हैदराबाद के जननायक हुतात्मा भाई श्री श्यामलालजी !

आधुनिक भारत के इतिहास में जन जागृति, नागरिक आधिकारों व धार्मिक स्वतंत्रता के लिए भाई श्री श्यामलालजी का नाम स्वर्ण अक्षरों में लिखा जायेगा | आपका जन्म सन १९०३ में भालकी नाम के छोटे से कस्बें में पं.भोलाप्रसादजी के घर हुआ था | भालकी कस्बा जिला बीदर के अंतर्गत है और अब यह जनपद कर्नाटक राज्य में है | भोलाप्रसदजी की पांच सन्ताने थी | तीन पुत्रियाँ व दो पुत्र | दो पुत्रियों का निधन हो गया | शेष तीन संतानों में श्याम भाई सबसे छोटे थे | बड़े भाई श्री पं.वंशीलालजी वकील के नाम से सम्पूर्ण आर्यजगत और निजाम राज्य की सारी प्रजा परिचित थी | इन दोनों भाइयों की चर्चा के बिना निजाम राज्य में जन जागृति व स्वाधीनता संघर्ष का इतिहास अधूरा ही रह जाता है |
श्री भोलाप्रसाद जी पक्के पौराणिक ब्राह्मण थे| शैवमत अनुयायी थे | उन्हें हिन्दी और मराठी का सामान्य सा ज्ञान था | निर्धन परन्तु तीक्ष्ण बुद्धि के सज्जन पुरुष थे | एक बार आप घर से बाहर कहीं गए हुए थे | पीछे घर में आग लग गयी | आपकी धर्मपत्नी ने सूझबूझ का परिचय देते हुए पूरे परिवार की रक्षा की | हालाँकि घर में जो थोड़ा बहुत समान था वो राख ही हो गया |
भोलाप्रसदजी कुछ समय ,में ही बच्चो को अनाथ छोड़कर चल बसे | श्यामलालजी की तपस्विनी माता ने पूरे पालन किया और परिवार का निर्माण किया | श्यामभाई का शरीर बाल्यकाल से निर्बल व रोग-ग्रस्त था| आपको कुष्ठ रोग था | दूरदर्शी माता ने ही आपको ये शिक्षा दी कि विवाह करके एक परायी कन्या का जीवन नष्ट करने अपेक्षा इस तन को देश-जाति की सेवा में लगा दो|
आपकी आरम्भिक शिक्षा भालकी में ही हुई | तब भालकी में प्राइमरी का सरकारी उर्दू स्कूल था | मराठी व हिन्दी की पढाई की निजाम राज्य में कोई सुविधा नही थी | भालकी में पढाई समाप्त करके भाईजी उदगीर अपनी बड़ी बहिन के पास आ गए | आगे चलकर भाई श्यामलालजी के पुरुषार्थ के कारण उदगीर निजाम राज्य में आर्यसमाज का मुख्य केन्द्र बन गया |
आपके एक मामा श्री गोकुलप्रसादजी वैदिक धर्मी बन गए थे | आप आर्यसमाज से उत्साही कार्यकर्ता थे|
गोकुलप्रसादजी ने अपने बड़े भांजे पं.वंशीलाल को आर्यसमाज की रंग में रंग दिया | पर श्यामलाल अपने
पैतृक संस्कारों व ग्राम के वातावरण के कारण पक्के शिवभक्त थे| श्री गोकुलप्रसाद जी ने इस प्रतिभा-संपन्न अपने छोटे भांजे को भी आर्यसमाजी बनाने के लिए हर सम्भव प्रयास किया | दोनों भाइयों में अब धार्मिक विषयों पर खूब चर्चा और वाद-विवाद होता, लड़ाई-झगड़ा, मारकुटाई भी होती | श्यामलाल १३ वर्ष के रहे होंगे जब मामा व भाई की कृपा से आप भी वैदिक धर्म की ओर प्रवृत हो गए|
