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मेरे मानस के राम , अध्याय 13 : सुग्रीव का राजतिलक

जब बाली का अंत हो गया तो उसकी मृत्यु की सूचना उसकी पत्नी तारा को प्राप्त हुई। तब वह विलाप करती हुई अपने पति के शव के पास आ पहुंची। तारा बहुत ही विदुषी महिला थी। उसे राजनीति का गहरा ज्ञान था। कूटनीति की वह महान पंडिता थी। उसने अपने पति को अपने भाई सुग्रीव […]

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मेरी नई पुस्तक : मेरे मानस के राम – अध्याय 12 : सुग्रीव से मित्रता और बालि वध

कबंध ने अपनी पराजय के पश्चात श्री राम और लक्ष्मण जी को यह बताया था कि यदि वह अपने मनोरथ में सफलता प्राप्त करना चाहते हैं तो उन्हें सुग्रीव नाम के वानर के साथ मित्रता करनी चाहिए। इंद्र पुत्र बाली ने क्रुद्ध होकर अपमानजनक ढंग से उसे राज्य से निकाल दिया है। वह वानर पंपा […]

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मेरे मानस के राम , अध्याय 11 : जटायु , अयोमुखी और कबंध

जिस समय लंका का राजा रावण सीता जी को वायु मार्ग से अपहरण करके ले जा रहा था उस समय सीता जी विलाप करुण चीत्कार करती हुई जा रही थीं। वह मार्ग में अपना कोई कीमती आभूषण या कोई वस्त्र भी नीचे डाल रही थीं। जिससे रामचंद्र जी और लक्ष्मण जी जब उन्हें खोजते हुए […]

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मेरे मानस के राम – अध्याय 10 : शूर्पनखा की नाक काटना और सीता हरण

इसी वन में रहते हुए लंका के रावण की बहन शूर्पनखा से श्री राम, सीता जी और लक्ष्मण जी का सामना होता है। एक दिन वह राक्षसिन स्वयं ही उनके आश्रम में आ पहुंचती है। वह श्री राम और लक्ष्मण को देखते ही उन पर आसक्त हो गई। तब वह काम भावना से प्रेरित होकर […]

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मेरी नई पुस्तक : मेरे मानस के राम – अध्याय 9 : ऋषि अगस्त्य और जटायु से भेंट

ऋषि शरभंग के आश्रम के पश्चात श्री राम सुतीक्ष्ण ऋषि के आश्रम में पहुंचे। सायं काल को श्री राम ने संध्योपासन किया। तब महात्मा सुतीक्ष्ण ने सीता सहित राम लक्ष्मण को रात्रि में खाने योग्य पवित्र फल, मूल तथा अन्न आदि सत्कार पूर्वक स्वयं लाकर दिए। श्री राम ने आर्य वैदिक परंपरा का निर्वाह करते […]

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मेरी नई पुस्तक : मेरे मानस के राम – अध्याय 8 : महर्षि अत्रि और शरभंग के आश्रम में

श्री राम वन में रहते हुए सीता जी और लक्ष्मण जी के साथ चित्रकूट से आगे के लिए प्रस्थान करते हैं। वाल्मीकि जी कहते हैं कि चित्रकूट में रहते हुए श्री राम जी इस बात का अनुभव रह रहकर कर रहे थे कि इस स्थान पर मेरा भाई भरत, मेरी माताएं और नगरवासी उपस्थित हुए […]

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विशेष संपादकीय

मेरी नई पुस्तक : मेरे मानस के राम – अध्याय 7 : चरण पादुका लिए भरत अयोध्या लौट आए

भरत अपने भाई रामचंद्र जी की चरण पादुका लेकर वन से अयोध्या धाम लौट आए। तब उन्होंने फिर एक उदाहरण प्रस्तुत किया। उन्होंने निर्णय लिया कि जिस प्रकार उनके भाई रामचंद्र जी इस समय वनों में रह रहे हैं, वे स्वयं भी इसी प्रकार राज भवन से दूर नंदीग्राम में निवास करेंगे। वहां पर उन्होंने […]

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मेरी नई पुस्तक : मेरे मानस के राम – अध्याय 6 : भरत का वन के लिए प्रस्थान

अगले दिन भरत जी के राज्याभिषेक की तैयारी का आदेश वशिष्ठ जी की ओर से जारी हुआ। विधि के अनुसार विद्वानों ने भरत जी का मंगल गान करना आरंभ कर दिया। जब भरत की को इसकी जानकारी मिली तो वह अत्यंत दु:खी हुए । उन्होंने स्वयं ने उस मंगलगान को रुकवा दिया। तब उन्होंने वशिष्ठ […]

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मेरी नई पुस्तक : मेरे मानस के राम – अध्याय 5 : राम का वन गमन और भरत

जब रानी कैकेई ने हठ करते हुए अपने निर्णय से राजा दशरथ को अवगत कराया तो वह हतप्रभ रह गए। उन्हें जिस बात की आशंका थी, वही उनके सामने आ चुकी थी। इसके उपरांत भी कहीं ना कहीं वह मान रहे थे कि रानी इतनी निष्ठुर नहीं हो सकती, पर रानी ने सारी मर्यादाओं को […]

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मेरी नई पुस्तक : मेरे मानस के राम – अध्याय 4 : राम को युवराज बनाने की तैयारी

जिस समय रामचंद्र जी को युवराज बनाने का संकल्प उनके पिता दशरथ ने लिया, उस समय भरत अपने ननिहाल में थे। कई लोगों ने इस बात पर शंका व्यक्त की है कि जिस समय भरत ननिहाल में थे ,उसी समय राजा ने रामचंद्र जी को युवराज बनाने का संकल्प क्यों लिया? क्या राजा दशरथ को […]

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