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मेरी नई पुस्तक : मेरे मानस के राम – अध्याय 9 : ऋषि अगस्त्य और जटायु से भेंट

ऋषि शरभंग के आश्रम के पश्चात श्री राम सुतीक्ष्ण ऋषि के आश्रम में पहुंचे। सायं काल को श्री राम ने संध्योपासन किया। तब महात्मा सुतीक्ष्ण ने सीता सहित राम लक्ष्मण को रात्रि में खाने योग्य पवित्र फल, मूल तथा अन्न आदि सत्कार पूर्वक स्वयं लाकर दिए। श्री राम ने आर्य वैदिक परंपरा का निर्वाह करते […]

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मेरी नई पुस्तक : मेरे मानस के राम – अध्याय 8 : महर्षि अत्रि और शरभंग के आश्रम में

श्री राम वन में रहते हुए सीता जी और लक्ष्मण जी के साथ चित्रकूट से आगे के लिए प्रस्थान करते हैं। वाल्मीकि जी कहते हैं कि चित्रकूट में रहते हुए श्री राम जी इस बात का अनुभव रह रहकर कर रहे थे कि इस स्थान पर मेरा भाई भरत, मेरी माताएं और नगरवासी उपस्थित हुए […]

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विशेष संपादकीय

मेरी नई पुस्तक : मेरे मानस के राम – अध्याय 7 : चरण पादुका लिए भरत अयोध्या लौट आए

भरत अपने भाई रामचंद्र जी की चरण पादुका लेकर वन से अयोध्या धाम लौट आए। तब उन्होंने फिर एक उदाहरण प्रस्तुत किया। उन्होंने निर्णय लिया कि जिस प्रकार उनके भाई रामचंद्र जी इस समय वनों में रह रहे हैं, वे स्वयं भी इसी प्रकार राज भवन से दूर नंदीग्राम में निवास करेंगे। वहां पर उन्होंने […]

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मेरी नई पुस्तक : मेरे मानस के राम – अध्याय 6 : भरत का वन के लिए प्रस्थान

अगले दिन भरत जी के राज्याभिषेक की तैयारी का आदेश वशिष्ठ जी की ओर से जारी हुआ। विधि के अनुसार विद्वानों ने भरत जी का मंगल गान करना आरंभ कर दिया। जब भरत की को इसकी जानकारी मिली तो वह अत्यंत दु:खी हुए । उन्होंने स्वयं ने उस मंगलगान को रुकवा दिया। तब उन्होंने वशिष्ठ […]

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मेरी नई पुस्तक : मेरे मानस के राम – अध्याय 5 : राम का वन गमन और भरत

जब रानी कैकेई ने हठ करते हुए अपने निर्णय से राजा दशरथ को अवगत कराया तो वह हतप्रभ रह गए। उन्हें जिस बात की आशंका थी, वही उनके सामने आ चुकी थी। इसके उपरांत भी कहीं ना कहीं वह मान रहे थे कि रानी इतनी निष्ठुर नहीं हो सकती, पर रानी ने सारी मर्यादाओं को […]

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मेरी नई पुस्तक : मेरे मानस के राम – अध्याय 4 : राम को युवराज बनाने की तैयारी

जिस समय रामचंद्र जी को युवराज बनाने का संकल्प उनके पिता दशरथ ने लिया, उस समय भरत अपने ननिहाल में थे। कई लोगों ने इस बात पर शंका व्यक्त की है कि जिस समय भरत ननिहाल में थे ,उसी समय राजा ने रामचंद्र जी को युवराज बनाने का संकल्प क्यों लिया? क्या राजा दशरथ को […]

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पुस्तक का नाम : मेरे मानस के राम अध्याय__ 3 , सीता स्वयंवर और भगवान परशुराम

अब अपने गुरु विश्वामित्र जी के साथ चलते हुए रामचंद्र जी अपने भाई लक्ष्मण के साथ जनकपुरी पहुंच गए। यहां पर गुरुवर विश्वामित्र जी को पता चला कि राजा जनक अपनी पुत्री सीता के विवाह को लेकर चिंतित हैं। उन्हें इस घटना की भी जानकारी हुई कि किस प्रकार सीता जी ने शिव जी के […]

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पुस्तक का नाम : मेरे मानस के राम : अध्याय 2 , विश्वामित्र जी और श्री राम

प्रत्येक काल में राक्षस प्रवृत्ति के लोग साधुजनों का अपमान और तिरस्कार करते आए हैं। इसका कारण केवल एक होता है कि ऐसे राक्षस गण साधु जनों के स्वभाव से ईर्ष्या रखते हैं। लोग साधुजनों को सम्मान देते हैं और राक्षसों का तिरस्कार करते हैं, यह बात राक्षसों को कभी पसंद नहीं आती। रामचंद्र जी […]

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भारतीय संस्कृति विश्वगुरू के रूप में भारत

पुस्तक का नाम : मेरे मानस के राम : अध्याय 1, गुण गण सागर श्री राम

मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम का जन्म त्रेता काल में हुआ। विद्वानों की मान्यता है कि जिस समय दशरथनंदन श्री राम का जन्म हुआ, उस समय त्रेतायुग के एक लाख वर्ष शेष थे। इस प्रकार अबसे लगभग पौने दस लाख वर्ष पहले मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम का आगमन हुआ। वह सद्गुणों के भंडार थे :- दशरथ […]

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मेरे मानस के राम 3 ( वाल्मीकि कृत रामायण का दोहों में अनुवाद )

राम की मूर्ति से संवाद इस प्रकार की अनेक घटनाएं हैं जब रामचंद्र जी ने अपने पराक्रम का प्रदर्शन करते हुए अधर्मी लोगों का विनाश किया। जब हम किसी मंदिर में जाएं और वहां पर रामचंद्र जी की मूर्ति को देखें तो उस मूर्ति से भी हमारा संवाद होना चाहिए। सचमुच वह हमसे बहुत कुछ […]

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