श्री भोलाप्रसादजी एक जागीरदार के पास नौकरी करते थे | इस जागीरदार के सहयोग से दोनों भाई पानी शिक्षा पूरी कर सके | तब हैदराबाद में आठवीं तक उर्दू शिक्षा प्राप्त करके कोई भी वकालत पढ़कर वकील बन सकता था | दोनों भाइयों ने आगे पीछे वकालत पास कर ली|
पिताजी का निधन तो हुआ चूका था अब दुर्भाग्य से अगले ही वर्ष आपके मामा गोकुलप्रसाद जी भी चल बसे| आपके दो और मामा थे| एक मणिकप्रसादजी और श्री दत्तात्रेयप्रसादजी वकील | आप दोनों ने अपनी दुखिया बहिन की यथासंभव सहायता व देखभाल की | श्यामलालजी ने दत्तात्रेयजी की सहायता से मिडिल परीक्षा पास की| यहाँ प्रसंगवश श्री दत्तात्रेयप्रसादजी के सम्बन्ध में बता दें | आप आजीवन अविहाहित रहे|
बड़े निडर अर्यानेता थे | गुलबर्गा को अपनी सेवाओं का केन्द्र बनाकर आपने अविस्मरणीय समाजसेवा की| निजाम राज्य की पीड़ित हिन्दू प्रजा की सहायता और रक्षा के लिए सदा संघर्षरत रहे|
श्यामलालजी ने जब उदगीर को केन्द्र बनाकर वैदिक धर्म-प्रचार का अभियान चलाया तब नगर व आस-पास के अनेक युवक व कुमार रात्रि में आर्यसमाज मन्दिर में ही आकर सोते थे|सोने से पूर्व खूब धर्मचर्चा, वादविवाद, शंका समाधान, व्याख्यान आदि होते थे| प्रातःकाल सब मंदिर में ही व्यायाम किया करते थे | तब तो मानों आर्यसमाज मंदिर उदगीर का एक ज्योति केन्द्र था, गुरुकुल था, क्रांतिवीरों का पालना था| भाईजी की इस जीवन-निर्माणशाला से प्रशिक्षित वीरों निजाम-शासन को कम्पा दिया| अनेकों की जवानियाँ तो जेलों में गल गयी| अब तो उदगीर का आर्यसमाज मंदिर एक निर्जीव स्कूल भवन है बस|
श्यामलालजी को समाज की कुरीतियों व रोगों का ज्ञान हो चूका था| १९२१ में आपने सर्वप्रथम सामाजिक कुरीतियों पा भाषण दिया | दोनों भाई हल्लीखेड़ में अपने बड़े मामा के पास रहते थे| इनके एक मामा मणिकप्रसादजी कट्टर पौराणिक थे| श्री मणिकप्रसादजी का वंशीलालजी से ऐसा वाद-विवाद हुआ कि वंशीलाल हल्लीखेड़ कहीं चले गए| श्यामलालजी भी कल्याणी चले गए| दोनों भाई आर्य सिद्धांतों के इतने पक्के थे कि अपनी सगी बहन के विवाह से भी अलग थलग रहे क्यूंकि इनकी इच्छा के विपरीत उसका विवाह संस्कार पौराणिक रीति से हुआ था हालाँकि वर आर्यसमाजी था| ऐसे व्यक्तियों को लोग भले
ही कुछ कहें, परन्तु युग की धारा को ऐसे ही लोग बदला करते हैं| जो सुविधा पर सिद्धांतो को वार देते हैं वे लोग कुरीतियों के प्रवाह को नही सकते हैं|
