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विशेष संपादकीय

मेरी नई पुस्तक : मेरे मानस के राम – अध्याय 7 : चरण पादुका लिए भरत अयोध्या लौट आए

भरत अपने भाई रामचंद्र जी की चरण पादुका लेकर वन से अयोध्या धाम लौट आए। तब उन्होंने फिर एक उदाहरण प्रस्तुत किया। उन्होंने निर्णय लिया कि जिस प्रकार उनके भाई रामचंद्र जी इस समय वनों में रह रहे हैं, वे स्वयं भी इसी प्रकार राज भवन से दूर नंदीग्राम में निवास करेंगे। वहां पर उन्होंने अपने लिए उसी प्रकार की सुविधा लेना उचित माना , जिस प्रकार की सुविधाएं उनके भाई रामचंद्र जी को उस समय प्राप्त हो रही थीं अर्थात उन्होंने एक वनवासी के रूप में राज करना आरंभ किया।
भरत जी का यह निर्णय भी उनके महात्मा होने का प्रमाण है। वह यह भली प्रकार जानते थे कि सत्ता के बीच में रहकर व्यक्ति का मन विचलित हो सकता है। अतः उन्होंने यह उचित माना कि सत्ता को भोगकर भी सत्ता से दूर रहने का प्रबंध किया जाए। सत्ता उन्हें इसलिए भोगनी थी कि परिस्थितियां और भाई का आदेश ऐसा ही मिल गया था और सत्ता के रंग से उन्हें इसलिए दूर रहना था कि यह सत्ता उनकी ना होकर उनके भाई की थी, जिससे किसी भी प्रकार का लोभ या मोह उत्पन्न करना उचित नहीं था। वह आसक्ति से दूर रहकर भक्ति की आगोश में डूबे रहना चाहते थे। अतः जब कभी आसक्ति और भक्ति में से किसी एक को चुनने का अवसर आपके जीवन में आए तो भरत की भांति भक्ति को चुनना,आसक्ति को नहीं। क्योंकि आसक्ति मारती है और भक्ति भवसागर के पार लगाती है।
जब कोई ऐसा अवसर आए तो श्रद्धा बन जाना, स्वार्थी नहीं। श्रद्धा आपको संपन्नता और प्रसन्नता देगी और स्वार्थ आपको इनसे वंचित कर देगा।
भरत की भांति भाई की चरण पादुका लेकर चलोगे तो संसार में महानता की मिसाल बन जाओगे और यदि सत्ता स्वार्थ में अंधे होकर चरण पादुका के साथ-साथ भाई के पैरों को काटोगे तो दारा के भाई ‘ औरंगजेब ‘ बन जाओगे। चुनना आपको है कि आप ‘ भरत ‘ बनना चाहते हैं या फिर ‘ औरंगजेब ‘ बनना चाहते हैं ?

भरत जी का आचरण, करता मालामाल।
जीवन में अपनाइए , झुक जाएगा काल।।

भरत भाव का नाम है , भावों से भरपूर।
श्रद्धा का भी नाम है , कपट भाव से दूर।।

भरत भरे है भाव से , मानो मेरी बात।
अभिनंदन के योग्य है, जीवन की हर बात।।

अवध धाम में लौटकर, करी व्यवस्था ठीक।
स्वयं नंदीग्राम में, रहने लगे रघुवीर।।

जैसे भाई राम जी , रहते वन के बीच।
वैसे ही रहने लगे , स्वयं भरत रघुवीर।।

आदर्श ने आदर्श को , बना लिया आदर्श।
ऐसा इस संसार में , कहां मिले आदर्श।।

डॉ राकेश कुमार आर्य

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