियों के साथ होता है। जब किसी पार्टी […]
बोल सको तो विटप भी बोलो, कहां गये तुम्हारे पात?आता पतझड़ धरती पर क्यों, उसे कौन बुलाने जाता है? सजी संवारी धरती के, सारे गहने ले जाता है।दुल्हन धरती को विधवा कर, तू जरा तरस नही खाता है।लगता बसंत रोता गम में, जब मेघ बरसता आता है। मेघ गर्जना बसंत का गुस्सा, है चपला भी […]
मांसाहारियों को काफी हद तक उनके भोजन से पोषक तत्वों की पूर्ति हो जाती हैं। लेकिन इस मामले में कई बार शाकाहारी पीछे छूट जाते हैं। कई ऐसे पोषक तत्वों की इनमें कमी पाई जाती है। ऐसा नहीं है कि शाकाहारी भोजन से पूर्ण पोषण नहीं पा सकते, बस जरूरत होती है अपने भोजन को […]
कहा जाता है कि विकास केवल स्वतंत्र और पारदर्शी माहौल में ही संभव है। शैक्षिक और अकादमिक जगत के लिए भी यह सच है। शैक्षिक जगत में स्वतंत्रता और पारदर्शिता को केवल तभी कायम रखा जा सकता है, जब महत्वपूर्ण पदों पर चयन और नियुक्तियों में केवल और केवल योग्यता का खयाल रखा जाए और […]
लोकल कलाकारों के लुटने का मौसम आया
सुरेश कुमार जो हमारी संस्कृति को सहेजते हैं उन्हें हम कितना सम्मान देते हैं, कितना सस्ता समझते हैं और जो सिर्फ सीडी सुनाकर चलते बनते हैं, उनके लिए पलक पांवड़े बिछाते हैं। हैं तो ये भी कलाकार ही, फिर ये अपने ही घर में घर की मुर्गी दाल बराबर क्यों समझे जाते हैंज्समाचारों में ही […]