श्री वंशीलाल वकील बनकर कार्यक्षेत्र में डट गए| श्री श्यामलाल गुलबर्गा में छोटे मामा के पास वकालत की तैयारी करने लगे| आपने ही गुलबर्गा में आर्यसमाज की स्थापना की| गुलबर्गा के आर्यसमाज का अपना एक इतिहास है| यह इतिहास गौरवमय है, प्रेरणाप्रद है और रक्त-रंजित है| आर्यसमाज गुलबर्गा को श्यामलालजी ने कई रत्न दिए| गुलबर्गा के आर्यवीरों ने हिन्दू जाति की रक्षा के लिए, अबलाओं के सतीत्व की रक्षा के लिए, दलितोद्धार व अनाथों के रक्षण-पोषण के लिए जो कार्य किये हैं, वे गिनाये नही जा सकते| निजाम उस्मान अली ने राज्य से बाहर के मुसलमानों को प्रलोभन देकर उन्हें राज्य में बसाया| हुमनाबाद व उसके आसपास बाहर से लाये गए पठानों की अच्छी संख्या थी| भाई श्यामलालजी के पुरुषार्थ से हुमनाबाद में आर्यसमाज की स्थापना हो गयी| महर्षि दयानन्द का जन्म शताब्दी वर्ष पर वहां ऋषिबोध पर्व समारोहपूर्वक मनाया गाय| निजाम राज्य में आर्यसमाज होली व विजयदशमी के पर्व बड़े निराले ढंग से मनाता रहा है| हुमनाबाद में होली पर जब पहली बार आर्यों नगर-कीर्तन निकाला तो हिन्दू जनता इसे देखकर बहुत प्रभावित हुई|
१९२६ का वर्ष आपके जीवन में बहुत महत्व रखता है| इसी वर्ष आपने आर्यसमाज उदगीर की स्थापना कर दी| वर्ष के अंत में २३ दिसम्बर को स्वामी श्रद्धानंद जी का बलिदान हो गया| स्वामीजी के पवित्र जीवन का भाई श्यामलालजी पर बहुत प्रभाव पड़ा| भाईजी के एक शिष्य अशोक आर्य ने एक बार बताया था कि मैंने भाईजी से पूछा था कि आपके जीवन की उत्कृष्ट इच्छा क्या है? आपने कहा “मेरी प्रबल इच्छा यह है कि मुझे मेरे महान गुरु स्वामी श्रद्धानंदजी वाली मृत्यु प्राप्त हो|”
ईश्वर ने उनके पवित्र ह्रदय से निकली यह प्रार्थना सुन ली| आपको भी धर्म की बलिवेदी पर जीवन भेंट करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ|
आपके तपोनिष्ठ जीवन से हिन्दू समाज में नवचेतना का संचार हुआ| मतांध शासक हिन्दू समाज में जागृति को सहन न कर सके| उदगीर के तहसीलदार जान मुहम्मद ने स्थानीय मुसलमानों को उकसाकर भाईजी के घर पर रात के समय आक्रमण करवा दिया| इस आक्रमण के समय १०-१२ आर्य नवयुवक आपके घर आये हुए थे| भाईजी ने सब नवयुवकों को मकान की छत पर चले जाने को कहा और स्वयं बाहर आकर उन आक्रमणकारियों के सामने खड़े हो गए| आक्रमणकारी शोर मचाते रहे, नारे लगाते हुए मकान की ओर बढ़े पर निर्भीक श्यामलाल को निडर खड़ा देखकर किसी की भी हिम्मत उनपर वार करने की नही हुई| भाईजी के जीवन पर कई बार घातक आक्रमण हुए और कई बार हत्यारे उन्हें मारने की योजना लेकर आये| एक बार आर्यसमाज धाराशिव के एक उत्सव में रात्रि में एक अधिवेशन में भाई श्यामलालजी बैठे हुए थे, पूज्य स्वामी स्वतंत्रानन्दजी का भाषण हो रहा था| इतने में मुसलमान नारे लगाते हुए आ गए, उनके पास हथियार भी थे| स्वामीजी ने उपस्थित श्रोताओं से कहा आप शान्ति से बैठे रहें| इन्हें देख लिया जायेगा| मैं अकेला ही इनसे निपट लूँगा| कुछ देर तक मुसलमान हुल्लड़ मचाते रहे पर बाल ब्रह्मचारी स्वामीजी की गर्जना सुनकर शायद उनकी हिम्मत आक्रमण करने की नही पड़ी और वे धमकी दते हुए लौट गए|
आर्यसमाज ने प्रथम बार उदगीर में दशहरा पर शोभा यात्रा निकाली तब भी तहसीलदार ने झूठी रिपोर्ट लगाकर उसे रोकने की कोशिश की थी परन्तु वो आर्यों के निश्चय को बदलने में विफल रहा| अब भाईजी अपनी आत्मरक्षा के अपने पास शस्त्र रखने लगे| होली का पर्व आया| आपपर दो मुसलमानों ने छूरे से आक्रमण कर दिया पर आप बच निकले | उसी अवसर पर एक दुष्ट ने बारूद जलाकर आपके एक हाथ को घायल कर दिया| अब पं.श्यामलाल मतांध शासकों की आँख में चुभने लगा था| एक बार फिर रात में आपके घर पर भीड़ ने आक्रमण किया, उस समय वहां भाईजी के घर पर कुछ आर्यवीर बैठे हुए थे, वे वैदिक धर्म की जय बोलते हुए आक्रमणकारियों से जा भिड़े| वीरों को आता देख, आक्रमणकारी भाग खड़े हुए|
उस युग में अस्पृश्यता हिन्दू समाज का भयानक रोग था| भाईजी कुएं पर जाकर चार-चार सौ घड़े पानी के खींचकर अपने दलित भाइयों को दिया करते थे| इस अथक सेवा और लगन का यथोचित प्रभाव पड़ा | कई उत्साही आर्य युवक इस कार्य में आपके साथ हो गए| आर्यसमाज का संघठन मजबूत हो गाय|
आप पर एक बाद एक तीन अभियोग चल्काए गए पर हर बार आप हाईकोर्ट से निर्दोष सिद्ध हुए|
एक बार आप अंघोरी प्रचारार्थ जा रहे थे| किराये के एक ऊँट पर यात्रा कर रहे थे| एक और सहयोगी साथ था| कस्बा अहमदपुर के सशस्त्र मुसलमानों ने आपको घेर लिया| मुसलमान तो छाया में भी आपका पीछा किया करते थे| आप साहस करके ऊँट से निचे उतर आये और अपनी पिस्तौल निकालकर उनको ललकारा| रिवाल्वर देखकर वे तो भाग गए पर ऊँट वाला भी अपना ऊँट लेकर भाग गया| तब भय के कारण अहमदपुर में किसी हिन्दू ने आपको अपने घर में स्थान नही दिया| पं.लेखराम के इस अनुयायी ने सारी रात रास्ते में बिता दी| भला जाति ऋण क्या चुका पायेगी?
शासन ने विजयदशमी पर उदगीर में दंगा करवा दिया| श्री गंगाराम नाम के एक लिंगायत के हाथ एक मुसलमान मारा गया| पुलिस को एक बहाना चाहिए था, श्याम भाई को पकड़कर जेल में डाल दिया गया|
शासन अब किसी भी मुल्य पर श्यामलालजी खुला छोड़ने को तैयार नही था| ये आर्यजाति के लिए बड़े गौरव की बात है कि उसके एक सपूत ने जो कि निरंतर रोगी रहता था, हैदराबाद की साधन सम्पन्न सरकार कम्पाकर रख दिया था| एक कवि की निम्न पंक्ति ऐसे ही प्राणवीरों के लिए है—
“किस शेर की आमद है कि रण काँप रहा है|”
भाई श्यामलाल चारों ओर से आपदाओं से घिरे रहते थे| उदगीर की दीवारों पर उनकी हत्या करने सम्बन्धी घोषणा की गयी| वे ब्रह्मचारी थे तो भी सरकार ने उनके, उनकी पत्नी और साली तीनों पर F.I.R अंकित करवाई थी| यह पत्नी और साली कहाँ से पैदा हो गयी ईश्वर जाने??
अपने बलिदान से कुछ माह पूर्व ‘आर्यवीर’ उर्दू साप्ताहिक में प्रकाशित अपने एक लम्बे लेख में राज्य में हिन्दू समाज पर हो रहे अत्याचारों का विस्तृत व्यौरा देते हुए लिखा था— “आज सैकड़ों प्रकार के अत्याचार ढाए जा रहे हैं, परन्तु आर्यसमाजी हैं कि इन्हें सहर्ष सहन करते हुए शान्तिपूर्वक अपना कार्य करते जा रहे हैं| मैं राज्य हैदराबाद के आर्यों से प्रार्थना करता हूँ कि ये आपकी परीक्षा की घड़ी है|
संकट की वेला में आप इस पद्य को सामने रखो—
“सदाकत के लिए गर जान जाती है तो जाने दो|
विपत्ति पर विपत्ति सिर पै आती है तो आने दो||”
लेख की समाप्ति जैसे अपने पर क्रूर कायर हत्यारे को सम्बोधित करते हुए लिखा था “हमें तूने पूर्वजों के मार्ग पर चलने का अवसर देकर परीक्षा में बिठा दिया है| देख एक वर्ष में परिणाम क्या निकलेगा|”
ठीक एक वर्ष के भीतर भाईजी अपना बलिदान देकर आहुति दे दी| आर्यसमाज प्रतापी नेताओं ने शोलापुर के आर्य महासम्मेलन में निजाम शासन के विरुद्ध सत्याग्रह की घोषणा कर दी| इस बलिदान यज्ञ की ज्वाला में अन्यायी मतांध निजामीं राज्य भस्मीभूत हो गाय|
भाई श्यामलाल को कारागार में असहनीय यातनाये दी गयीं| उनका रोगी शरीर तो जेलवालों के दुर्व्यवहार को सहन नही कर सकता पर उनका बलवान आत्मा सबकुछ शान्तिपूर्वक सहन करता रहा| श्यामलालजी ने अपने बड़े भाई वंशीलाल पत्र लिखकर जेल में मिलने वाली सारी यातनाओं और आपबीती का वर्णन किया|
जेल का भोजन न करने के लिए उन्हें धमकाया गया | उन्होंने कहा मेरी औषधि तो न छुड़वायें| यह तो सेवन करने दें और दूध तो आप देंगे नही, मैं अपने स्वजनों से इसकी व्यवस्था करवा लूँगा| जेल में नया दरोगा भेजा गया, उसने रातभर भाईजी को द्वार के समाने सुलाया| खुली हवा में रोगी शरीर ठण्ड से अकड़ गया| जेल का भोजन तो लेना ही पड़ेगा ये बोलकर एक आदमी उनके पास भेजा गया| दो रोटियां और मिर्च वाली डाल| जेल का भोजन प्रातिकूल था तो वे भूखे रहने पर विवश थे| अन्य आर्यबन्दियों ने भी सहानभूति के कारण भोजन नही किया| उन्हें भी यातनाएं दी गयी| एक पत्र गुप्तरूप से श्री विनायकरावजी को भेजकर ये सारे समाचार हैदराबाद भेजे गए| १६ दिसम्बर १९३८ को रात समय आपको दूध दिया गया| वो विषयुक्त था| इसे पीते ही आपकी प्रकृति बिगड़ने लगी| आपने मृत्यु के पूर्व एक पत्र लिखकर एक आर्य बालक को दिया और कहा इसे किसी भी प्रकार बाहर पहुंचा देना| रात में दरोगा देखने आया कि श्यामलाल मरा या नही ? बालक सोने का अभिनय करके लेता हुआ था| दरोगा ने पूछा “इसने मारने के पूर्व तुम्हे कुछ दिया क्या?” बालक ने कहा “मैं तो सो रहा था|” रात में तीन बजे पुनः उसकी पूछताछ की गयी, बहुत मारा-पीटा गया|
अंतिम प्रमाण— भाईजी का शव निजाम शासन किसी भी हाल में आर्यों को सौपने को तैयार नही था| तब पं.रुचिराम ‘आर्योपदेशक’ के बुद्धिचातुर्य के कारण उनका बलिदान शरीर अंतिम संस्कार के लिए आर्यसमाज को मिला सका था| वीरोचित रीति से उनका दाहकर्म किया गया| पूज्य महात्मा नारायण स्वामीजी ने चिता को अग्नि देते हुए कहा “अब हमारे धीरज का बांध टूट गया है|”
श्यामलालजी का बलिदान आर्यसमाज के इतिहास की एक गौरवपूर्ण घटना है| परन्तु समझते हैं कि ऐसे बलिदानी पर अगर संपूर्ण हिन्दू समाज जितना भी गर्व करे कम है|

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